मुख्यमंत्री की घोषणा: राज्य आंदोलनकारियों को भी मिलेगी गेस्ट हाउस सुविधा, सवाल अब क्रियान्वयन का

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उत्तराखंड राज्य निर्माण के संघर्ष में अपना सर्वस्व झोंकने वाले राज्य आंदोलनकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण और प्रतीकात्मक घोषणा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा की गई है। 8 नवम्बर 2025 को देहरादून में आयोजित राज्य स्तरीय कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने यह घोषणा की कि राज्य के आतिथि गृहों/गेस्ट हाउसों में मान्यता प्राप्त पत्रकारों की भांति राज्य आंदोलनकारियों को भी अनुमन्य दरों पर आवासीय सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। यह घोषणा संख्या 728/2025 राज्य अधिग्रहण विभाग से संबंधित है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

मुख्यमंत्री कार्यालय (घोषणा खंड) द्वारा 17 दिसम्बर 2025 को इस संबंध में सचिव, राज्य अधिग्रहण विभाग को पत्र जारी कर तत्काल अग्रेत्तर कार्यवाही, वित्तीय एवं प्रशासनिक स्वीकृति तथा शासनादेश जारी करने का निर्देश दिया गया है। साथ ही मुख्यमंत्री को वस्तुस्थिति से अवगत कराने की बात भी कही गई है। पत्र की प्रतिलिपि वित्त सचिव, सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के निदेशक तथा समस्त जिलाधिकारियों को भेजी गई है।

सम्मान की घोषणा, लेकिन भरोसा क्रियान्वयन पर टिका

यह घोषणा राज्य आंदोलनकारियों के सम्मान की दिशा में एक सकारात्मक कदम मानी जा सकती है। वर्षों से आंदोलनकारी यह मांग करते रहे हैं कि जिस तरह पत्रकारों, अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को राज्य अतिथि गृहों में रियायती दरों पर ठहरने की सुविधा मिलती है, उसी प्रकार राज्य निर्माण के लिए संघर्ष करने वालों को भी यह अधिकार मिलना चाहिए।

हालांकि, उत्तराखंड का अनुभव बताता है कि घोषणाओं और उनके धरातलीय क्रियान्वयन के बीच लंबा अंतर अक्सर आंदोलनकारियों के लिए निराशा का कारण बना है। अनेक घोषणाएं आज भी फाइलों और आदेशों तक सीमित हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या यह घोषणा केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी या वास्तव में राज्य आंदोलनकारियों को इसका लाभ मिलेगा?

स्पष्ट नीति और पहचान आवश्यक

इस घोषणा के सफल क्रियान्वयन के लिए आवश्यक है कि:

  • राज्य आंदोलनकारी की स्पष्ट परिभाषा और मान्यता तय हो
  • सभी जिलों के गेस्ट हाउसों को एक समान दिशा-निर्देश जारी हों
  • किसी भी स्तर पर बाबूशाही या भेदभाव की गुंजाइश न रहे

यदि शासनादेश स्पष्ट नहीं हुआ, तो जमीनी स्तर पर आंदोलनकारियों को फिर से अपमान और भटकाव का सामना करना पड़ सकता है।

सरकार की नीयत की परीक्षा

यह घोषणा मुख्यमंत्री सरकार की नीयत की भी परीक्षा है। राज्य आंदोलनकारियों के लिए यह सुविधा कोई कृपा नहीं, बल्कि नैतिक और ऐतिहासिक अधिकार है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शासन कितनी शीघ्रता और गंभीरता से वित्तीय व प्रशासनिक स्वीकृति जारी करता है और जिलों में इसका पालन सुनिश्चित करता है।

यदि यह घोषणा सही मायनों में लागू होती है, तो यह न केवल आंदोलनकारियों के सम्मान की पुनर्स्थापना होगी, बल्कि राज्य निर्माण की भावना के प्रति सरकार की संवेदनशीलता का भी प्रमाण बनेगी। लेकिन यदि यह भी अन्य घोषणाओं की तरह फाइलों में दफन हो गई, तो आंदोलनकारियों का विश्वास और अधिक टूटेगा — और यही किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए सबसे बड़ा नुकसान होगा।


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