लाइन में खड़ा नागरिक और कुर्सी पर बैठी सत्ता—उत्तराखंड की व्यवस्था पर एक संपादकीय

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यह अब किसी संयोग या प्रशासनिक चूक का परिणाम नहीं लगता, बल्कि एक सुनियोजित व्यवस्था का हिस्सा प्रतीत होता है कि सरकार ने नागरिक को नागरिक नहीं, बल्कि हमेशा लाइन में खड़े रहने वाला व्यक्ति बना दिया है। सुबह से शाम तक आधार, केवाईसी, सत्यापन, अपडेट, लिंकिंग—इन अंतहीन कतारों में आदमी को इस तरह उलझा दिया गया है कि उसे यह पूछने की फुर्सत ही नहीं मिलती कि रोज़गार कहाँ है, महँगाई क्यों बढ़ रही है, शिक्षा और स्वास्थ्य की हालत बदतर क्यों है।

लाइन में खड़ा व्यक्ति सोच नहीं पाता, सवाल नहीं कर पाता। वह अपनी बारी के नंबर में इतना उलझा रहता है कि यह समझ ही नहीं पाता कि उसकी मूलभूत ज़रूरतें—रोटी, रोज़गार, सुरक्षा और सम्मान—कब और कैसे एजेंडे से बाहर कर दी गईं। यह व्यवस्था आदमी को व्यस्त नहीं, बल्कि व्यर्थ बनाए रखने की कला बन चुकी है।

सरकार इसे “डिजिटल सुविधा” कहती है,
लेकिन ज़मीनी हकीकत है—डिजिटल बहाना, भौतिक यातना।

उत्तराखंड राज्य बने पच्चीस वर्ष हो चुके हैं। इस दौरान सरकारें बदलीं, मुख्यमंत्री बदले, योजनाओं और नारों के नाम बदले, लेकिन पिछले एक दशक में अगर किसी एक चीज़ ने आम उत्तराखंडी नागरिक की पहचान तय कर दी है, तो वह है—कतार
सरकारी दफ्तर, बैंक, तहसील, नगर निगम, जन सेवा केंद्र, अस्पताल, स्कूल—हर जगह एक ही दृश्य है: काग़ज़ हाथ में पकड़े, धूप-बारिश-ठंड में अपनी बारी का इंतज़ार करता नागरिक।

आधार से शुरू हुई यह कतार अब राशन कार्ड, वोटर कार्ड, पेंशन, गैस कनेक्शन, बैंक खाते और छात्रवृत्ति तक फैल चुकी है। हर योजना के साथ नया अपडेट, हर अपडेट के साथ नई लाइन। “सर्वर नहीं चल रहा”, “आज स्लॉट फुल है”, “कल आइए”—ये वाक्य अब प्रशासन की पहचान बन चुके हैं।

डिजिटल इंडिया का सपना उत्तराखंड में आकर “कतार इंडिया” में बदल गया है। ऐप पर फॉर्म भरने के बाद भी दस्तावेज़ सत्यापन, बायोमेट्रिक और भौतिक जांच के लिए लाइन अनिवार्य है। जन सेवा केंद्र सुविधा के बजाय सफेद हाथी बनते जा रहे हैं, जहाँ सुबह से टोकन और दोपहर तक निराशा मिलती है।

सबसे पीड़ादायक तस्वीर सरकारी अस्पतालों और सामाजिक योजनाओं में दिखती है—जहाँ बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएँ, बीमार बच्चे और दिव्यांग भी लाइन में खड़े हैं। यह सहायता नहीं, बल्कि अपमानजनक प्रतीक्षा है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार ने कभी यह जानने की कोशिश की कि एक आम नागरिक अपने जीवन के कितने दिन सिर्फ़ लाइन में खड़े होकर गँवा देता है? मज़दूर की दिहाड़ी जाती है, किसान का खेत छूटता है, बुजुर्ग की सेहत बिगड़ती है—लेकिन व्यवस्था निर्विकार बनी रहती है।

उत्तराखंड राज्य इसलिए नहीं बना था कि यहाँ की जनता बाकी राज्यों से ज़्यादा लाइन में खड़ी रहे। राज्य बना था सरल प्रशासन, तेज़ सेवा और नागरिक के सम्मान के लिए। आज स्थिति यह है कि नागरिक, नागरिक नहीं रहा—वह सिर्फ़ एक आवेदक बनकर रह गया है।

यह संपादकीय किसी एक सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि उस पूरी प्रणाली के खिलाफ आरोपपत्र है, जिसने योजनाओं का बोझ जनता पर डाल दिया है।
अब उत्तराखंड को लाइन नहीं, समाधान चाहिए—एक-बार सत्यापन, सचमुच की डिजिटल सुविधा, घर-घर सेवा और सबसे ज़रूरी, नागरिक के समय और सम्मान की क़ीमत।

क्योंकि सवाल अब सिर्फ़ लाइन का नहीं है,
सवाल यह है—
क्या उत्तराखंड की जनता का काम ही लाइन में खड़े रहना है?


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