अंकिता भंडारी हत्याकांड उत्तराखंड के इतिहास का वह काला अध्याय है, जिसने देवभूमि की आत्मा को झकझोर दिया। दो साल से अधिक समय बीतने के बाद भी “VIP कौन था?”—यह सवाल आज भी जिंदा है। ताजा आरोपों और वायरल ऑडियो के बीच अब यह मामला केवल अपराध नहीं, बल्कि सत्ता-संरक्षण और जांच की विश्वसनीयता का इम्तिहान बन चुका है।
इसी पृष्ठभूमि में पूर्व शिक्षा मंत्री एवं गदरपुर विधायक अरविंद पांडेय का बयान खास मायने रखता है। पांडेय ने सरकार को सीधे कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि “यदि मामले में कोई प्रभावशाली व्यक्ति या VIP शामिल है, तो उसे बचाने की कोशिश न्याय के साथ सबसे बड़ा अन्याय है। जांच पर कोई राजनीतिक दबाव नहीं होना चाहिए।” उनका यह प्रहार संकेत देता है कि सत्ता के भीतर भी बेचैनी है—और सवाल सिर्फ विपक्ष के नहीं रहे।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड
उधर, ज्वालापुर के पूर्व भाजपा विधायक सुरेश राठौर की कथित पत्नी उर्मिला सनावर के 24 मिनट के फेसबुक लाइव दावों ने आग में घी डाला है। “ग्रुप सेक्स” के लिए दबाव, VIP की मौजूदगी और सबूतों की बात—ये आरोप यदि आंशिक रूप से भी सत्य हैं, तो जांच के दायरे को शीर्ष तक जाना ही होगा। अंकिता की व्हाट्सएप चैट्स पहले ही यह बताती हैं कि वह रिजॉर्ट में खुद को असुरक्षित महसूस कर रही थी—“VIP गेस्ट” और “एक्स्ट्रा सर्विस” जैसे शब्द व्यवस्था पर गंभीर आरोप हैं।
वायरल ऑडियो में बड़े नामों का जिक्र और कथित सबूतों की बात ने जांच एजेंसियों की भूमिका पर फिर सवाल खड़े किए हैं। अब तक गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन VIP एंगल धुंध में क्यों रहा? क्या सीमाएं पहले से तय थीं?
इसीलिए सीबीआई जांच की मांग फिर तेज है। अरविंद पांडेय का बयान इस मांग को राजनीतिक वजन देता है—यह संदेश साफ है कि सच तक पहुंचने से पहले रुकना स्वीकार्य नहीं।
न्याय सिर्फ सज़ा नहीं, सच का उजागर होना है। अगर VIP शामिल थे, तो नाम सामने आने चाहिए—ताकत चाहे जितनी भी हो। देवभूमि की जनता आधे सच से संतुष्ट नहीं। अब सवाल स्पष्ट है—क्या सरकार और जांच एजेंसियां सच का सामना करेंगी, या अंकिता का सच फाइलों में ही दबा रह जाएगा?

