

आज उत्तराखंड ने केवल एक नेता को नहीं खोया, बल्कि अपने आंदोलन, अपने इतिहास, अपनी अस्मिता और अपनी आत्मा के एक महत्वपूर्ण अध्याय को आग में विलीन होते देखा। हरिद्वार की पवित्र धरती पर जब फील्ड मार्शल दिवाकर भट्ट की अंतिम यात्रा निकली, तो वातावरण ऐसा था मानो समय खुद कुछ क्षणों के लिए थम गया हो। हवा धीमी थी, पहाड़ों की स्मृतियाँ मौन थीं, और हज़ारों कंधों से बहती संवेदना एक ही संदेश कह रही थी — “दिवाकर भट्ट का जाना, सिर्फ एक निधन नहीं, उत्तराखंड के संघर्ष की अमर कथा का नया अध्याय है।”

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
यह कोई राजनीतिक आयोजन नहीं था। कोई मंच नहीं, कोई भाषण नहीं, कोई परिचय नहीं। वहां केवल लोग थे — हजारों की संख्या में — और उनके दिलों में वही ऋण, वही सम्मान, वही स्मृति जो किसी ऐसे सेनानी के लिए रखी जाती है जिसने अपनी पूरी जिंदगी संघर्ष में झोंक दी हो। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के वर्षों में गूंजने वाले नारे जैसे इतिहास को पलटकर वर्तमान में ले आए हों —
उत्तराखंड हमारा है — नहीं किसी के बाप का है।”
हमारा संघर्ष जारी है।”

आज यह नारे दुख में नहीं, संकल्प में उठे। रुदन और गर्व एक साथ दिखे — जैसे पहाड़ रो भी रहा था और नई प्रतिज्ञा भी ले रहा था।
जनमानस का सैलाब — बिना बुलावे का, बिना राजनीति का
अंतिम यात्रा जिस सड़क से गुज़री, हर मोड़, हर फुटपाथ, हर छत पर खड़े लोग हाथ जोड़े मौन श्रद्धांजलि दे रहे थे।
कोई टिकट नहीं, कोई बैरिकेड्स नहीं, कोई प्रचार वाहन नहीं।
लेकिन हजारों पैरों की चाल वही थी — जो कभी राज्य आंदोलन के दौरान सड़कों पर सुनाई देती थी।
वहां राजनीतिज्ञ भी थे, सत्ता के प्रतिनिधि भी थे। लेकिन आज सब सामान्य नागरिक बन गए थे। कुर्ता, कोट, पार्टी झंडे और पद — सब अर्थहीन लग रहे थे। क्योंकि वहां हर कोई जानता था — यह अंतिम यात्रा सत्ता की नहीं, संघर्ष की है। यह विदाई एक पूर्व कैबिनेट मंत्री की नहीं, एक आंदोलन के फील्ड मार्शल की है।
तिरंगे में लिपटा शरीर — और दस हजार दिलों की मौन पुकार
चमक-दमक से दूर, बिना भव्यता के, मात्र तिरंगे में लिपटा वह शरीर — बताता था कि सच्चा संघर्ष क्या होता है।
“राजनीति” और “नेतृत्व” के बीच जो अंतर होता है, दिवाकर भट्ट अपना पूरा जीवन उस अंतर को जीते रहे।
मुखाग्नि के क्षण में जब भीड़ एक साथ रो पड़ी, पहाड़ के इतिहास में वह पल सदैव अंकित रहेगा।
हर आंख नम थी — लेकिन हर आंख में गर्व भी था।
किसी बुजुर्ग आंदोलनकारी ने धीमे स्वर में कहा —
“आज एक दीप बुझा है… पर उसने हजारों मशालें जगा दी हैं।”
जिन्होंने अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हो सके… उन्होंने दूरी से भी संकल्प लिया
जिन्हें अंतिम यात्रा में शामिल होने का अवसर नहीं मिला, वे टीवी स्क्रीन, मोबाइल लाइव और सोशल मीडिया पर एकटक देखते रहे। रुद्रपुर, किच्छा, नैनीताल, पिथौरागढ़, देहरादून — हर घर में मौन पसरा रहा।
आज कोई राजनीतिक बहस नहीं थी, कोई आरोप-प्रत्यारोप नहीं, कोई दलगत विभाजन नहीं —
सिर्फ श्रद्धा थी।
सिर्फ ऋण का स्मरण था।
हर टिप्पणी में एक ही स्वर था —
“नेता जी, काश आप थोड़ा और रहते… अभी बहुत काम बाकी था।”
आंदोलन खत्म नहीं हुआ — दिशा और मजबूत हुई
अंतिम यात्रा ने यह स्पष्ट कर दिया कि दिवाकर भट्ट केवल स्मृति नहीं — प्रेरणा हैं।
जो नारे आज गूंजे, वे केवल शोक के नारे नहीं थे —
वो भविष्य का घोषणापत्र थे।
उत्तराखंड आंदोलन नेताओं से नहीं, विचारों से बना था।
और विचार न मृत्यु से बुझते हैं, न समय से।
दिवाकर भट्ट का शरीर अग्नि को सौंप दिया गया —
लेकिन विचार आज भी ताप बनकर जीवित हैं।
दिया बुझा है —
लेकिन रोशनी और बढ़ गई है।
एक युग का अंत नहीं — एक विरासत की नींव
दिवाकर भट्ट को अंतिम विदाई देते समय पहाड़ ने केवल खोया नहीं —
बल्कि नई प्रतिज्ञा ली है।
उनके सपनों का उत्तराखंड बनाना अब केवल एक आशा नहीं — एक वचन है।
एक पीढ़ी ने नेतृत्व किया था — अब अगली पीढ़ी को मशाल संभालनी है।
इतिहास में यह पंक्ति अवश्य लिखी जाएगी —
“दिवाकर भट्ट चले नहीं — उत्तराखंड ने उन्हें देवत्व में विदा किया।”
अंतिम प्रणाम?फील्ड मार्शल दिवाकर भट्ट को राजकीय सम्मान के साथ विदा किया गया,
पर उनके संघर्ष की गूंज सदियों तक सुनाई देती रहेगी।वे अब केवल एक दिवंगत नेता नहीं —
वे उत्तराखंड के संघर्ष का प्रतीक हैं,
आंदोलनकारियों की धड़कन हैं,
अस्मिता की शाश्वत लौ हैं।और उत्तराखंड के लाखों लोगों की आंखों में लिखी प्रतिज्ञा सिर्फ एक ही है —
“जब तक सूरज चांद रहेगा — दिवाकर भट्ट का नाम रहेगा।”
“उत्तराखंड का अधूरा सपना पूरा किया जाएगा।”




