मानवता की मिसाल: रम्पुरा के दर्द को अपनाने वाले विधायक शिव अरोड़ा?गुरु का दृष्टिकोणः मानव सेवा ही सबसे बड़ा धर्म – विधायक शिव अरोड़ा का उदाहरण

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यह कठिन समय का सत्य है कि समाज का असली चरित्र संकट के क्षणों में दिखाई देता है — और जनप्रतिनिधि का असली मूल्य भी। रुद्रपुर के विधायक शिव अरोड़ा ने हाल ही में जिस संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का परिचय दिया, वह राजनीति की सामान्य परिभाषाओं से कहीं अधिक मानवीय और प्रेरणादायक है।

रम्पुरा के कैंसर पीड़ित जगदीश कोली के घर पहुँचकर न केवल उन्होंने हौसला दिया बल्कि ऋषिकेश एम्स में भर्ती से लेकर इलाज के खर्च तक की जिम्मेदारी स्वयं लेने की घोषणा की। मात्र आर्थिक सहायता ही नहीं, बच्चों की पढ़ाई और प्रतिमाह राशन की व्यवस्था कराने के लिए मुनिन्द्र धर्मार्थ ट्रस्ट को पत्राचार कर उनकी ओर से सहमति प्राप्त कराना एक दूरदर्शी और संवेदनशील जनसेवक की पहचान है।

यही नहीं, कुछ दिन पहले आत्महत्या करने वाले राजेंद्र कोली के परिवार के घर पहुंचकर पाँच छोटी बच्चियों के भविष्य की चिंता को प्राथमिकता देते हुए राशन, शिक्षा और पक्का मकान तक की व्यवस्था सुनिश्चित करवाना बताता है कि शिव अरोड़ा केवल नेता नहीं — जीवन के संघर्षों में सहारा बनने वाले व्यक्ति हैं।सत्ता का उपयोग यदि किसी के आंसू पोंछने और टूटे परिवारों को संबल देने के लिए हो, तो यही राजनीति का सर्वोत्तम रूप है। रम्पुरा के लोगों ने केवल एक विधायक नहीं देखा, बल्कि एक संरक्षक, एक अभिभावक और एक सच्चा जनप्रतिनिधि देखा है। शिव अरोड़ा की यह संवेदनशील सोच और समाज के प्रति समर्पण सराहनीय है — और आज के दौर में उदाहरण बनने योग्य भी।

गुरु का दृष्टिकोणः मानव सेवा ही सबसे बड़ा धर्म – विधायक शिव अरोड़ा का उदाहरण,कक्षा चाहे विद्यालय की हो या जीवन की -पाठ हमेशा एक ही सिखाता है: सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के दुख में साथ खड़ा हो।रम्पुरा में जो हुआ, वह किसी किताब के पन्नों की कहानी नहीं -जीवन के पाठ का जीवंत उदाहरण है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

कहते हैं—एक जनप्रतिनिधि तभी जनप्रतिनिधि कहलाने योग्य होता है, जब वह जनता की मुस्कुराहट में अपनी खुशी और जनता की पीड़ा में अपना दुःख तलाशता है। राजनीति की चकाचौंध, भाषणों के मंच और विकास की योजनाएँ अपनी जगह हैं, लेकिन जब जनता अपने कठिनतम दौर से गुजर रही हो और कोई नेता अपने राजनैतिक कद को पीछे रखकर इंसानियत का कंधा आगे बढ़ाए—तब वही नेता समाज का असली सेवक कहलाता है।रुद्रपुर के विधायक शिव अरोड़ा ने एक बार फिर यह सिद्ध किया है कि राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं—बल्कि संवेदनाओं की जिम्मेदारी भी है।

एक कैंसर पीड़ित, ढहता घर और उम्मीद का सहारा।रम्पुरा वार्ड नंबर 23 के साधारण सा परिवार…
जीवन की दौड़ में अपने खून-पसीने से घर चलाने वाला एक श्रमिक—जगदीश कोली। जब कैंसर की बीमारी घर में दाखिल हुई, तब न सिर्फ उसका शरीर कमजोर हुआ, बल्कि कंधों पर लदी जिम्मेदारियों के पहाड़ भी ढहने लगे।
एक ओर दवाइयों और इलाज का अनंत खर्च, दूसरी ओर घर चलाने का संकट। हालत इतनी विकट कि पत्नी माया को अपना अंतिम सहारा — घर — तक गिरवी रखना पड़ा।जब ऐसे परिवार दरवाजे-दर-दर उम्मीद तलाशते फिरते हैं, तभी समाज उन्हें आंकड़ों की फाइलों और औपचारिक कागज़ों में घेर देता है। लेकिन रम्पुरा में ऐसा नहीं हुआ…
क्योंकि विधायक शिव अरोड़ा स्वयं उनके द्वार पहुँचे।यह केवल एक औपचारिक मुलाक़ात नहीं थी — यह हिम्मत का हाथ था, सांत्वना की छाया थी, और किसी टूटते परिवार से यह वादा था कि वे अकेले नहीं हैं।

उन्होंने निर्णय लिया कि जगदीश को एम्स ऋषिकेश में भर्ती कराया जाएगा, यात्रा से लेकर इलाज तक के खर्च को पूरा करवाने की ज़िम्मेदारी वे खुद उठाएँगे।
सिर्फ इतना ही नहीं — मुख्यमंत्री राहत कोष से सहायता, और आगे के इलाज के लिए मुनिन्द्र धर्मार्थ ट्रस्ट धनाना गोहाना सोनीपत के माध्यम से राशन, बच्चियों की शिक्षा और भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित कराने का वादा भी किया।

यह घोषणा नहीं — भरोसा था।
यह भाषण नहीं — अपनापन था।एक और दर्द — पाँच बच्चियों के सिर से पिता का साया छिन गया।रम्पुरा में ही कुछ दिन पहले राजेंद्र कोली ने आत्महत्या कर ली।
पांच छोटी बच्चियाँ…
एक टूटा हुआ घर…
और एक पत्नी जो अकेली खड़ी है उस तूफान के बीच, जिसका झोंका कोई भी सहन नहीं कर सकता।
राजनीति में शोक संदेश देना आसान होता है, पर किसी उजड़ते परिवार के भविष्य को संभालना कठिन।
विधायक शिव अरोड़ा ने वही कठिन राह चुनी।

वे स्वयं परिवार से मिले, राशन पहुँचाया, आर्थिक सहायता दिलाई और आगे के जीवन की सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाई।
मुनिन्द्र धर्मार्थ ट्रस्ट को आग्रह कर बच्चियों की शिक्षा, प्रतिमाह राशन और भविष्य की बुनियादी ज़रूरतों को उनके लिए स्थायी तौर पर सुनिश्चित करवाया।

यहां तक कि परिवार की खराब और कच्ची झोपड़ी जैसी स्थिति देखकर संस्था को मकान निर्माण के लिए सर्वे करवाने को प्रेरित किया, ताकि आने वाले मौसम में पानी टपकती छत से बच्चियाँ फिर परेशान न हों।
एक नेता, पाँच अनाथ बच्चियों के लिए पिता जैसा सहारा बन खड़ा हो गया — इससे बड़ा धर्म, कैसी राजनीति?

रम्पुरा — विकास का वादा नहीं, परिवार का रिश्ता,विधायक शिव अरोड़ा ने कहा —रम्पूरा मेरा परिवार है, यहाँ के लोग मेरे अपने हैं। संकट की घड़ी में पीछे हटना मेरे स्वभाव में नहीं।”

इस वाक्य में राजनीति नहीं — मानवीय रिश्ते की महक है।
हर जनप्रतिनिधि विकास की बातें करता है, पर दुख में साथ खड़े होने वाले कम होते हैं।
रम्पुरा में शिव अरोड़ा केवल विधायक नहीं — आश्वासन का नाम बनते जा रहे हैं।जब समाज मिलकर आगे बढ़ता है, तब मानवता की जीत होती है।यह बात उल्लेखनीय है कि विधायक ने मदद केवल अपने प्रयासों पर आधारित नहीं रखी।
उन्होंने समाज की शक्ति को साथ लाने का प्रयास किया —
ट्रस्ट, सामाजिक संस्थाएँ, दानदाता और सहयोगी नेटवर्क…
यह संकेत है कि विकास केवल सरकारी खजाने से नहीं — बल्कि करुणा और एकजुटता से भी होता है।

राजनीति में यह शैली दुर्लभ है —
जहाँ नेता श्रेय नहीं, समाधान तलाशता है।
जहाँ उद्देश्य चर्चा नहीं, व्यवस्था खड़ी करना है।

संवेदनशील राजनीति — बदलते समाज का संकेत।जब देश भर में राजनीति कभी धर्म, कभी जाति, कभी फायदे और नुकसान के समीकरणों के इर्द-गिर्द घूम रही हो, ऐसे समय में सहानुभूति और करूणा केंद्र में आने लगें — तो इसे राजनीति नहीं, सेवा का पुनर्जागरण कहा जाएगा।

यह उदाहरण केवल रम्पुरा तक सीमित नहीं रहने वाले —
यह संदेश देता है:
नेता वही जो संकट में दिखाई दे — केवल पोस्टर में नहीं, परिवारों के आंगन में।समाज को जोड़ने वाली राजनीति ही स्थायी होती है।आज जब इंटरनेट की दुनिया में आलोचना आसान और सहायता कठिन होती जा रही है, तब इस प्रकार के सरोकारी कदम समाज में विश्वास जगाते हैं।
चाहे जगदीश के परिवार को कैंसर से लड़ने की हिम्मत देना हो,
या पाँच अनाथ बच्चियों के भविष्य को उजाला देना हो —
इन कदमों ने रम्पुरा में केवल राहत नहीं — आस्था जगाई है।
विधायक शिव अरोड़ा का यह संदेश दूर तक जाएगा कि—
राजनीति का असली अर्थ सत्ता नहीं, सेवा है।
और सेवा वही जो आँसू पोंछ सके, उम्मीद लौटा सके और जीवन को पुनः एक अवसर दे सके।
एक उम्मीद की कथा।कैंसर से जूझते जगदीश के आँसू थम गए…
अनाथ बच्चियों के सिर पर छाया का एहसास लौट आया…
और रम्पुरा ने एक बार फिर महसूस किया —
कि आज भी दुनिया में संवेदनशील नेतृत्व मौजूद है।
यह लेख प्रशंसा नहीं —
एक प्रेरणा है उन सबके लिए जो सार्वजनिक जीवन में हैं।
जनता वोट से जीत दिलाती है — पर
दिल से कमाए हुए सम्मान से नेता अमर होते हैं।रम्पुरा के लोग आज यह कहने में गर्व महसूस कर सकते हैं —हमारे विधायक हमारे सुख-दुख में साथ खड़े हैं।”और यही बात किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत है।


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