उत्तराखंड के अतिथि शिक्षक: सरकार की संवेदनहीनता का सबसे बड़ा शिकार

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अतिथि शिक्षक: सरकार की प्राथमिकता सूची से बाहर,उत्तराखंड में सरकार नियमितीकरण के जश्न मना रही है, मगर जिन अतिथि शिक्षकों के भरोसे सरकारी स्कूल चल रहे हैं, उनका जनवरी और जून का वेतन तक रोक दिया गया है। अल्मोड़ा जैसे जिलों में मुख्य शिक्षा अधिकारी के आदेश भी खंड शिक्षा अधिकारियों के लिए मज़ाक बन चुके हैं। यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि संगठित प्रशासनिक संवेदनहीनता है। योग्यता, मेरिट और वर्षों की सेवा के बावजूद अतिथि शिक्षक सरकार की नज़र में अदृश्य हैं। आश्वासन खूब दिए गए, निर्णय एक भी नहीं। शिक्षा का दावा करने वाली सरकार जब शिक्षकों को ही भूखा रखे, तो समझिए कि यह शिक्षा नहीं, सत्ता का ढोंग है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

पहाड़ से मैदान तक सरकारी विद्यालयों का एक बड़ा ढांचा अतिथि शिक्षकों के भरोसे खड़ा है। लेकिन विडंबना यह है कि जिन शिक्षकों के कंधों पर राज्य की भावी पीढ़ी का भविष्य टिका है, वही शिक्षक आज सरकार और प्रशासन की उपेक्षा, अनदेखी और अन्याय के सबसे बड़े शिकार बने हुए हैं।
अतिथि शिक्षकों की स्थिति पहले से ही दयनीय थी, लेकिन अब हालात अमानवीय हो चुके हैं। जनवरी और जून माह के अवकाश काल का वेतन न दिया जाना केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि शिक्षक समुदाय के आत्मसम्मान पर सीधा हमला है।
अल्मोड़ा से उठती उपेक्षा की चीख
अल्मोड़ा जनपद का उदाहरण इस पूरे राज्य की तस्वीर बयां करता है। वहां मुख्य शिक्षा अधिकारी द्वारा बार-बार आदेश दिए जाने के बावजूद खंड शिक्षा अधिकारियों ने अतिथि शिक्षकों का जनवरी और जून माह का वेतन आज तक जारी नहीं किया। इससे बड़ा प्रशासनिक अहंकार और क्या हो सकता है?
अतिथि शिक्षकों ने धरना-प्रदर्शन किया, ज्ञापन दिए, आवाज़ उठाई, लेकिन शासन-प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। यह केवल अल्मोड़ा की बात नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था का प्रतीक है, जहां नीचे से उठने वाली आवाज़ें ऊपर तक पहुंचने से पहले ही दबा दी जाती हैं।
कम वेतन, दूरस्थ तैनाती और शून्य सुरक्षा
अतिथि शिक्षक पहले ही बेहद कम मानदेय पर काम कर रहे हैं। पहाड़ी जिलों में कई शिक्षक अपने घरों से सैकड़ों किलोमीटर दूर, दुर्गम इलाकों में रहकर बच्चों को पढ़ा रहे हैं। न आवास सुविधा, न यात्रा भत्ता, न चिकित्सा सुरक्षा और न ही भविष्य की कोई गारंटी।
अब जब जनवरी और जून माह का वेतन भी रोका जा रहा है, तो यह सीधा-सीधा उनके जीवनयापन पर हमला है। क्या सरकार यह समझती है कि शिक्षक हवा में जी सकता है? क्या उसके परिवार, बच्चे, माता-पिता नहीं हैं?
नियम पूरे, चयन मेरिट पर – फिर भेदभाव क्यों?
यह कोई अस्थायी, बिना योग्यता वाले लोग नहीं हैं। अतिथि शिक्षक:
सरकार द्वारा निर्धारित सभी मापदंड पूरे करते हैं
आवश्यक शैक्षिक योग्यता रखते हैं
मेरिट के आधार पर चयनित होते हैं
वर्षों से निरंतर सेवाएं दे रहे हैं
इसके बावजूद उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है मानो वे दूसरे दर्जे के नागरिक हों।
जब संविदा कर्मचारियों और दैनिक वेतन भोगियों को नियमितीकरण का लाभ दिया जा सकता है, तो फिर अतिथि शिक्षकों को इससे बाहर क्यों रखा गया? क्या शिक्षा विभाग का शिक्षक होना कोई अपराध है?
आश्वासनों की राजनीति, निर्णयों का अकाल
माननीय मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री समय-समय पर यह कहते रहे हैं कि अतिथि शिक्षकों के भविष्य को सुरक्षित किया जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि—
आज तक कौन-सा ठोस निर्णय लिया गया?
कौन-सा नियम बनाया गया?
कौन-सी समय-सीमा तय की गई?
आश्वासन अगर निर्णय में न बदले जाएं, तो वे झूठे दिलासे बन जाते हैं। और आज अतिथि शिक्षक उन्हीं झूठे दिलासों की कीमत चुका रहे हैं।
शिक्षा व्यवस्था का मौन संकट
अगर अतिथि शिक्षक हतोत्साहित होंगे, आर्थिक संकट में फंसेंगे, तो उसका सीधा असर विद्यालयों और छात्रों पर पड़ेगा। पहले से ही पहाड़ों में शिक्षक अभाव है। ऐसे में यदि अतिथि शिक्षक व्यवस्था से टूटे, तो यह शिक्षा व्यवस्था के लिए घातक सिद्ध होगा।
क्या सरकार चाहती है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई पूरी तरह ठप हो जाए? क्या यह वही उत्तराखंड है, जो शिक्षा और संस्कार की भूमि कहलाता था?
संवेदनशीलता नहीं, सिर्फ़ आंकड़े
आज की सरकारें शिक्षक को इंसान नहीं, बल्कि फाइल और आंकड़ा समझने लगी हैं। उन्हें यह नहीं दिखता कि अतिथि शिक्षक भी इसी उत्तराखंड के नौजवान हैं, जिन्होंने पढ़ाई की, प्रतियोगिताएं दीं और फिर शिक्षा के क्षेत्र को चुना।
यह वही युवा हैं जिनसे सरकार ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ की बात करती है, लेकिन जब इनके हक की बात आती है, तो सरकार मौन हो जाती है।
न्यूनतम मांगें, अधिकतम अनदेखी
अतिथि शिक्षक कोई असंभव मांग नहीं कर रहे हैं। उनकी मांगें बेहद साधारण और न्यायसंगत हैं—
जनवरी और जून माह का वेतन तत्काल जारी किया जाए
वेतन भुगतान में अधिकारियों की मनमानी पर रोक लगे
अतिथि शिक्षकों के लिए स्पष्ट सेवा नियम बनाए जाएं
नियमितीकरण की प्रक्रिया पर गंभीरता से विचार हो
वर्षों की सेवा का सम्मान किया जाए
क्या यह मांगें किसी भी संवेदनशील सरकार के लिए ज्यादा हैं?
भविष्य की चेतावनी
यदि सरकार ने समय रहते अतिथि शिक्षकों की सुध नहीं ली, तो यह आंदोलन केवल धरना-प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहेगा। यह असंतोष शिक्षा व्यवस्था में गहरी दरार पैदा करेगा।
उत्तराखंड जैसे छोटे और संवेदनशील राज्य में शिक्षक वर्ग को नाराज़ करना राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर भारी पड़ सकता है।
सरकार से अंतिम अपील
यह संपादकीय सरकार से आग्रह करता है कि—
अतिथि शिक्षकों को बोझ नहीं, संपत्ति समझा जाए
शिक्षा विभाग के जमीनी हालात को गंभीरता से देखा जाए
अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए
और सबसे महत्वपूर्ण—अतिथि शिक्षकों को भी सम्मानजनक भविष्य दिया जाए
शिक्षक अगर असुरक्षित है, तो शिक्षा सुरक्षित नहीं हो सकती।
और अगर शिक्षा कमजोर हुई, तो उत्तराखंड का भविष्य अंधकारमय होगा।
अब भी समय है—सरकार चाहे तो इतिहास में संवेदनशील शासन के रूप में याद की जा सकती है, वरना अतिथि शिक्षकों की यह पीड़ा आने वाले समय में सरकार के खिलाफ एक मौन जनआंदोलन बन सकती है।


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