देवभूमि बनाम व्यूज़ की भूख: उत्तराखंड और हरियाणा के यूट्यूबर आखिर समाज को कहाँ ले जा रहे हैं?
उत्तराखंड और हरियाणा के बीच इन दिनों सोशल मीडिया पर जो माहौल बनाया जा रहा है, वह बेहद चिंताजनक है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
कुछ वायरल वीडियो, कुछ स्थानीय विवाद, कुछ सड़क पर हुई झड़पें और कुछ उकसाऊ बयान — इन सबको मिलाकर ऐसा वातावरण तैयार कर दिया गया है मानो दो राज्यों के लोग एक-दूसरे के दुश्मन हों। जबकि सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है।
असलियत यह है कि उत्तराखंड और हरियाणा के बीच वर्षों से गहरे सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और मानवीय संबंध रहे हैं। हरियाणा के लाखों लोग हरिद्वार, ऋषिकेश, केदारनाथ और बदरीनाथ आते हैं। उत्तराखंड के हजारों युवक-युवतियाँ गुरुग्राम, फरीदाबाद, पंचकूला और चंडीगढ़ में नौकरी करते हैं। दोनों राज्यों के बीच रोटी-बेटी, व्यापार और आस्था का रिश्ता है। लेकिन आज कुछ यूट्यूबर, फेसबुक पेज चलाने वाले लोग और तथाकथित “इन्फ्लुएंसर” इस रिश्ते को व्यूज़ और पैसों के लिए जहर में बदलने पर तुले हुए हैं।
हर घटना को “हरियाणा बनाम उत्तराखंड” बनाने की बीमारी
अगर किसी पर्यटक ने बदतमीजी की, शराब पीकर हुड़दंग किया, महिलाओं से अभद्रता की या पहाड़ों के नियम तोड़े — तो कार्रवाई उस व्यक्ति पर होनी चाहिए। लेकिन सोशल मीडिया के कुछ लोग हर अपराधी को पूरे हरियाणा का प्रतिनिधि बताने लगते हैं। दूसरी ओर हरियाणा के कुछ यूट्यूबर भी आग में घी डालते हुए कहते हैं कि “उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था हम चलाते हैं”, “बॉयकॉट करो”, “मत जाओ वहां” आदि।
यह कैसी भाषा है? क्या पर्यटन का मतलब किसी राज्य को एहसान दिखाना है? क्या तीर्थस्थलों पर जाकर कानून तोड़ने का लाइसेंस मिल जाता है?
सच्चाई यह है कि कुछ लोग पर्यटक बनकर नहीं, बल्कि अराजक मानसिकता लेकर पहाड़ों में आते हैं। गंगा घाटों पर शराब पीना, हुक्का पीना, तेज गाड़ी चलाना, पहाड़ी सड़कों पर स्टंट करना, स्थानीय महिलाओं पर टिप्पणी करना और धार्मिक स्थलों को पिकनिक स्पॉट समझना — यह सब बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। देवभूमि की मर्यादा का सम्मान करना हर आने वाले की जिम्मेदारी है।
लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि हरियाणा के हर व्यक्ति को अपराधी घोषित कर दिया जाए। लाखों लोग श्रद्धा और सम्मान के साथ उत्तराखंड आते हैं। कुछ बिगड़े लोगों की वजह से पूरे समाज को कटघरे में खड़ा करना भी गलत है।
सबसे बड़ा दोषी: सोशल मीडिया की जहरीली कमाई
आज यूट्यूब और फेसबुक का एल्गोरिद्म गुस्सा बेचता है। जितना विवाद, उतने व्यूज़। जितनी गाली, उतनी कमाई। यही कारण है कि दोनों राज्यों के कई यूट्यूबर जानबूझकर माहौल भड़का रहे हैं।
कोई वीडियो बनाकर कहता है — “हरियाणा वालों का बहिष्कार करो।”
दूसरा जवाब देता है — “उत्तराखंड वालों को सबक सिखाओ।”
तीसरा अपने चैनल पर “ब्रेकिंग” लगाकर दोनों पक्षों की गालियाँ दिखाता है।
चौथा फर्जी नैरेटिव बनाकर युवाओं को उकसाता है।
इन लोगों का मकसद समाज सुधार नहीं, बल्कि सुपरचैट, विज्ञापन और फॉलोअर्स बढ़ाना है। इन्हें न उत्तराखंड की संस्कृति से मतलब है और न हरियाणा की इज्जत से। इन्हें सिर्फ अपने चैनल की ग्रोथ चाहिए।
आज हालत यह हो गई है कि गांव के छोटे विवाद भी कैमरा लेकर लाइव कर दिए जाते हैं। पंचायतों से सुलझने वाले मामलों को “राज्य बनाम राज्य” बना दिया जाता है। स्थानीय झगड़े को “उत्तराखंड की अस्मिता” और “हरियाणा का अपमान” बनाकर बेचा जा रहा है।
महिला प्रधान और 85 वर्षीय बुजुर्ग वाला मामला: संवेदनशीलता खत्म हो चुकी है
उत्तराखंड में हाल का वह मामला भी बेहद दुखद रहा जिसमें एक महिला प्रधान और कुछ सोशल मीडिया संचालकों ने एक 85 वर्षीय बुजुर्ग को सार्वजनिक रूप से निशाना बना दिया। ऐसा विवाद, जिसे गांव के लोग बैठकर शांति से सुलझा सकते थे, उसे कैमरे और लाइव वीडियो के जरिए तमाशा बना दिया गया।
आज गांवों में न्याय पंचायत से कम और यूट्यूब चैनलों से ज्यादा होने लगा है। लोग पहले कैमरा ऑन करते हैं, बाद में सच्चाई देखते हैं। किसी बुजुर्ग की इज्जत, किसी परिवार की प्रतिष्ठा, किसी महिला की निजता — इन सबकी कीमत अब व्यूज़ से कम हो गई है।
यह प्रवृत्ति बेहद खतरनाक है। उत्तराखंड की मूल संस्कृति संवाद, सम्मान और सामूहिक समाधान की रही है। लेकिन कुछ लोग इसे भी “कंटेंट” में बदल रहे हैं।
हरियाणा के युवाओं को भी समझना होगा
हरियाणा के युवाओं को यह समझना होगा कि उत्तराखंड कोई “वीकेंड एंटरटेनमेंट ज़ोन” नहीं है। यह देवभूमि है, आस्था का केंद्र है, संवेदनशील पहाड़ी समाज है।
यदि आप वहां जाते हैं तो:
स्थानीय संस्कृति का सम्मान करें।
गंगा घाटों पर शराब और हुक्का संस्कृति न फैलाएँ।
महिलाओं के प्रति अभद्र व्यवहार न करें।
पहाड़ों पर स्टंटबाजी और ओवरस्पीडिंग न करें।
धार्मिक स्थलों को पार्टी स्पॉट न बनाएं।
पर्यटक और तीर्थयात्री में फर्क होता है। पर्यटक मनोरंजन खोजता है, तीर्थयात्री मर्यादा लेकर चलता है। उत्तराखंड में आने वाला हर व्यक्ति यदि तीर्थयात्री जैसी संवेदनशीलता रखेगा तो आधे विवाद स्वतः खत्म हो जाएंगे।
लेकिन उत्तराखंड के कट्टर डिजिटल ठेकेदार भी कम दोषी नहीं
उत्तराखंड के कुछ स्वयंभू “संस्कृति रक्षक” भी कम खतरनाक नहीं हैं। ये हर बाहरी व्यक्ति को दुश्मन दिखाने लगते हैं। किसी एक घटना के बाद पूरे राज्य को गाली देना, “बाहरी बनाम स्थानीय” का जहर फैलाना और युवाओं को भड़काना भी उतना ही गलत है।
कुछ लोग खुद उत्तराखंड की छवि खराब कर रहे हैं। हर वीडियो में गुस्सा, हर पोस्ट में नफरत और हर बयान में उकसावा — इससे राज्य की पर्यटन छवि खराब होती है। छोटे दुकानदार, टैक्सी चालक, होटल मालिक और स्थानीय रोजगार सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।
सरकार और पुलिस की चुप्पी भी जिम्मेदार
सबसे बड़ा सवाल उत्तराखंड सरकार और प्रशासन पर भी उठता है। जब सोशल मीडिया पर लगातार भड़काऊ वीडियो वायरल हो रहे थे, तब समय रहते स्पष्ट संदेश क्यों नहीं दिया गया?
सरकार को चाहिए कि:
दोनों राज्यों के पुलिस अधिकारियों की संयुक्त बैठक हो।
सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने वालों की पहचान हो।
फर्जी वीडियो और उकसाऊ कंटेंट पर तुरंत कार्रवाई हो।
धार्मिक और पर्यटन स्थलों पर सख्त आचार संहिता लागू की जाए।
हुड़दंग करने वालों पर राज्य देखकर नहीं, अपराध देखकर कार्रवाई हो।
हरियाणा सरकार को भी अपने युवाओं को जिम्मेदार पर्यटन का संदेश देना चाहिए।
असली उत्तराखंड और असली हरियाणा सोशल मीडिया से अलग है
सोशल मीडिया पर जो लड़ाई दिख रही है, वह जमीन पर उतनी बड़ी नहीं है। असली उत्तराखंड वह है जहां लोग अतिथि को भगवान मानते हैं। असली हरियाणा वह है जहां लोग दिल खोलकर मेहमाननवाजी करते हैं।
लेकिन अगर यूट्यूबरों और फेसबुकिया राजनीति को नहीं रोका गया, तो आने वाले समय में यह जहर समाज में उतर सकता है। तब नुकसान सिर्फ दो राज्यों का नहीं होगा, बल्कि पूरे उत्तर भारत की सामाजिक एकता का होगा।
समय आ गया है कि समाज तय करे — क्या हम अपनी संस्कृति बचाना चाहते हैं या उसे यूट्यूब की कमाई के लिए बेच देना चाहते हैं?
देवभूमि की मर्यादा भी जरूरी है और इंसानियत की मर्यादा भी। कानून का राज भी जरूरी है और सामाजिक जिम्मेदारी भी। जो भी व्यक्ति — चाहे वह हरियाणा का हो या उत्तराखंड का — नफरत फैलाए, कानून तोड़े, महिलाओं का अपमान करे या समाज को बांटे, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
लेकिन किसी पूरे राज्य से नफरत करना समाधान नहीं, बल्कि नई समस्या की शुरुआत है।
