रुद्रपुर। उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की “धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा” ने जिस तरह जसपुर से हल्द्वानी तक राजनीतिक माहौल बनाया है, उसने कांग्रेस संगठन के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बीमारी से उबरने के बाद हरीश रावत सड़क पर उतरे तो रास्ते में स्वागत, कार्यकर्ताओं की मौजूदगी, समर्थकों का उत्साह और देर रात तक लोगों के इंतजार ने यह संकेत जरूर दिया कि उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत का जनाधार अभी समाप्त नहीं हुआ है।
सवाल अब यह है कि जब एक वरिष्ठ नेता अपने दम पर जनता के बीच जाता है और हजारों लोग उसके साथ जुड़ते दिखाई देते हैं, तो कांग्रेस संगठन उस ऊर्जा को किस नजर से देखता है?
क्या इसे पार्टी की ताकत माना जाएगा या फिर व्यक्तिगत राजनीतिक गतिविधि?
यही वह सवाल है, जिसका जवाब उत्तराखंड कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को देना होगा।
हरीश रावत ने जसपुर से हल्द्वानी तक की यात्रा के दौरान बेरोजगारी, नशा, अपराध, महिलाओं की सुरक्षा और उत्तराखंड के स्वाभिमान जैसे मुद्दों को उठाया। उन्होंने अपने स्वास्थ्य, ईडी-सीबीआई से जुड़े विवादों और अपने लंबे राजनीतिक जीवन पर भी जनता से खुलकर संवाद किया।
लेकिन इस पूरी यात्रा का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश भाषणों से ज्यादा सड़क पर दिखाई दिया जनसमर्थन रहा।
भीड़ को पढ़ना होगा कांग्रेस नेतृत्व को
राजनीति में भीड़ हमेशा चुनावी जीत की गारंटी नहीं होती, लेकिन भीड़ को नजरअंदाज करना भी राजनीतिक भूल हो सकती है।
जसपुर से शुरू हुआ कारवां काशीपुर, रामनगर, कालाढूंगी और हल्द्वानी तक पहुंचा। रास्ते में स्वागत कार्यक्रम हुए। कई स्थानों पर लोग देर रात तक इंतजार करते रहे। कार्यकर्ता वाहनों के काफिले के साथ चलते दिखाई दिए।
यह दृश्य कांग्रेस के लिए सिर्फ खुशी का विषय नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी है।
यदि हरीश रावत आज भी इतनी बड़ी संख्या में लोगों को सड़क पर ला सकते हैं तो पार्टी को यह समझना होगा कि उनके राजनीतिक अनुभव, जनसंपर्क और व्यक्तिगत स्वीकार्यता को संगठन की सामूहिक शक्ति में कैसे बदला जाए।
कांग्रेस को हरदा की भीड़ से डरने की नहीं, उसे पढ़ने की जरूरत है।
सैलजा कुमारी के सामने सबसे बड़ा सवाल
उत्तराखंड कांग्रेस प्रभारी कुमारी सैलजा की भूमिका को लेकर भी अब राजनीतिक सवाल उठना स्वाभाविक है।
कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने उत्तराखंड में संगठन को मजबूत करने और गुटबाजी पर नियंत्रण की जिम्मेदारी प्रदेश प्रभारी के रूप में सैलजा कुमारी को दी है। ऐसे में सवाल यह है कि पार्टी के इतने वरिष्ठ नेता की यात्रा को संगठनात्मक दृष्टि से किस तरह देखा जा रहा है?
क्या कांग्रेस नेतृत्व ने इस जनसमर्थन का राजनीतिक आकलन किया है?
क्या पार्टी ने यह जानने की कोशिश की कि आखिर हरीश रावत के साथ इतनी बड़ी संख्या में लोग क्यों जुड़ रहे हैं?
क्या इस ऊर्जा को कांग्रेस की चुनावी रणनीति में शामिल करने की कोई स्पष्ट योजना है?
या फिर पार्टी अभी भी नेताओं के बीच संतुलन साधने की ऐसी राजनीति में उलझी हुई है, जिसमें जमीन पर दिखाई देने वाले जनसमर्थन की तुलना में संगठनात्मक समीकरण अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं?
ये सवाल किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ आरोप नहीं हैं, बल्कि कांग्रेस की भविष्य की रणनीति से जुड़े सवाल हैं।
कांग्रेस को नसीहत—चेहरे को कमजोर करके संगठन मजबूत नहीं होता
उत्तराखंड कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपने लोकप्रिय नेताओं को एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखना बंद करे।
हरीश रावत का अपना जनाधार है। प्रीतम सिंह की अपनी राजनीतिक पहचान है। गणेश गोदियाल, यशपाल आर्य और दूसरे वरिष्ठ नेताओं की अपनी स्वीकार्यता है। युवा नेताओं की भी अपनी भूमिका है।
कांग्रेस यदि इन सभी चेहरों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करेगी तो नुकसान पार्टी का होगा।
2027 की लड़ाई केवल एक नेता की लड़ाई नहीं होगी। यह संगठन, बूथ, कार्यकर्ता और जनता के बीच लगातार संवाद की लड़ाई होगी।
ऐसे में हरीश रावत को सीमित करने के बजाय उनकी लोकप्रियता को पार्टी की ताकत में बदलना कांग्रेस के हित में होगा।
हरदा की राजनीतिक शैली को नजरअंदाज करना आसान नहीं
हरीश रावत की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता उनका जनता के बीच सीधे जाना है।
वह गांव, बाजार, किसान, पहाड़, मैदान, लोक संस्कृति और स्थानीय भावनाओं को अपनी राजनीतिक भाषा में शामिल करते रहे हैं। यही कारण है कि उनकी राजनीति केवल पार्टी संगठन तक सीमित नहीं रहती।
“उठो दगड़ियो, मुछाल जलाओ” जैसे पुराने सर्वोदयी गीत को याद करना भी इसी राजनीतिक शैली का हिस्सा है।
रावत बेरोजगारी, नशे और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाते हैं तो वह खुद को केवल कांग्रेस नेता के रूप में नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पुराने सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष से जुड़े चेहरे के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
यही उनकी ताकत है।
कांग्रेस नेतृत्व को इसी ताकत को समझने की जरूरत है।
सैलजा कुमारी को तय करना होगा—व्यक्ति बड़ा या संगठन?
प्रदेश प्रभारी के सामने असली चुनौती यही है कि पार्टी के भीतर मौजूद अलग-अलग राजनीतिक धाराओं को किस तरह एक मंच पर लाया जाए।
यदि किसी नेता की लोकप्रियता बढ़ती दिखाई दे रही है तो संगठन का काम उसे रोकना नहीं, बल्कि पार्टी के पक्ष में इस्तेमाल करना होना चाहिए।
हरीश रावत की यात्रा में उमड़ी भीड़ ने कांग्रेस को एक राजनीतिक अवसर दिया है।
सवाल यह है कि कांग्रेस उस अवसर को स्वीकार करेगी या फिर उसे आंतरिक समीकरणों की नजर से देखेगी?
सैलजा कुमारी के लिए यह एक बड़ी राजनीतिक परीक्षा भी है।
उन्हें यह साबित करना होगा कि प्रदेश प्रभारी की भूमिका केवल संगठनात्मक बैठकों और नेताओं के बीच संतुलन तक सीमित नहीं है, बल्कि जनता के बीच दिखाई दे रही राजनीतिक ऊर्जा को चुनावी रणनीति में बदलना भी उनकी जिम्मेदारी है।
2027 से पहले कांग्रेस के सामने खुली किताब
उत्तराखंड में 2027 का विधानसभा चुनाव अब बहुत दूर नहीं है। भाजपा संगठनात्मक स्तर पर लगातार सक्रिय है। सरकार अपने कामकाज को लेकर जनता के बीच जाने की तैयारी में है।
ऐसे समय में कांग्रेस को यह तय करना होगा कि उसका चुनावी चेहरा क्या होगा, उसका संदेश क्या होगा और जनता के बीच उसका सबसे मजबूत राजनीतिक नेटवर्क कौन तैयार करेगा।
हरीश रावत की यात्रा ने एक बात साफ कर दी है—हरदा अभी राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक नहीं हुए हैं।
उनकी उम्र, स्वास्थ्य या सक्रिय राजनीति से दूरी की अटकलों के बावजूद जब वह सड़क पर उतरते हैं तो कार्यकर्ता और समर्थक उनके पीछे दिखाई देते हैं।
इस तथ्य को कांग्रेस नेतृत्व जितनी जल्दी स्वीकार करेगा, पार्टी के लिए उतना ही बेहतर होगा।
भीड़ सिर्फ स्वागत नहीं, राजनीतिक संकेत भी है
जसपुर से हल्द्वानी तक उमड़ी भीड़ को केवल फूल-मालाओं और स्वागत समारोहों तक सीमित करके देखना कांग्रेस की बड़ी भूल होगी।
राजनीति में जनता का मूड समझना पड़ता है।
यह भीड़ कांग्रेस के लिए कह रही है कि उत्तराखंड में पुराने राजनीतिक चेहरे अभी भी प्रभाव रखते हैं।
यह भीड़ यह भी कह रही है कि संगठन और नेतृत्व के बीच जमीन से संवाद का अंतर नहीं होना चाहिए।
और शायद सबसे बड़ा संदेश यह है कि 2027 की लड़ाई दिल्ली के कमरों में बैठकर नहीं, उत्तराखंड की सड़कों पर जनता के बीच जाकर लड़ी जाएगी।
कांग्रेस के लिए अंतिम सवाल
कांग्रेस के पास अभी समय है।
हरीश रावत की जनस्वीकार्यता को संगठन की ताकत बनाया जा सकता है। वरिष्ठ नेताओं को एक मंच पर लाया जा सकता है। युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाया जा सकता है। बूथ स्तर पर संगठन को सक्रिय किया जा सकता है।
लेकिन इसके लिए नेतृत्व को व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से ऊपर उठना होगा।
सैलजा कुमारी के सामने भी यही चुनौती है कि वह उत्तराखंड कांग्रेस को गुटों में बंटी पार्टी के रूप में नहीं, बल्कि एकजुट राजनीतिक विकल्प के रूप में जनता के सामने पेश करें।
हरीश रावत की यात्रा ने कांग्रेस को आईना दिखा दिया है।
अब फैसला कांग्रेस नेतृत्व को करना है—
क्या वह आईने में दिखाई दे रही तस्वीर को स्वीकार करेगा?
या फिर 2027 तक भी वही पुरानी अंदरूनी खींचतान जारी रहेगी?
क्योंकि उत्तराखंड की जनता को अब भाषण नहीं, एकजुट विपक्ष और स्पष्ट विकल्प चाहिए।
और जसपुर से हल्द्वानी तक हरदा के साथ दिखाई दिया जनसमर्थन कांग्रेस के लिए शायद यही सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है—
“जिस चेहरे के साथ जनता सड़क पर खड़ी हो रही है, उसे संगठन की दीवारों के भीतर कमजोर मत कीजिए; उसे कांग्रेस की चुनावी ताकत बनाइए।”
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | राजनीतिक विश्लेषण
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
जसपुर से हल्द्वानी तक उमड़ा जनसैलाब क्या कांग्रेस नेतृत्व के लिए चेतावनी है? सैलजा कुमारी की रणनीति भी सवालों के घेरे में
