कशिश की चीखें आज भी गूंज रही हैं—न्याय दो या समाज की चुप्पी कल इतिहास को शर्मिंदा करेगी।”

Spread the love



उत्तराखंड की मासूम कशिश का मामला आज केवल एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि पूरे समाज की अंतरात्मा पर चोट है। वर्ष 2014 में हुई इस विभत्स घटना ने हर संवेदनशील इंसान को झकझोर दिया था। नैनीताल हाईकोर्ट व पॉकसो कोर्ट ने 2019 में दोषी को फांसी की सजा सुनाकर यह भरोसा जगाया था कि न्याय अभी जीवित है। लेकिन हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आरोपी को बरी किए जाने ने न केवल पीड़ित परिवार, बल्कि पूरे समाज को निराश और क्षुब्ध किया है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

न्यायालय की दलीलों में जहाँ पुलिस जांच की खामियाँ बताई गईं, वहीं आम नागरिकों के मन में यह सवाल और गहरा हुआ कि आखिर दस साल तक न्यायालय और एजेंसियाँ क्या कर रही थीं? अगर जांच गलत थी तो जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि साक्ष्य कमजोर थे तो इतने वर्षों तक परिवार को उम्मीद में क्यों रखा गया?

इस निर्णय के खिलाफ पिथौरागढ़ सहित पूरे उत्तराखंड में आक्रोश दिखाई दिया। देहरादून तक कैंडिल मार्च और प्रदर्शन इस बात का प्रमाण हैं कि समाज अन्याय के सामने अब चुप नहीं रहेगा। प्रदेश सरकार का सर्वोच्च न्यायालय में रिव्यू पिटीशन दाखिल करने का निर्णय स्वागत योग्य है। यह केवल कशिश के लिए न्याय की लड़ाई नहीं, बल्कि हर बेटी के सम्मान और सुरक्षा की लड़ाई है।

आज जरूरत है कि हम सब एकजुट होकर यह संदेश दें कि अपराधी चाहे कितना भी चालाक क्यों न हो, नन्हीं परियों की चीखें कभी दबाई नहीं जा सकतीं। न्यायपालिका और सरकार को यह समझना होगा कि न्याय में देरी और फैसलों का विरोधाभास समाज की आस्था को गहरी चोट पहुंचाते हैं।


“कशिश की चीखें आज भी गूंज रही हैं—न्याय दो या समाज की चुप्पी कल इतिहास को शर्मिंदा करेगी।”


उत्तराखंड की मासूम कशिश आज हमारे सामने सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक प्रश्न बनकर खड़ी है। प्रश्न यह कि जब इंसाफ बिक रहा था, तब पूरा समाज कहाँ था? क्या आने वाली पीढ़ियों को यह कहना पड़ेगा कि “जब अदालतें चुप थीं, जब अपराधी हँस रहे थे, तब समाज भी मौन था”?

2014 में पिथौरागढ़ की नन्ही कशिश के साथ जो हुआ, उसने हमारी आत्मा को झकझोरा था। मासूम का बलात्कार, अमानवीय क्रूरता और फिर हत्या—इतनी विभत्स घटना कि शब्द भी कांप उठें। 2019 में नैनीताल हाईकोर्ट और पॉकसो कोर्ट ने अपराधी को फांसी की सजा सुनाई। मगर 10 साल बाद सर्वोच्च न्यायालय ने उसे बाइज्जत बरी कर दिया। सवाल यह है—क्या इंसाफ इतना कमजोर है कि एक बच्ची की दर्दनाक चीखें भी अदालत तक न पहुंच पाईं?

अदालत से सवाल

मिलॉर्ड! अगर अपराधी निर्दोष है तो फिर दस साल तक अदालतें और जाँच एजेंसियाँ किसका नाटक करती रहीं? अगर जाँच अधिकारी दोषी थे तो उन पर मुकदमा क्यों नहीं? अगर अदालतों ने ही साक्ष्य को दस साल तक घसीटने दिया तो उस देरी का जवाब कौन देगा? पीड़ित परिवार किसके पास जाए?

यह विरोधाभास न केवल न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाता है, बल्कि उस विश्वास को भी हिला देता है, जिसके सहारे आम नागरिक अदालत की चौखट पर जाता है।

समाज की जिम्मेदारी

धन्य हैं पिथौरागढ़ और उत्तराखंड के वे लोग, जिन्होंने परिजनों का दर्द अपना दर्द समझकर सड़कों पर उतरने का साहस दिखाया। यही सामूहिक आवाज असली ताकत है। कैंडल मार्च सिर्फ प्रतीक नहीं, बल्कि संदेश है कि समाज अभी मरा नहीं है।

पर क्या सिर्फ सड़कों पर उतरना काफी है? क्या हम सब अपनी जिम्मेदारी को केवल पोस्ट शेयर करने या नारे लगाने तक सीमित कर देंगे? नहीं! आज हमें एकजुट होकर यह तय करना होगा कि आने वाली पीढ़ियों को कभी यह न कहना पड़े कि “जब इंसाफ बिक रहा था, तब पूरा समाज चुप था।”

सत्ता और न्यायपालिका को चेतावनी

हम यह भी नहीं भूल सकते कि ऐसे फैसले धीरे-धीरे समाज का विश्वास खत्म करते हैं। नेपाल का उदाहरण हमारे सामने है—जनता का आक्रोश जब ज्वालामुखी बनकर फूटता है, तो कोई भी व्यवस्था उसे रोक नहीं पाती। अदालतों को समझना होगा कि न्याय केवल किताबों का शब्द नहीं, बल्कि जनभावनाओं का जीवन है।

उम्मीद की किरण

प्रदेश सरकार ने रिव्यू पिटीशन दाखिल करने का निर्णय लिया है। यह स्वागतयोग्य है। पीड़ित परिवार की लड़ाई और साहस हम सबके लिए प्रेरणा है। अब यह लड़ाई केवल एक परिवार की नहीं रही, यह पूरे समाज की लड़ाई है।

अंतिम सवाल

कशिश उस रात कितनी चीखी होगी? कितनी बार उसने मदद की पुकार लगाई होगी? शायद उसकी आवाज जंगल की खामोशी में दब गई। पर अब उसकी आवाज हम सबकी आवाज बननी चाहिए।


हमारी यह पुकार है कि न्यायालय, सरकार और समाज तीनों मिलकर सुनिश्चित करें कि कोई और कशिश इंसाफ से वंचित न रह जाए। अगर हम आज मौन रहे तो इतिहास हमें कभी माफ़ नहीं करेगा।



Spread the love