नैनीताल। अलग उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौर में हुए मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा में महिला आंदोलनकारियों से दुष्कर्म, अत्याचार, आंदोलनकारियों पर गोलीबारी की घटना के अधिकांश आरोपितों को तीन दशक बाद भी सजा नहीं मिल सकी है।

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इस मामले में सीबीआइ की स्टेटस रिपोर्ट में बड़ा रहस्य उजागर हुआ है।

रिपोर्ट के साथ संलग्न मुजफ्फरनगर जिले के कोर्ट के निर्णय में उल्लेख किया गया है कि सरकार की ओर से अभियोजन की स्वीकृति नहीं दी गई है। इस आधार पर कोर्ट ने कहा है कि तत्कालीन डीएम के अलावा एसपी राजेंद्र पाल सिंह, एएसपी महेश कुमार मिश्रा, सीओ गीता प्रसाद नैनवाल एवं जगदीश सिंह के विरुद्ध आरोप तय करने का कोई विधिक आधार नहीं है। इस आधार पर इन आरोपितों को बरी किया गया है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड

न्याय दिलाने को लड़ रहे याचिकाकर्ता हैरान

इस निर्णय के दो दशक बाद सामने आने से राज्य आंदोलनकारियों को न्याय दिलाने को लड़ रहे याचिकाकर्ता हैरान हैं और उन्होंने सवाल उठाया कि जब राज्यपाल ने अनुमति दे दी तो अभियोजन की ओर से इसको क्यों छिपाया गया। यहां तक कि सीबीआइ की ओर से इस निर्णय के बारे में आज तक चुप्पी क्यों रखी है।

अपर सत्र न्यायाधीश जयप्रकाश प्रथम की कोर्ट से 28 सितंबर 2005 में अनंत कुमार सिंह व अन्य के केस में पारित निर्णय के अनुसार इलाहाबाद हाई कोर्ट के 22 अप्रैल 2004 के प्रशासनिक आदेश के आधार पर सीबीआई के अधिवक्ता से आरोपितों पर आरोप तय करने के संबंध में जानकारी ली।

पांच पेज के आदेश में इन अधिकारियों का कहना था कि आंदोलनकारियों की भीड़ को तितर बितर करने के लिए कार्रवाई की गई। ऐसा अपराध अपने कर्तव्य के निर्वहन में किया गया, ऐसे में इन अधिकारियों पर आरोप तय करने के लिए राज्य सरकार की पूर्व अनुमति ली जाए।

1995 में ही मिल गई थी अनुमति

नैनीताल : मुजफ्फरनगर कांड मामले में आरोपितों को सजा दिलाने के लिए तीन दशक से संघर्षरत राज्य आंदोलनकारी अधिवक्ता रमन कुमार शाह ने बताया  उत्तर प्रदेश गृह विभाग का 21 नवंबर 1995 का पत्र उपलब्ध कराया, जिसमें साफ कहा है कि पहली व दो अक्टूबर 1994 को मुजफ्फरनगर में डीएम अनंत कुमार सिंह, एसपी राजेंद्र पाल सिंह, एडीएम विनोद पंवार, मेरठ जोन के आइजी एसएम नसीम, डीआइजी बुआ सिंह, एएसपी महेश कुमार मिश्रा, सीओ गीता प्रसाद नैनवाल सहित थानाध्यक्ष राधेमोहन द्विवेदी, राजबीर सिंह, निरीक्षक मोती सिंह आदि लोकसेवक नियुक्त थे। आंदोलनकारी दो अक्टूबर को दिल्ली रैली में जा रहे थे।

लोकसेवकों ने आपराधिक षडयंत्र कर मुजफ्फरनगर के थाना छापड़ में रुड़की रोड पर रामपुर तिराहा पर आंदोलनकारियों को रोककर उनके दिल्ली जाने में बाधा डाली। इलाहाबाद हाई कोर्ट में उत्तराखंड संघर्ष समिति की ओर से याचिका दायर की गई, जिसमें कोर्ट ने समस्त मामलों की सीबीआइ जांच के आदेश पारित किए। विवेचना के आधार पर सीबीआइ ने अनंत कुमार सिंह, राजेंद्र पाल सिंह सहित अन्य के विरुद्ध अभियोजन चलाने की अनुमति मांगी।

राज्यपाल की अनुमति से जारी पत्र में विशेष सचिव जयदयाल पुरी ने कहा है कि राज्यपाल ने इन लोकसेवकों को अभियोजित करने और इस संबंध में कार्रवाई करने की स्वीकृति प्रदान की गई। शाह का कहना है कि इस स्वीकृति पत्र के बाद ही उत्तराखंड हाई कोर्ट ने 2003 में तत्कालीन डीएम अनंत कुमार सिंह को बरी करने का आदेश वापस ले लिया था, लेकिन यह आदेश उनके पास तो है लेकिन कोर्ट की वेबसाइट में नहीं है।

सीबीआइ ने दो दशक बाद तत्कालीन डीएम सहित अन्य अधिकारियों के मुजफ्फरनगर कोर्ट से बरी होने का आदेश स्टेटस रिपोर्ट के साथ संलग्न किया है। हाई कोर्ट ने रामपुर तिराहा कांड मामले में दर्ज छह केसों की स्टेटस रिपोर्ट मांगी थी। रामपुर तिराहा कांड में सात महिलाओं के साथ दुष्कर्म हुआ, 17 महिला आंदोलनकारियों को प्रताड़ित किया गया, सात आंदोलनकारियों की पुलिस गोलीबारी में मौत हो गई। जब राज्यपाल से अभियोजन की स्वीकृति मिली थी तो कोर्ट में क्यों पेश नहीं की गई। सीबीआइ की स्टेटस रिपोर्ट में संलग्न कोर्ट के आदेश से निराशा जरूर हुई है, लेकिन आरोपितों को सजा दिलाने तक न्यायिक लड़ाई जारी रहेगी। – रमन कुमार शाह, राज्य आंदोलनकारी अधिवक्ता


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