त्योहारों में शुद्धता का संकल्प और रुद्रपुर की गलियों में मिलावट का मायाजाल

Spread the love

रुद्रपुर क्रिसमस और नववर्ष के अवसर पर उत्तराखंड सरकार द्वारा शुरू किया गया राज्यव्यापी विशेष खाद्य सुरक्षा अभियान कागज़ों में जितना सशक्त और जनहितकारी दिखाई देता है, ज़मीनी हकीकत—खासकर रुद्रपुर और उधम सिंह नगर जनपद में—उतनी ही चिंताजनक और विरोधाभासी नज़र आती है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और स्वास्थ्य मंत्री डॉ. धन सिंह रावत के दिशा-निर्देशों के तहत खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन द्वारा चलाया जा रहा यह अभियान निश्चित रूप से एक सराहनीय पहल है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह अभियान वास्तव में “माफिया तंत्र” तक पहुँच पा रहा है या फिर वही पुराने छोटे-मोटे दुकानदार कार्रवाई का आसान निशाना बन रहे हैं?

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

रुद्रपुर शहर और पूरी विधानसभा क्षेत्र की बात करें तो हर गली-मोहल्ले में 8×10 की दुकानों में खुली तथाकथित “दूध की डेरी” आज एक संगठित नेटवर्क का रूप ले चुकी हैं। इन डेयरियों में दूध, दही, मावा, छेना और खासतौर पर पनीर खुलेआम बिक रहा है—बिना किसी वैध लाइसेंस, बिना गुणवत्ता मानक और बिना यह बताए कि यह दूध आखिर आता कहाँ से है। सूत्रों के अनुसार रुद्रपुर शहर के भीतर ही लगभग 200 के आसपास ऐसी डेयरियाँ सक्रिय हैं, जबकि पूरे विधानसभा क्षेत्र में यह संख्या और भी अधिक बताई जा रही है।

सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या जिला प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग को इन “नकली डेयरियों” की जानकारी नहीं है? या फिर जानकारी होते हुए भी आंखें मूंद ली गई हैं? चर्चा आम है—और यह चर्चा केवल चाय की दुकानों तक सीमित नहीं—कि इन डेयरियों से संबंधित अधिकारियों को एक “निश्चित रकम” हर महीने पहुँचती है, जिसके बदले निरीक्षण की फाइलें ठंडी पड़ी रहती हैं और छापेमारी केवल कागज़ी खानापूर्ति बनकर रह जाती है। यदि यह सच नहीं है, तो फिर यह माफिया तंत्र वर्षों से निर्बाध रूप से कैसे फल-फूल रहा है?

खाद्य सुरक्षा के अपर आयुक्त ताजबर सिंह जग्गी और आयुक्त डॉ. आर. राजेश कुमार के बयान व्यवस्था की मंशा को स्पष्ट करते हैं—दंड नहीं, बल्कि जागरूकता और जवाबदेही। लेकिन रुद्रपुर की ज़मीनी सच्चाई यह बताती है कि यहां समस्या जागरूकता की नहीं, संरक्षण की है। जब बिना लाइसेंस, बिना रजिस्ट्रेशन और बिना किसी मानक के डेयरियाँ हर गली में खुल सकती हैं, तो यह व्यवस्था की विफलता नहीं तो और क्या है?

त्योहारों के मौसम में गुलाब जामुन, जलेबी, पनीर, केक और मिठाइयों की जांच की बात कही जा रही है, लेकिन सवाल यह है कि इन मिठाइयों में इस्तेमाल होने वाला मावा और पनीर किन हाथों से आ रहा है? क्या इन स्रोतों तक कार्रवाई पहुँच रही है या फिर केवल दुकानों के काउंटर तक सिमटकर रह जा रही है?

यह संपादकीय किसी एक अधिकारी या एक विभाग पर सीधा आरोप नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम पर एक कटाक्ष है—उस सिस्टम पर, जो अभियान तो चलाता है, लेकिन माफिया के ठिकानों तक पहुँचने से पहले ही थक जाता है। यदि वाकई सरकार का उद्देश्य जनस्वास्थ्य की रक्षा है, तो रुद्रपुर जैसे शहरों में डेरी माफिया पर कठोर, पारदर्शी और निरंतर कार्रवाई करनी होगी। केवल त्योहारों तक सीमित अभियान से शुद्ध भोजन की गारंटी नहीं दी जा सकती।

आज जरूरत है कि जिला प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग अपनी “दैनिक रिपोर्टिंग” को केवल फाइलों में नहीं, बल्कि जनता के सामने परिणामों के रूप में पेश करे। कौन-सी डेरी सील हुई, किस पर मुकदमा दर्ज हुआ और किस अधिकारी ने कार्रवाई की—यह सब सार्वजनिक होना चाहिए। तभी आमजन को यह भरोसा मिलेगा कि त्योहारों की मिठास में मिलावट नहीं, बल्कि शासन की ईमानदारी घुली हुई है।


Spread the love