उत्तराखंड वन विभाग के जीपीएस और सैटेलाइट चित्रों ने तराई से लेकर हिमालयी सीमांत तक एक गंभीर तस्वीर सामने रख दी है। तराई सेंट्रल और तराई वेस्ट में लगभग पाँच हजार हेक्टेयर वन भूमि पर अतिक्रमण, उधम सिंह नगर–नैनीताल के टाटा जंगल जैसे इलाकों में बढ़ते कब्जे, और उत्तरकाशी की टोंस–यमुना घाटी से होते हुए तिब्बत–चीन सीमा तक पहुँच—ये संकेत केवल वन प्रबंधन की चुनौती नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, कानून-व्यवस्था और सीमाई सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न बन चुके हैं।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
मुख्य वन संरक्षक एवं अतिक्रमण हटाओ अभियान के नोडल अधिकारी डॉ. पराग मधुकर धकाते के अनुसार सैटेलाइट डाटा से लगातार बढ़ते कब्जों की पुष्टि हुई है और सत्यापन के बाद कार्रवाई तय है। यह रेखांकित करना जरूरी है कि कार्रवाई कानून के अनुसार हो—वैध और अवैध के स्पष्ट भेद के साथ। किसी परिवार के पास एक हेक्टेयर से अधिक भूमि, या भूमि की खरीद–फरोख्त के प्रमाण मिलने पर वन अधिनियम के तहत कार्रवाई की बात स्वयं विभाग कह रहा है; यही प्रक्रिया न्यायसंगत मार्ग है।
बीते वर्षों में राजाजी और कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व से विस्थापन की नीति में आई खामियाँ भी आज की स्थिति की जड़ में दिखती हैं। 1998 के सर्वे में सीमित संख्या दर्ज होने के बावजूद विस्थापन के समय आंकड़ों का असामान्य बढ़ना, और बाद में पुनः जंगलों की ओर लौटने की प्रवृत्ति—यह दर्शाता है कि नीति, क्रियान्वयन और निगरानी तीनों में समन्वय नहीं रहा। यदि विस्थापन पैकेज का दुरुपयोग हुआ—जैसा कि जमीन बेचकर पहाड़ों की ओर डेरा डालने के आरोप हैं—तो यह सीधे-सीधे शासन की जवाबदेही का मामला है।
वन्यजीव अपराधों के संदर्भ में भी तथ्य और कानून सर्वोपरि हैं। हरिद्वार, आम पोखरा रेंज आदि में सामने आए मामलों में बरामदगी और स्वीकारोक्ति जैसी बातें रिकॉर्ड पर रही हैं। ऐसे मामलों में समुदाय-विशेष पर सामान्यीकरण करने के बजाय व्यक्तिगत अपराध के सिद्धांत पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव तस्करी के नेटवर्क का संकेत मिले तो केंद्रीय एजेंसियों के साथ समन्वित जांच अनिवार्य है।
हिमालयी सीमांत—गोविंद पशु विहार जैसे संवेदनशील क्षेत्रों—में मानव दखल केवल जैव-विविधता (हिम तेंदुआ, कस्तूरी मृग, मोनाल, ब्रह्मकमल) के लिए नहीं, बल्कि सीमा सुरक्षा के लिए भी चुनौती है। यदि किसी समय रोक के बावजूद राजनीतिक या गैर-सरकारी दबाव में आवाजाही फिर शुरू हुई, तो इसकी समीक्षा और पारदर्शी ऑडिट होना चाहिए।
उत्तरकाशी की टोंस–यमुना घाटी में स्थानीय संगठनों की चिंता—अवैध बसावट, मतदाता सूची में नाम, और आरक्षण से जुड़े दावों—एक और परत जोड़ती है। यहाँ भी समाधान भावनाओं से नहीं, दस्तावेज़ी सत्यापन से निकलेगा: निवास, आजीविका, जनजातीय दर्जा—सब कुछ विधिसम्मत प्रक्रिया से तय हो।
समाधान का रास्ता
- सैटेलाइट-आधारित सत्यापन: टाइम-सीरीज़ इमेजरी से अतिक्रमण की तारीखें तय हों।
- कानूनी कार्रवाई, बिना भेदभाव: अवैध कब्जा—चाहे कोई भी हो—हटे; वैध अधिकार सुरक्षित रहें।
- विस्थापन नीति का पुनर्मूल्यांकन: पैकेज, निगरानी और पोस्ट-विस्थापन फॉलो-अप सख्त हो।
- वन्यजीव अपराध पर जीरो टॉलरेंस: STF/ED/WCCB के साथ संयुक्त अभियान।
- सीमांत सुरक्षा समन्वय: वन विभाग–आईटीबीपी–स्थानीय प्रशासन की साझा रणनीति।
- स्थानीय सहभागिता: ग्राम सभाएँ, आजीविका विकल्प और जनजागरूकता।
उत्तराखंड के जंगल केवल हरियाली नहीं—वे आजीविका, जैव-विविधता और राष्ट्रीय सुरक्षा का कवच हैं। अतिक्रमण का प्रश्न यदि आज निर्णायक ढंग से नहीं सुलझा, तो कल इसकी कीमत जंगल, वन्यजीव और सीमांत—तीनों चुकाएँगे। कानून के दायरे में, तथ्य के आधार पर और पारदर्शिता के साथ उठाया गया कदम ही स्थायी समाधान है।

