मुजफ्फरनगर कांड और राज्य आंदोलन के जख्मों के बीच रुद्रपुर में लाल टोपी की दस्तक, लोकतंत्र बचाओ रैली ने उठाए उत्तराखंड की अस्मिता पर सवाल
रुद्रपुर। लोकतंत्र बचाओ के नारे के बीच रुद्रपुर की सड़कों पर जब लाल टोपी और लाल गमछे दिखाई दिए तो राजनीतिक सवालों का एक पुराना पन्ना अचानक खुल गया—क्या लोकतंत्र की लड़ाई में उत्तराखंड की मूल अवधारणा भी शामिल है या उसे राजनीतिक सुविधा के हिसाब से भुला दिया गया है?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड
कांग्रेस के लोकतंत्र बचाओ मार्च में समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हाजी अब्दुल मतीन सिद्दीकी सहित सपा नेताओं और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने उत्तराखंड की राजनीति में एक असहज सवाल जरूर खड़ा कर दिया है। सवाल किसी व्यक्ति की मौजूदगी का नहीं, उस राजनीतिक इतिहास का है जिसे उत्तराखंड का आंदोलनकारी समाज आज भी भूला नहीं है।
2 अक्टूबर 1994 का रामपुर तिराहा कांड उत्तराखंड राज्य आंदोलन की सबसे पीड़ादायक घटनाओं में गिना जाता है। पृथक उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर दिल्ली जा रहे आंदोलनकारियों को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर रोका गया। पुलिस फायरिंग में सात आंदोलनकारियों की मौत हुई और महिला आंदोलनकारियों के साथ गंभीर अपराधों के आरोप सामने आए। इस मामले में वर्षों बाद न्यायिक कार्रवाई हुई। 2024 में दो सेवानिवृत्त पीएसी जवानों मिलाप सिंह और वीरेंद्र प्रताप को महिला आंदोलनकारी से दुष्कर्म और लूट के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
2026 में भी रामपुर तिराहा से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया जारी है। फर्जी हथियार बरामदगी के मामले में तत्कालीन एसओ और दो सिपाहियों को डेढ़-डेढ़ वर्ष की सजा सुनाई गई, जिसके बाद उन्होंने अपील करने की बात कही। वहीं उत्तराखंड हाईकोर्ट ने तत्कालीन मुजफ्फरनगर जिलाधिकारी से जुड़े मामले की वर्तमान स्थिति पर सीबीआई से रिपोर्ट मांगी है।
यहां सवाल इसलिए बड़ा है क्योंकि 1994 में उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी। राजनीतिक जिम्मेदारी, प्रशासनिक जवाबदेही और आपराधिक दोष—इन तीनों को अलग-अलग समझना जरूरी है। अदालत ने जिन लोगों को दोषी ठहराया है, वे पुलिसकर्मी थे; इसलिए पूरे समाजवादी पार्टी संगठन को कानूनी रूप से उन अपराधों का दोषी कहना उचित नहीं होगा। मगर राजनीतिक इतिहास में यह प्रश्न जरूर बना रहता है कि उस समय की सरकार आंदोलनकारियों के साथ हुई इस त्रासदी के लिए अपनी राजनीतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी को किस तरह देखती है?
और आज वही समाजवादी राजनीति अगर लाल टोपी और लाल गमछे के साथ उत्तराखंड में लोकतंत्र बचाने का संदेश लेकर दस्तक देती है, तो उत्तराखंड के आंदोलनकारी समाज के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।
कटाक्ष यहीं से शुरू होता है।
लोकतंत्र बचाइए—बिल्कुल बचाइए।
मतदाता का अधिकार बचाइए—जरूर बचाइए।
संविधान बचाइए—पूरी ताकत से बचाइए।
लेकिन उत्तराखंड की अस्मिता, शहीदों की स्मृति और 1994 की पीड़ा को भी तो साथ लेकर चलिए!
रुद्रपुर की सड़कों पर लाल टोपी देखकर उत्तराखंड के आंदोलनकारी शायद यही पूछेंगे—यह वही उत्तराखंड है, जिसके लिए हजारों लोगों ने लाठियां खाईं, जेल गए, गोलियां खाईं और जिनमें कई आंदोलनकारी शहीद हुए?
आज कांग्रेस और समाजवादी पार्टी एक ही मंच पर दिखाई दे रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर दोनों दल विपक्षी गठबंधन की राजनीति का हिस्सा रहे हैं और 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस-सपा गठबंधन की बात सार्वजनिक रूप से सामने आ चुकी है।
तो फिर उत्तराखंड में सवाल उठना भी स्वाभाविक है—क्या यह केवल लोकतंत्र बचाओ मार्च था या भविष्य के राजनीतिक समीकरणों की झलक भी?
कांग्रेस को यह स्पष्ट करना चाहिए कि रुद्रपुर की सड़क पर समाजवादी पार्टी की मौजूदगी महज कार्यक्रम में भागीदारी थी या इसके पीछे कोई व्यापक राजनीतिक समझ भी है?
क्योंकि उत्तराखंड में 2027 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं होगा। यहां राज्य आंदोलन की विरासत, शहीदों का सम्मान, मूल निवास, रोजगार, पलायन, भ्रष्टाचार और उत्तराखंड की अस्मिता भी चुनावी विमर्श का हिस्सा होंगे।
कांग्रेस यदि समाजवादी पार्टी के साथ कहीं चुनावी तालमेल की दिशा में बढ़ती है तो उत्तराखंड के मतदाता उससे सवाल पूछ सकते हैं—क्या सत्ता की राजनीति के लिए 1994 के सवाल पीछे छोड़ दिए जाएंगे?
और अगर गठबंधन नहीं है तो कांग्रेस को यह भी बताना होगा कि रुद्रपुर के लोकतंत्र बचाओ मंच पर लाल टोपी की दस्तक को वह किस राजनीतिक रूप में देखती है।
सबसे बड़ा सवाल समाजवादी पार्टी से भी है—उत्तराखंड में लोकतंत्र बचाने आए हैं तो पहले 1994 के उत्तराखंड आंदोलन की पीड़ा पर अपना राजनीतिक पक्ष स्पष्ट क्यों नहीं करते?
लाल टोपी कोई अपराध नहीं है। लाल गमछा भी कोई अपराध नहीं है। लेकिन इतिहास को लाल रंग से ढक देने से इतिहास मिटता नहीं है।
उत्तराखंड ने राज्य केवल नक्शे पर नहीं पाया था। यह राज्य आंदोलनकारियों के संघर्ष, मातृशक्ति के बलिदान और शहीदों के खून से बना है। इसलिए लोकतंत्र बचाने की हर आवाज का स्वागत हो सकता है, मगर उत्तराखंड की अस्मिता की कीमत पर नहीं।
रुद्रपुर में लाल टोपी की दस्तक ने एक सवाल जरूर छोड़ दिया है—लोकतंत्र बचाओ आंदोलन में उत्तराखंड की आत्मा की आवाज कौन उठाएगा?
और यही सवाल 2027 की राजनीति में शायद किसी भी गठबंधन से बड़ा सवाल साबित हो सकता है।
कांग्रेस और सपा की भूमिका स्पष्ट करें
