सर्वपितृ अमावस्या 2026: पितरों की विदाई का दिन, कुतुप मुहूर्त में श्राद्ध-तर्पण का विशेष महत्व


रुद्रपुर। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष को अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और स्मरण का विशेष काल माना जाता है। इन दिनों परिवार अपने दिवंगत परिजनों की आत्मिक शांति और तृप्ति की कामना से श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य जैसे धार्मिक कर्म करते हैं। पितृ पक्ष का अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या कहलाता है, जिसे महालय अमावस्या भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह पितरों की विदाई का दिन है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


इस दिन उन पूर्वजों का श्राद्ध करने की परंपरा है, जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती अथवा किसी कारण से निर्धारित तिथि पर श्राद्ध कर्म नहीं हो पाता। इसी वजह से सर्वपितृ अमावस्या को पितृ पक्ष का अत्यंत महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।
10 अक्टूबर को मनाई जाएगी सर्वपितृ अमावस्या
वैदिक पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में अमावस्या तिथि 9 अक्टूबर की रात 9 बजकर 35 मिनट से शुरू होकर 10 अक्टूबर की रात 9 बजकर 19 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर 2026 को मनाई जाएगी।
श्राद्ध और तर्पण के लिए दिन के निर्धारित मुहूर्त का विशेष महत्व माना गया है। उपलब्ध पंचांग विवरण के अनुसार—
कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:45 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक
रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:31 बजे से 1:18 बजे तक
अपराह्न काल: दोपहर 1:18 बजे से 3:37 बजे तक
धार्मिक परंपरा में विशेष रूप से कुतुप और अपराह्न काल को श्राद्ध कर्म के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। स्थानीय सूर्योदय और पंचांग में थोड़ा अंतर संभव होने के कारण श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्र के पंचांग अथवा विद्वान आचार्य से समय की पुष्टि कर लेना चाहिए।
ब्राह्मण भोज में क्या खिलाएं?
सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध कर्म के बाद ब्राह्मण भोज कराने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भोजन सात्विक और श्रद्धापूर्वक तैयार किया जाना चाहिए।
भोजन में दूध, चावल और चीनी से तैयार खीर, पूरी, सात्विक सब्जी, दाल तथा मौसमी फल शामिल किए जा सकते हैं। इसके साथ मिठाई भी परोसी जाती है। भोजन बनाते समय शुद्धता और सात्विकता का विशेष ध्यान रखने की परंपरा है।
कई परिवार अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार कौआ, गाय और अन्य जीवों के लिए भी अन्न निकालते हैं। इसे जीव-जगत के प्रति करुणा और पितरों के प्रति श्रद्धा से जोड़कर देखा जाता है।
तर्पण में काले तिल और कुशा का महत्व
पितृ तर्पण की परंपरा में जल के साथ काले तिल और कुशा का प्रयोग किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि तिल पवित्रता और तृप्ति का प्रतीक है, जबकि कुशा का प्रयोग वैदिक कर्मकांड में शुद्धता और धार्मिक संकल्प के लिए किया जाता है।
कुशा को हिंदू धार्मिक परंपरा में अत्यंत पवित्र माना गया है। मान्यता के अनुसार इसकी उत्पत्ति भगवान विष्णु से जुड़ी है। तर्पण के दौरान कुशा की अंगूठी अनामिका उंगली में धारण करने की परंपरा भी है। धार्मिक दृष्टि से इसे कर्मकांड की पवित्रता से जोड़ा जाता है।
श्राद्ध न करने को लेकर गरुड़ पुराण की मान्यताएं
गरुड़ पुराण में पितरों, श्राद्ध, तर्पण और मृत्यु के बाद की धार्मिक मान्यताओं का विस्तृत उल्लेख मिलता है। धार्मिक व्याख्याओं के अनुसार निर्धारित श्राद्ध कर्म न करने से पितरों की तृप्ति बाधित होने और परिवार पर पितृ ऋण या पितृ दोष का प्रभाव पड़ने की मान्यता रही है।
परंपरागत धार्मिक मान्यताओं में यह भी कहा गया है कि श्राद्ध कर्म की उपेक्षा से परिवार में अशांति, कार्यों में बाधा, आर्थिक परेशानियां, पारिवारिक मतभेद और अन्य कठिनाइयां आ सकती हैं। हालांकि इन बातों को धार्मिक विश्वास और पुराणिक मान्यता के रूप में ही समझना चाहिए, इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित कारण-परिणाम के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
कुछ धार्मिक कथाओं में श्राद्ध न करने वाले परिवार के पितरों की अतृप्ति का वर्णन अत्यंत प्रभावशाली और प्रतीकात्मक भाषा में मिलता है। पितरों के भूखे-प्यासे रहने और परिजनों को कष्ट मिलने की बातें इसी धार्मिक आख्यान का हिस्सा हैं। इन कथाओं का मूल उद्देश्य संतान को अपने पूर्वजों के प्रति कर्तव्य, स्मरण और श्रद्धा के लिए प्रेरित करना माना जाता है।
केवल कर्मकांड नहीं, पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का अवसर
आधुनिक जीवनशैली में भले ही कई लोग पारंपरिक कर्मकांडों को अलग नजरिए से देखते हों, लेकिन पितृ पक्ष का सामाजिक और पारिवारिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। यह अवसर परिवार को अपने पूर्वजों के योगदान को याद करने, उनके जीवन मूल्यों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने और जरूरतमंदों की सहायता करने की प्रेरणा देता है।
सर्वपितृ अमावस्या पर श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, वस्त्र और अन्य उपयोगी सामग्री का दान भी करते हैं। धार्मिक परंपरा का मूल संदेश यही है कि पूर्वजों को श्रद्धा से याद किया जाए और उनके नाम पर किए जाने वाले पुण्य कार्यों से समाज में सेवा और संवेदना की भावना मजबूत हो।
इस प्रकार सर्वपितृ अमावस्या केवल पितरों की विदाई का धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि परिवार की स्मृतियों, परंपराओं और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है। श्रद्धा, संयम और सात्विक भाव से किया गया श्राद्ध कर्म ही इस दिन की धार्मिक भावना का केंद्र माना जाता है।
— अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी