संपादकीय::गरीबों पर बुलडोज़र, रसूखदारों पर खामोशी: रुद्रपुर में कानून की दोहरी परिभाषा”गरीबों पर बुलडोज़र, रसूखदारों पर खामोशी: रुद्रपुर में कानून की दोहरी परिभाषा”

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रुद्रपुर की दो हालिया घटनाएं हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या कानून और न्याय वास्तव में सबके लिए बराबर है, या फिर यहां भी उसका चेहरा रसूख और सत्ता देखकर बदल जाता है।

।✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

पहला उदाहरण किच्छा रोड हाईवे पर नगर निगम की कार्रवाई का है। महापौर विकास शर्मा के नेतृत्व में नगर निगम ने वर्षों से कब्जाई गई करोड़ों की नजूल भूमि को अतिक्रमणकारियों से मुक्त कराया। अदालत से फैसला नगर निगम के पक्ष में आने के बाद जेसीबी चली, कब्जे हटे और भूमाफिया को कड़ा संदेश गया कि अब लैंड जिहाद या किसी भी नाम पर कब्जा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह कार्रवाई निश्चित ही मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सख्त नीति और स्थानीय प्रशासन की तत्परता का प्रमाण है। इससे जनता का विश्वास जागता है कि सरकारी संपत्ति सुरक्षित है और भविष्य में यह जनकल्याण के काम आ सकती है।

लेकिन दूसरी तरफ, ग्रीन बेल्ट और काशीपुर बायपास जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की तस्वीर बिल्कुल उलट है। यहां हाई कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद रसूखदार कार बाजार और शोरूम मालिकों के खिलाफ कार्रवाई आज तक ठंडी पड़ी है। यही वह दोहरा रवैया है, जो रुद्रपुर की न्याय व्यवस्था पर गहरे सवाल खड़ा करता है। गरीब मजदूर की झुग्गी तो एक दिन में ढहा दी जाती है, लेकिन रसूखदारों की अवैध इमारतें सालों तक प्रशासन की छत्रछाया में फलती-फूलती रहती हैं।

अगर किच्छा रोड पर बैठे अतिक्रमणकारी भू-माफिया हैं, तो फिर ग्रीन बेल्ट पर कब्जा जमाने वाले भी भू-माफिया ही हैं। कानून के दायरे में दोनों बराबर होने चाहिए। एक जगह तो नगर निगम अदालत के आदेश का पालन कर दिखाता है, लेकिन दूसरी जगह वही अदालत का आदेश रसूखदारों के दबाव में धरा रह जाता है। यह दोहरा न्याय न सिर्फ रुद्रपुर, बल्कि उत्तराखंड राज्य की मूल परिकल्पना के भी विपरीत है।

रुद्रपुर की जनता चाहती है कि हर इंच भूमि पर जनता का अधिकार हो, न कि सत्ता और पैसे के गठजोड़ का। अगर वाकई रुद्रपुर को स्मार्ट सिटी बनाना है और उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना को सार्थक करना है, तो जिला प्रशासन, नगर निगम और सत्ताधारी नेताओं को इस पक्षपातपूर्ण रवैये से बाहर आना होगा। ग्रीन बेल्ट पर भी उसी तरह बुलडोजर चलना चाहिए जैसे किच्छा रोड की जमीन पर चला। तभी जनता का विश्वास शासन-प्रशासन में टिकेगा।

अन्यथा, यह संदेश जाएगा कि कानून गरीबों के लिए कठोर है और अमीरों-रसूखदारों के लिए महज औपचारिकता। लोकतंत्र में यह असमानता लंबे समय तक नहीं टिक सकती। 2027 में जनता उसी स्मार्ट तरीके से अपना जवाब देगी।



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