छह राज्यों में SIR की समय-सीमा बढ़ी, उत्तराखंड में मतदाता सूची पर नजर; 2027 से पहले जैनी प्रकरण ने गरमाई सियासत, धामी और हरक आमने-सामने


महाराष्ट्र, दिल्ली, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और नागालैंड में निर्वाचन आयोग ने बढ़ाया पुनरीक्षण का समय; उत्तराखंड में मतदाता सूची के शुद्धिकरण और छूटे मतदाताओं के नाम जोड़ने की चुनौती, वहीं अंकिता भंडारी हत्याकांड के बीच 23 साल पुराने जैनी प्रकरण को लेकर भाजपा-कांग्रेस में बयानबाजी तेज

अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर

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देश में मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) और उत्तराखंड की राजनीति में पुराने विवादों की वापसी, इन दोनों घटनाक्रमों ने एक बार फिर लोकतांत्रिक व्यवस्था, प्रशासनिक पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही से जुड़े सवालों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। एक ओर निर्वाचन आयोग ने महाराष्ट्र, दिल्ली, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और नागालैंड में मतदाता सूची पुनरीक्षण की समय-सीमा बढ़ाकर मतदाताओं को दावे और आपत्तियां दर्ज कराने का अतिरिक्त अवसर दिया है, वहीं दूसरी ओर उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अंकिता भंडारी हत्याकांड और करीब 23 साल पुराने जैनी प्रकरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस के नेताओं के बीच बयानबाजी तेज हो गई है।
एक तरफ मतदाता सूची में प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग के सामने है, तो दूसरी तरफ उत्तराखंड में राजनीतिक दलों के बीच पुराने और नए मामलों को लेकर सवाल-जवाब का दौर जारी है।
छह राज्यों और दिल्ली में SIR की समय-सीमा बढ़ी
निर्वाचन आयोग ने महाराष्ट्र, दिल्ली, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, तेलंगाना और नागालैंड में विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) के कार्यक्रम में बदलाव किया है। आयोग ने संबंधित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली के निर्वाचन अधिकारियों को नई समय-सारिणी की जानकारी देते हुए दावे और आपत्तियां दर्ज कराने तथा उनके निस्तारण के लिए अतिरिक्त समय दिया है।
महाराष्ट्र में दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की अंतिम तारीख 26 अक्टूबर से बढ़ाकर 13 नवंबर कर दी गई है। इसके बाद प्राप्त दावों और आपत्तियों के निस्तारण की प्रक्रिया 25 नवंबर तक पूरी की जाएगी। यहां अंतिम मतदाता सूची 30 नवंबर को प्रकाशित होगी। इससे पहले महाराष्ट्र में मतदाता सूची का प्रारूप 31 अगस्त को जारी किया गया था।
देश की राजधानी दिल्ली में भी मतदाताओं को राहत मिली है। यहां दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की अंतिम तारीख 30 अक्टूबर से बढ़ाकर 25 नवंबर कर दी गई है। इनके निस्तारण की समय-सीमा 30 नवंबर से बढ़ाकर 15 दिसंबर कर दी गई है। दिल्ली की अंतिम मतदाता सूची अब 22 दिसंबर को प्रकाशित की जाएगी।
हरियाणा और आंध्र प्रदेश में दावों तथा आपत्तियों के निस्तारण की अंतिम तारीख 20 नवंबर निर्धारित की गई है। तेलंगाना में यह प्रक्रिया 26 नवंबर और नागालैंड में 25 नवंबर तक पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं। इन चारों राज्यों में अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन 30 नवंबर को किया जाएगा।
क्यों जरूरी है विशेष सघन पुनरीक्षण?
विशेष सघन पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक शुद्ध, पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाना है। इस प्रक्रिया के तहत बूथ लेवल अधिकारी (BLO) घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करते हैं। नए पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने, स्थान परिवर्तन के बाद पते में संशोधन करने, मृत अथवा अपात्र मतदाताओं की प्रविष्टियों की जांच करने और एक से अधिक स्थानों पर दर्ज नामों को नियमानुसार हटाने की प्रक्रिया शामिल होती है।
हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी पात्र नागरिक का नाम तकनीकी या दस्तावेजी त्रुटि के कारण मतदाता सूची से बाहर नहीं रहना चाहिए। मतदाता को अपना पक्ष रखने और आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने का उचित अवसर मिलना चाहिए। निर्वाचन आयोग द्वारा समय-सीमा बढ़ाने के पीछे प्रशासनिक व्यस्तताओं, त्योहारों और आवेदनों के निस्तारण में अतिरिक्त समय की आवश्यकता को प्रमुख वजह बताया गया है।
उत्तराखंड में भी मतदाता सूची के शुद्धिकरण पर नजर
उत्तराखंड के संदर्भ में भी विशेष सघन पुनरीक्षण महत्वपूर्ण रहा है। प्रदेश में निर्धारित पुनरीक्षण कार्यक्रम के तहत प्रारूप मतदाता सूची 14 जुलाई 2026 को प्रकाशित की गई थी। दावे और आपत्तियां दर्ज कराने के लिए 13 अगस्त तक का समय दिया गया था। इसके बाद सत्यापन और निस्तारण की प्रक्रिया पूरी कर 15 सितंबर 2026 को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की गई।
महाराष्ट्र और दिल्ली के लिए निर्वाचन आयोग द्वारा घोषित नई समय-सीमा को उत्तराखंड पर लागू नहीं समझना चाहिए, क्योंकि प्रदेश का निर्धारित पुनरीक्षण कार्यक्रम पहले ही पूरा हो चुका है।
इसके बावजूद उत्तराखंड में मतदाता सूची को लेकर निगरानी और पारदर्शिता का मुद्दा महत्वपूर्ण बना हुआ है। विशेष रूप से ऊधमसिंह नगर, हरिद्वार, देहरादून और अन्य तेजी से बढ़ती आबादी वाले क्षेत्रों में नए मतदाताओं के नाम जोड़ने, स्थानांतरित हो चुके मतदाताओं का सत्यापन करने तथा दोहरी प्रविष्टियों की जांच पर ध्यान देना आवश्यक है।
ऊधमसिंह नगर जैसे तेजी से विकसित होते जिले में औद्योगिक क्षेत्रों, शहरी विस्तार और लगातार हो रहे जनसंख्या परिवर्तन के कारण मतदाता सूची का अद्यतन होना विशेष महत्व रखता है। यहां पात्र नागरिकों का नाम सूची में शामिल होना और अपात्र प्रविष्टियों का नियमानुसार निस्तारण होना निर्वाचन व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है।
आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की भी जिम्मेदारी है कि वे मतदाता सूची में नाम छूटने, गलत प्रविष्टि या किसी पात्र नागरिक का नाम हटाए जाने की स्थिति में निर्वाचन अधिकारियों के समक्ष नियमानुसार शिकायत दर्ज कराएं।
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड में जैनी प्रकरण की वापसी
एक तरफ देश में मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया चर्चा में है, तो दूसरी तरफ उत्तराखंड की राजनीति में करीब 23 वर्ष पुराना जैनी प्रकरण फिर सुर्खियों में आ गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तथा पूर्व कैबिनेट मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत के बीच इस मामले को लेकर तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है।
इस विवाद की पृष्ठभूमि अंकिता भंडारी हत्याकांड और कांग्रेस की ओर से निकाली जा रही न्याय यात्रा से जुड़ी है। कांग्रेस लगातार अंकिता को न्याय दिलाने, कथित वीआईपी की भूमिका की जांच और मामले से जुड़े सवालों के जवाब मांग रही है। इसी बीच मुख्यमंत्री धामी ने कांग्रेस के आरोपों पर पलटवार करते हुए उत्तराखंड के पुराने राजनीतिक विवादों का उल्लेख किया, जिनमें तंदूर कांड और जैनी प्रकरण भी शामिल बताए गए।
मुख्यमंत्री के बयान के बाद प्रदेश की राजनीति में पुराना मामला फिर चर्चा में आ गया और हरक सिंह रावत ने अपनी सफाई देते हुए तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों पर सवाल उठाने शुरू कर दिए।
धामी के बयान के बाद हरक सिंह रावत का पलटवार
हाल ही में हल्द्वानी में मीडिया से बातचीत के दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि अंकिता पूरे उत्तराखंड की बेटी और बहन थी। इस हत्याकांड में अदालत तीनों दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुना चुकी है। उन्होंने कांग्रेस पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब अदालत अपना फैसला सुना चुकी है तो कांग्रेस इस मामले को बार-बार राजनीतिक मुद्दा क्यों बना रही है।
मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद कांग्रेस नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक बयानों के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया दी। हरक सिंह रावत ने कहा कि जैनी प्रकरण में उन पर लगाए गए आरोप निराधार थे। उन्होंने अपनी और अपने परिवार की कसम खाते हुए दावा किया कि उन्होंने संबंधित महिला को छुआ तक नहीं था।
हरक सिंह रावत का कहना है कि जब यह मामला सामने आया था, तब उन्होंने स्वयं सीबीआई जांच की मांग की थी और मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों और पूरे घटनाक्रम पर विस्तार से बोलना शुरू किया तो कई नेताओं को जवाब देना मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने मुख्यमंत्री धामी के बयान और राजनीतिक अनुभव पर भी सवाल उठाए।
कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने सरकार को घेरा
इस मामले में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल भी सामने आए हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री के बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा कि अंकिता भंडारी हत्याकांड जैसे संवेदनशील मामले को पुराने राजनीतिक विवाद से जोड़ना उचित नहीं है।
गोदियाल का कहना है कि जैनी प्रकरण के समय हरक सिंह रावत ने सीबीआई जांच की मांग की थी और मंत्री पद से इस्तीफा दिया था। कांग्रेस का आरोप है कि वर्तमान में अंकिता हत्याकांड से जुड़े कथित वीआईपी की भूमिका को लेकर उठ रहे सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना चाहिए। पार्टी ने मामले की पारदर्शी जांच और सभी संबंधित तथ्यों को सार्वजनिक करने की मांग दोहराई है।
दूसरी ओर सरकार की ओर से यह कहा जाता रहा है कि अंकिता हत्याकांड में पुलिस ने कार्रवाई की, एसआईटी ने जांच की और अदालत ने तीनों दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया और जांच से जुड़े तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ही आगे की चर्चा की जानी चाहिए।
क्या था 23 साल पुराना जैनी प्रकरण?
जैनी प्रकरण वर्ष 2003 का बताया जाता है। उस समय उत्तराखंड में नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी और हरक सिंह रावत राजस्व मंत्री के पद पर थे।
इसी दौरान असम मूल की एक महिला, जिसे इंदिरा देवी उर्फ जैनी के नाम से भी जाना जाता है, ने हरक सिंह रावत पर गंभीर आरोप लगाए थे। महिला की ओर से नौकरी दिलाने का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने और बच्चे के पितृत्व से संबंधित आरोप लगाए जाने की बात सामने आई थी।
मामला सामने आने के बाद प्रदेश की राजनीति में हलचल मच गई थी। इसकी जांच सीबीआई को सौंपी गई थी और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में हरक सिंह रावत को मंत्री पद छोड़ना पड़ा था। अब लगभग 23 वर्ष बाद इस प्रकरण का दोबारा राजनीतिक मंच पर उठना चर्चा का विषय बन गया है।
हरक सिंह रावत ने हालिया बयानों में खुद को निर्दोष बताते हुए उस समय की परिस्थितियों और राजनीतिक घटनाक्रम पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, उस समय लगाए गए आरोपों, जांच और संबंधित दावों को अलग-अलग समझना जरूरी है। किसी भी आरोप को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
अंकिता भंडारी हत्याकांड और कथित वीआईपी का सवाल भी बना चर्चा का विषय
उत्तराखंड की राजनीति में अंकिता भंडारी हत्याकांड लगातार एक संवेदनशील विषय बना हुआ है। अंकिता की हत्या के मामले में तीन दोषियों को अदालत से आजीवन कारावास की सजा मिल चुकी है। इसके बावजूद कथित वीआईपी की भूमिका, उससे जुड़े आरोपों और जांच की पारदर्शिता को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर सवाल उठते रहे हैं।
कांग्रेस इस मामले में सरकार से जवाब मांग रही है, जबकि सरकार न्यायिक प्रक्रिया और दोषियों को मिली सजा का उल्लेख कर रही है। ऐसे में अंकिता के परिवार की मांगों और उनके द्वारा उठाए जा रहे सवालों को गंभीरता से सुनना तथा जांच से जुड़े तथ्यों को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।
2027 में जनता के सामने होंगे कई बड़े सवाल
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच राजनीतिक दलों के सामने केवल एक-दूसरे पर आरोप लगाने का विषय नहीं है, बल्कि जनता के वास्तविक मुद्दों पर भी जवाब देना होगा। रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, औद्योगिक विकास, भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा और राज्य आंदोलनकारियों की मांगें प्रदेश की राजनीति के महत्वपूर्ण विषय हैं।
एक तरफ मतदाता सूची में प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम सुनिश्चित करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी जिम्मेदारी है, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक और आपराधिक मामलों में पारदर्शिता तथा जवाबदेही जनता का अधिकार है।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स का विशेष विश्लेषण: निर्वाचन आयोग का SIR कार्यक्रम लोकतंत्र में मतदाता की भागीदारी को सुरक्षित और व्यवस्थित बनाने की महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। महाराष्ट्र, दिल्ली और अन्य राज्यों में समय-सीमा बढ़ाने से यह संदेश मिलता है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण में पर्याप्त समय और उचित अवसर देना आवश्यक है। उत्तराखंड में भी मतदाता सूची की शुद्धता, पात्र मतदाताओं के अधिकार और प्रशासनिक पारदर्शिता पर निरंतर ध्यान देना होगा।
वहीं उत्तराखंड की राजनीति में अंकिता भंडारी हत्याकांड और जैनी प्रकरण जैसे मुद्दों पर बहस के बीच जनता यह देखना चाहेगी कि राजनीतिक दल पुराने मामलों के आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर वर्तमान समस्याओं पर क्या ठोस जवाब देते हैं। 2027 का विधानसभा चुनाव प्रदेश के विकास, सुशासन, न्याय और जनता के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक दलों की जवाबदेही की भी परीक्षा होगा।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
अध्यक्ष: उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद, उत्तराखंड