दिशाहीन होता आंदोलन: एक मंच, अनेक एजेंडे और बिखरती रणनीति

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नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर पिछले कई दिनों से चल रहा आंदोलन अब ऐसे मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है, जहां इसके उद्देश्य, नेतृत्व और रणनीति को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। आंदोलन की शुरुआत शिक्षा और लोकतांत्रिक मुद्दों को लेकर हुई थी, लेकिन समय बीतने के साथ मंच पर अलग-अलग विचारधाराओं, नारों और मांगों का ऐसा मिश्रण दिखाई देने लगा कि मूल मुद्दा पीछे छूटता नजर आया।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


इसी बीच सोनम वांगचुक द्वारा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग वापस लेने और अपनी मांगों को सीमित करने की खबर ने आंदोलन की दिशा पर नई बहस छेड़ दी है। यदि यह रुख अंतिम रूप लेता है, तो आंदोलन के भविष्य और उसके नेतृत्व पर कई राजनीतिक प्रश्न खड़े होंगे।
बताया जा रहा है कि अब उनकी प्रमुख अपेक्षा केवल इतनी है कि विभिन्न राजनीतिक दलों के वरिष्ठ नेता अस्पताल जाकर उनसे मुलाकात करें तथा संसद के मानसून सत्र में शिक्षा से जुड़े मुद्दों को उठाने का आश्वासन दें। यदि ऐसा होता है और अनशन समाप्त हो जाता है, तो आंदोलन का सबसे प्रभावशाली चेहरा सक्रिय भूमिका से बाहर हो जाएगा।
ऐसी स्थिति में आंदोलन से जुड़े अन्य संगठनों, विशेष रूप से CJP, के सामने रणनीतिक चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है। यदि वे आंदोलन समाप्त करते हैं तो समर्थकों के बीच निराशा का वातावरण बन सकता है, जबकि आंदोलन जारी रखते हैं तो उन्हें उस प्रमुख चेहरे के बिना आगे बढ़ना होगा जिसने पूरे अभियान को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
जंतर-मंतर पर बीते दिनों का दृश्य भी कई तरह के विरोधाभासों से भरा दिखाई दिया। कहीं संविधान बचाने की बातें हो रही थीं, कहीं केंद्र सरकार को हटाने के नारे सुनाई दिए। कुछ समूह सांप्रदायिक सौहार्द की बात कर रहे थे तो कुछ स्थानों पर हिंदू-मुस्लिम विमर्श प्रमुख बन गया। कहीं “आज़ादी” के नारे लगे तो कहीं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। मंच और उसके आसपास विभिन्न प्रकार के गीत-संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी देखने को मिलीं। इस विविधता ने समर्थकों के एक वर्ग को उत्साहित किया, वहीं आलोचकों ने इसे आंदोलन के मूल उद्देश्य से भटकाव बताया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी बड़े जनआंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसका स्पष्ट उद्देश्य और अनुशासित नेतृत्व होता है। जब एक ही मंच पर अनेक प्रकार के राजनीतिक और वैचारिक संदेश आने लगते हैं, तो आम लोगों के लिए यह समझना कठिन हो जाता है कि आंदोलन की वास्तविक मांग क्या है।
सोनम वांगचुक को इस पूरे अभियान का सबसे विश्वसनीय चेहरा माना जाता रहा है। उनकी पहचान एक शिक्षाविद, नवप्रवर्तक और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में रही है। आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर जो पहचान और मीडिया का ध्यान मिला, उसमें उनकी व्यक्तिगत छवि की महत्वपूर्ण भूमिका रही। ऐसे में यदि वे सक्रिय आंदोलन से पीछे हटते हैं, तो नेतृत्व का प्रश्न स्वाभाविक रूप से सामने आएगा।
राजनीतिक दृष्टि से भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी के समर्थक इसे आंदोलन की रणनीतिक कमजोरी और नेतृत्व की असहमति के रूप में देख रहे हैं। उनका तर्क है कि यदि प्रमुख मांगें ही वापस ली जा रही हैं, तो इससे आंदोलन की वैधता और प्रभाव पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
दूसरी ओर आंदोलन से जुड़े लोग यह तर्क दे सकते हैं कि लोकतांत्रिक आंदोलनों में परिस्थितियों के अनुसार रणनीति बदलना सामान्य प्रक्रिया है और संवाद का रास्ता खुलना अपने आप में एक उपलब्धि माना जा सकता है।
हालांकि यह स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में आंदोलन की दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या कोई साझा नेतृत्व और स्पष्ट एजेंडा सामने आता है या नहीं।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि आंदोलन को आगे बढ़ाना है तो उसे एक स्पष्ट लक्ष्य, एकीकृत नेतृत्व और सीमित लेकिन ठोस मांगों के साथ आगे बढ़ना होगा। अन्यथा विभिन्न विचारधाराओं और अलग-अलग राजनीतिक संदेशों के कारण उसका प्रभाव धीरे-धीरे कम हो सकता है।

सीजेपी के आधिकारिक प्रवक्ता सौरभ दास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि वह और आशुतोष रांका, सीजेपी का प्रतिनिधित्व करते हुए जेपी नड्डा से मिलने जा रहे हैं. उन्होंने लिखा कि सरकार ने बातचीत की पहल की है और उनकी पार्टी अपनी मांगों को स्पष्ट रूप से सामने रखेगी. दास ने अपनी पोस्ट में यह भी कहा कि बड़ी संख्या में युवा इस आंदोलन से जुड़े हुए हैं और उनकी मौजूदगी इस मुद्दे को गंभीर बना रही है.

बड़ी संख्या में जंतर-मंतर पर जुटे सीजेपी समर्थक

संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन राजधानी दिल्ली में माहौल गर्म हो गया. खुद को ‘कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी)’ कहने वाले संगठन के समर्थक सोमवार सुबह बड़ी संख्या में जंतर-मंतर पर जुट गए. उनका कहना है कि वे अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से संसद तक मार्च करेंगे और किसी भी हाल में पीछे नहीं हटेंगे. संगठन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा कि तेज बारिश और कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद उनका मार्च तय कार्यक्रम के अनुसार होगा. पोस्ट में कहा गया, जोरदार बारिश और भारी सुरक्षा… लेकिन आज कॉकरोच को कोई नहीं रोक पाएगा.’

सुरक्षाकर्मियों और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़प

प्रदर्शन के दौरान कुछ जगहों पर प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच तनातनी भी देखने को मिली. सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरों और वीडियो में दोनों पक्षों के बीच धक्का-मुक्की और बहस के दृश्य सामने आए हैं. समाचार एजेंसी एएनआई द्वारा जारी वीडियो में रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) के जवान कुछ प्रदर्शनकारियों को पीछे हटाने के लिए लाठीचार्ज करते हुए भी दिखाई दे रहे हैं. हालांकि हालात पर लगातार नजर रखी जा रही है और पुलिस स्थिति को नियंत्रित करने में जुटी हुई है.

क्या हैं सीजेपी की मांगें?

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन जारी, संसद मार्च पर रोक

यह दावा ऐसे समय में सामने आया है, जब जंतर-मंतर पर प्रदर्शन जारी है. प्रदर्शनकारी संसद की ओर मार्च निकालना चाहते हैं, लेकिन दिल्ली पुलिस ने इसकी अनुमति नहीं दी है. सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए पुलिस पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि बिना अनुमति संसद की ओर किसी भी तरह का मार्च नहीं होने दिया जाएगा.

अब नजर बैठक और सरकार की प्रतिक्रिया पर

फिलहाल सरकार की ओर से सौरभ दास के दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है. ऐसे में यह देखना अहम होगा कि जेपी नड्डा से प्रस्तावित मुलाकात होती है या नहीं और यदि होती है तो बातचीत से प्रदर्शन के मुद्दे पर कोई ठोस समाधान निकलता है या नहीं.

हालांकि सौरभ दास ने अपनी पोस्ट में यह जरूर कहा कि पार्टी की मांगें स्पष्ट हैं, लेकिन उन्होंने सार्वजनिक तौर पर उन मांगों का विस्तृत ब्योरा साझा नहीं किया. ऐसे में अब सबकी नजर इस संभावित बैठक पर टिकी हुई है कि बातचीत में किन मुद्दों पर चर्चा होती है और उसका क्या नतीजा निकलता है.


आने वाले दिनों में यदि सरकार और आंदोलनकारियों के बीच संवाद स्थापित होता है और अनशन समाप्त होता है, तो इसे आंदोलन के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखा जाएगा। वहीं यदि विभिन्न संगठन अलग-अलग रास्ता चुनते हैं, तो आंदोलन के बिखरने की संभावना भी बढ़ सकती है।
कुल मिलाकर जंतर-मंतर का यह आंदोलन अब ऐसे मोड़ पर दिखाई देता है जहां उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती सरकार नहीं, बल्कि अपनी दिशा, उद्देश्य और नेतृत्व को लेकर स्पष्टता बनाए रखना है। लोकतांत्रिक आंदोलनों की सफलता केवल भीड़ से नहीं, बल्कि स्पष्ट एजेंडे, अनुशासन, व्यापक जनविश्वास और प्रभावी नेतृत्व से तय होती है। आने वाले दिन यह स्पष्ट करेंगे कि यह आंदोलन नए स्वरूप में आगे बढ़ेगा या फिर अपने सबसे प्रमुख चेहरे की सक्रिय भूमिका समाप्त होने के साथ इसका यह चरण भी इतिहास का हिस्सा बन जाएगा।


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