यह सवाल एफआरआई परिसर के भीतर संचालित हो रहे ””””फ्रिमा गोल्फ कोर्स”””” की वैधता और पर्यावरणीय औचित्य को लेकर उठाए गए हैं।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
आरक्षित वन भूमि पर संचालित गोल्फ कोर्स के मामले में एक विस्तृत तथ्यात्मक और कानूनी दस्तावेज को शिकायत के रूप में एफआरआई निदेशक को भेजा गया है।
सूत्रों के अनुसार व्हिसल ब्लोअर नीति के तहत यह शिकायत एक वरिष्ठ रिटायर्ड अधिकारी ने गोपनीय रूप से की है। शिकायत में दावा किया गया है कि गोल्फ कोर्स का संचालन वन (संरक्षण) अधिनियम 1980 के प्रावधानों के विपरीत है।
शिकायत के अनुसार, देहरादून के न्यू फारेस्ट क्षेत्र में स्थित लगभग 450 हेक्टेयर का एफआरआई परिसर भारत की वन अनुसंधान और पर्यावरणीय विरासत का प्रतीक माना जाता है।
यहां घने जंगलों, शोध संस्थानों और ऐतिहासिक इमारतों के बीच एक विस्तृत और सुव्यवस्थित गोल्फ कोर्स वर्षों से संचालित हो रहा है। इस गोल्फ कोर्स को ””””फ्रिमा गोल्फ कोर्स”””” कहा जाता है, जिसका नाम फारेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (एफआरआई ) और इंडियन मिलिट्री एकेडमी (आईएमए) के संयुक्त संदर्भ से बना बताया गया है।
शिकायत में कहा गया है कि गोल्फ कोर्स की स्थापना कब हुई, इसका स्पष्ट रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। अधिकांश खेल संबंधी अभिलेखों और आनलाइन निर्देशिकाओं में इसकी स्थापना तिथि ””””लागू नहीं”””” अंकित है। शिकायत में दावा किया गया है कि एफआरआई की स्थापना वर्ष 1906 और आईएमए की स्थापना वर्ष 1932 में होने के स्पष्ट रिकार्ड हैं, लेकिन गोल्फ कोर्स की शुरुआत से संबंधित आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।
इस तरह वन संरक्षण कानून की अनदेखी के गंभीर आरोप
शिकायत का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि पूरा एफआरआई परिसर आरक्षित वन घोषित है। भारतीय वन अधिनियम 1927 के तहत आरक्षित वन को सबसे उच्च स्तर की संरक्षित वन श्रेणी माना जाता है। इसके बाद 1980 में लागू हुए वन (संरक्षण) अधिनियम ने वन भूमि को गैर-वन गतिविधियों के लिए उपयोग करने की अनुमति केवल केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति पर निर्भर कर दी।
शिकायत के अनुसार वन (संरक्षण) अधिनियम 1980 की धारा 2 के अनुसार किसी भी वन भूमि को गैर-वन प्रयोजन के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता, जब तक कि केंद्र सरकार से पूर्व अनुमति न ली गई हो। शिकायत में यह तर्क दिया गया है कि गोल्फ कोर्स जैसी गतिविधि गैर-वन उपयोग की श्रेणी में आती है, क्योंकि इसके लिए जमीन समतल करना, झाड़ियों को हटाना, विशेष घास लगाना तथा रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का इस्तेमाल आवश्यक होता है।
शिकायती पत्र में सवाल उठाया गया है कि यदि 1980 के बाद इस गोल्फ कोर्स को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से औपचारिक अनुमति नहीं मिली, तो इसका संचालन “कार्यात्मक अवैधता की स्थिति में माना जाएगा।
साथ ही कहा गया है कि एफआरआई केवल भूमि का स्वामी संस्थान नहीं, बल्कि देश की वन संरक्षण नीतियों और शोध का प्रमुख संस्थान है। ऐसे संस्थान के परिसर में यदि बिना वैधानिक अनुमति के गैर-वन गतिविधि संचालित हो रही है, तो यह प्रशासनिक और नैतिक दोनों स्तरों पर गंभीर विरोधाभास माना जाएगा।
इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक टीएन गोदावर्मन मामले का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें अदालत ने स्पष्ट कहा था कि सरकारी रिकार्ड में वन दर्ज किसी भी भूमि पर वन (संरक्षण) अधिनियम लागू होगा, चाहे उसका स्वामित्व किसी भी संस्था के पास हो। दावा किया गया है कि ””””संस्थागत छूट”””” जैसा कोई प्राविधान गोल्फ कोर्स के मामले में लागू नहीं होता।
गोल्फ कोर्स संचालन में पर्यावर्णीय मानकों की अनदेखी संबंधी शिकायत यदि इस कार्यालय को प्राप्त होती है तो उसका त्वरित संज्ञान लिया जाएगा। प्रकरण में एफआरआई से जवाब मांगकर मंत्रालय को सूचित किया जाएगा। – एसपी नेगी, क्षेत्रीय अधिकारी (पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय)
