उद्योगों की चमक के पीछे श्रमिकों का अंधेरा सच, धामी सरकार से जवाब मांग रहा उत्तराखंड

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रुद्रपुर। उत्तराखंड राज्य गठन के बाद से प्रदेश की तमाम सरकारों ने रोजगार सृजन और पलायन रोकने के बड़े दावे करते हुए उद्योगपतियों को सस्ती जमीन, टैक्स में भारी छूट, बिजली सब्सिडी और अन्य सुविधाएं दीं। पंतनगर, रुद्रपुर, हरिद्वार, काशीपुर और देहरादून जैसे क्षेत्रों में बड़े औद्योगिक संस्थान स्थापित किए गए और दावा किया गया कि इससे स्थानीय युवाओं को बड़े पैमाने पर रोजगार मिलेगा। लेकिन जमीनी हकीकत अब इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


औद्योगिक क्षेत्रों में कार्यरत हजारों श्रमिक आज कम वेतन, ठेकेदारी प्रथा, अस्थायी नियुक्तियों, 10 से 12 घंटे की ड्यूटी, ओवरटाइम भुगतान न मिलने और मूलभूत सुविधाओं के अभाव जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। श्रमिकों का आरोप है कि कंपनियां स्थायी नियुक्तियों से बचने के लिए ठेकेदारों के माध्यम से कर्मचारियों की भर्ती करती हैं, जिससे श्रम कानूनों की खुली अनदेखी हो रही है।
महिला श्रमिकों ने भी कई फैक्ट्रियों में खराब कार्य परिस्थितियों, पेयजल संकट, शौचालय की समस्या और अभद्र व्यवहार जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। दूसरी ओर, मार्च 2024 में न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने के सरकार के फैसले का कानूनी विवादों में फंस जाना सरकार की कमजोर तैयारी को उजागर करता है।
सबसे बड़ा सवाल वर्तमान Pushkar Singh Dhami सरकार से है कि जब उद्योगों को लाभ पहुंचाने में सरकार सक्रिय है तो श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा में इतनी निष्क्रिय क्यों है? पहाड़ों में आज भी उद्योग नहीं पहुंचे, पलायन जारी है और स्थानीय युवा शोषण झेलने को मजबूर हैं।
हालिया श्रमिक आंदोलनों ने साफ कर दिया है कि असंतोष बढ़ रहा है। श्रमिक 20 हजार रुपये न्यूनतम वेतन, 8 घंटे कार्य प्रणाली और सम्मानजनक कार्य वातावरण की मांग कर रहे हैं। यदि सरकार ने समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए तो उत्तराखंड का विकास मॉडल केवल उद्योगपतियों तक सीमित होकर रह जाएगा, जबकि राज्य निर्माण का मूल सपना अधूरा ही रहेगा।


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