

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (यूकेएसएसएससी) की स्नातक स्तरीय परीक्षा को लेकर बीते दिनों सोशल मीडिया पर जिस तरह का हंगामा खड़ा किया गया, उसने न केवल अभ्यर्थियों को भ्रमित किया बल्कि राज्य की परीक्षा प्रणाली की साख पर भी प्रश्नचिह्न लगाने की कोशिश की। शुरुआती दावे बड़े थे – “पेपर लीक” हुआ है, “नकल माफिया” सक्रिय हैं और सरकार की परीक्षा व्यवस्था ध्वस्त हो गई है। लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, हकीकत कुछ और ही निकली।
विशेष जांच दल की प्रारंभिक रिपोर्ट से साफ हुआ है कि यह किसी संगठित पेपर लीक गिरोह का मामला नहीं था, बल्कि सीमित दायरे में रची गई एक साजिश थी। हरिद्वार के एक परीक्षा केंद्र से एक उम्मीदवार स्टेलर आमिर ने पेपर की कुछ फोटो बाहर भेजीं। इसमें उसकी बहन हिना और एक सहायक प्रोफेसर सुमन की भूमिका भी सामने आई। प्रोफेसर सुमन से उत्तर मांगे गए, जिन्हें बाद में सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया गया। यहीं से अफवाहों ने आग पकड़ ली और पूरे प्रदेश में यह संदेश फैल गया कि परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र बाहर आ गया है।
जांच एजेंसियों ने साफ कर दिया है कि पेपर का केवल एक सेट बाहर गया, वह भी परीक्षा शुरू होने के बाद। इसका मतलब यह है कि न तो पूरी परीक्षा प्रभावित हुई और न ही किसी संगठित गिरोह ने इसे अंजाम दिया। सरकार का दावा है कि परीक्षा प्रणाली पूरी तरह सुरक्षित है और इसे बदनाम करने के लिए विपक्षी ताकतों व अफवाह फैलाने वालों ने षड्यंत्र रचा।
पुलिस अब तक तीन मुख्य कड़ियाँ पकड़ चुकी है – स्टेलर आमिर, उसकी बहन हिना और प्रोफेसर सुमन। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि सुमन ने स्वेच्छा से सहयोग किया या उन्हें बहला-फुसलाकर शामिल किया गया। आगे की जांच से इस पर रोशनी पड़ेगी।
इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि आखिर सोशल मीडिया पर बिना पुष्टि के वायरल की जाने वाली खबरें किस तरह युवाओं का भविष्य दांव पर लगा सकती हैं। सरकार ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि फेक खबरें फैलाने वालों पर कड़ी कार्रवाई होगी।
यही है कि परीक्षा प्रणाली को लेकर भरोसा बनाए रखना होगा। पेपर लीक जैसी अफवाहों से युवाओं का मनोबल टूटता है और समाज में अविश्वास का वातावरण बनता है। ऐसे में जरूरी है कि अफवाहों के बजाय तथ्यों पर भरोसा किया जाए और दोषियों को कानून के कठघरे में लाकर भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोका जाए।
सवाल यह है—जब परीक्षा केंद्र से ही पेपर बाहर आया तो क्या केवल अभ्यर्थियों को बलि का बकरा बनाया जाएगा?
उस केंद्र पर तैनात जिम्मेदार कर्मचारी, सुपरवाइज़र और ड्यूटी पर मौजूद अफसरों पर अब तक बुलडोज़र क्यों नहीं चला?
आखिर क्यों हमेशा “संगठित गैंग नहीं है” कहकर पुलिस और आयोग अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करते हैं?
उत्तराखंड की जनता अब आश्वासनों से आगे बढ़ चुकी है। बेरोज़गार युवाओं की आँखों में सपने हैं, और हर बार इन सपनों को कुचलकर नकल माफिया करोड़ों की सौदेबाज़ी करते हैं। 2000 के दशक की शुरुआत में पेपर लीक को “होलसेल धंधा” कहा जाता था। अब वही धंधा फिर लौट आया है, बस चेहरों और तरीकों में बदलाव हुआ है।
बुलडोज़र की मांग क्यों?
राज्य की जनता का धैर्य अब जवाब दे चुका है।
जिस केंद्र से पेपर लीक हुआ, वहाँ से कार्रवाई की शुरुआत हो।
संबंधित कर्मचारियों पर केवल निलंबन नहीं, बल्कि संपत्ति ज़ब्ती और कठोर दंड लागू हो।
नकल कराने वाले, नकल करवाने वाले और इसमें मददगार हर व्यक्ति को चिन्हित कर त्वरित न्यायालय में पेश किया जाए।
यह संदेश स्पष्ट होना चाहिए कि उत्तराखंड की धरती पर अब “पेपर माफिया” की कोई जगह नहीं।
राजनीति का पुट?गढ़वाल क्षेत्र में पेपर लीक को लेकर उबाल है, आंदोलन की सुगबुगाहट है, वहीं कुमाऊं में सन्नाटा छाया हुआ है। यह भौगोलिक विभाजन भी गहरी राजनीति की ओर इशारा करता है। धामी सरकार की लोकप्रियता विपक्ष को असहज कर रही है, और ऐसे मुद्दों पर विपक्ष अपनी राजनीति चमकाना चाहता है। लेकिन यह प्रश्न किसी एक दल का नहीं, बल्कि पूरे राज्य के भविष्य का है।
पेपर लीक पर सख्त कार्रवाई ही समाधान?उत्तराखंड की स्नातक स्तरीय परीक्षा में पेपर का वायरल होना बेरोजगार युवाओं के साथ सीधा विश्वासघात है। यह सिर्फ एक व्यक्ति की शरारत नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की नाकामी है। जिसने पेपर वायरल किया, जिस केंद्र पर ड्यूटी पर तैनात कर्मचारी व अफसर थे और जिनके पास पेपर की कॉपी पहुंची—सभी को नकल माफिया की श्रेणी में लाकर कठोर दंड दिया जाना चाहिए।
पेपर लीक विवाद : विपक्ष की साजिश या सच्चाई?उत्तराखंड की स्नातक स्तरीय परीक्षा को लेकर पिछले कुछ दिनों से खूब बवाल मचा हुआ है। गढ़वाल, विशेषकर देहरादून में विपक्ष ने इसे बड़ा मुद्दा बना दिया, जबकि कुमाऊं में कहीं कोई जनाक्रोश दिखाई नहीं दिया। यह अंतर साफ दर्शाता है कि मामला केवल परीक्षा से जुड़ा नहीं बल्कि राजनीति से भी गहराई से जुड़ा है।
विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि जैसे वोट चोरी” के नारे अतीत में लगे थे, वैसे ही धामी सरकार पर भी पेपर चोरी का धब्बा लगाया जाए। लेकिन हकीकत यह है कि अब तक की पुलिस और विशेष जांच दल की रिपोर्ट में किसी संगठित पेपर लीक गैंग का कोई सबूत नहीं मिला है। केवल एक परीक्षा केंद्र से सीमित दायरे में प्रश्नपत्र की फोटो खींचकर बाहर भेजने का मामला सामने आया है। इसे पूरे प्रदेश की परीक्षा प्रणाली पर प्रश्नचिह्न बनाना राजनीतिक चाल के अलावा कुछ नहीं।
दिलचस्प यह है कि धामी सरकार को बदनाम करने की यह हवा कहीं न कहीं उनके ही राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों और विपक्ष की मिलीभगत से दी जा रही है। परंतु मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इन आरोपों से विचलित होने के बजाय अपने कार्यों पर पूरी मजबूती से डटे हुए हैं।
ऐसे समय में जब युवा भविष्य को लेकर संवेदनशील हैं, विपक्ष को चाहिए था कि वे उन्हें भरोसा दिलाते, न कि अफवाह फैलाकर भ्रम की स्थिति पैदा करते। साफ है कि इस पूरे विवाद में सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की जा रही है, जबकि सच्चाई यही है कि परीक्षा प्रणाली सुरक्षित है और दोषी केवल कुछ गिने-चुने लोग हैं। धामी सरकार इस मामले में क्लीन चिट की हकदार है और विपक्ष को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है।




