बलि प्रथा बंद कराने के श्रेय की होड़! हरक सिंह रावत के दावे पर सवाल, संघर्ष करने वालों का इतिहास में नाम क्यों नहीं?बलि प्रथा के खिलाफ संघर्ष करने वाले गुमनाम, श्रेय लेने वाले सुर्खियों में!

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उत्तराखंड/ उत्तराखंड में पशु बलि की प्रथा को लेकर एक बार फिर सियासत तेज होती दिखाई दे रही है। कांग्रेस नेता एवं पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत ने एक सभा में दावा किया कि उन्होंने उत्तराखंड में पशु बलि प्रथा को बंद कराने में बड़ी भूमिका निभाई, विशेष रूप से धारी देवी के संदर्भ में उनके बयान ने नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि क्या किसी सामाजिक-धार्मिक सुधार का श्रेय केवल राजनीतिक मंच से दावा करने भर से किसी एक व्यक्ति को दिया जा सकता है?

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


उत्तराखंड में पशु बलि के विरुद्ध कानूनी और सामाजिक संघर्ष का इतिहास किसी एक राजनीतिक दल या नेता तक सीमित नहीं रहा है। उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेशों, पशु क्रूरता से संबंधित कानूनों, सामाजिक संगठनों के प्रयासों और मंदिर समितियों तथा ग्रामीणों के सामूहिक निर्णयों ने इस दिशा में अलग-अलग स्तर पर भूमिका निभाई है।
विशेष रूप से उन गांवों और मंदिर समितियों का उल्लेख जरूरी है, जहां लोगों ने अदालत के किसी आदेश की प्रतीक्षा किए बिना अपनी धार्मिक परंपराओं पर पुनर्विचार किया और सर्वसम्मति से पशु बलि बंद करने का निर्णय लिया। चमोली के देवाल विकासखंड स्थित लाटू देवता मंदिर से जुड़ा हालिया निर्णय इसका उदाहरण है, जहां ग्रामीणों और मंदिर समिति ने बैठक कर बलि प्रथा बंद करने का फैसला लिया और फल-नारियल चढ़ाने की परंपरा को बढ़ावा देने की दिशा में कदम बढ़ाया।
ऐसे फैसले किसी राजनीतिक भाषण के कारण नहीं, बल्कि स्थानीय समाज की सामूहिक चेतना और आपसी सहमति से लिए गए। इसलिए इन निर्णयों का श्रेय लेने के बजाय उन ग्रामीणों, मंदिर समितियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का सम्मान होना चाहिए जिन्होंने वर्षों तक इस विषय पर जनजागरण किया।
धारी देवी के मामले में भी सवाल उठना स्वाभाविक है कि बलि प्रथा के विरोध में वास्तविक रूप से किसने संघर्ष किया, किसने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और किन सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा स्थानीय लोगों ने लगातार आवाज उठाई। यदि किसी नेता ने वास्तव में निर्णायक भूमिका निभाई है तो उसके समर्थन में तारीख, आदेश, दस्तावेज और आंदोलन का स्पष्ट इतिहास सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
उत्तराखंड की आध्यात्मिक परंपराएं केवल राजनीतिक दावों से नहीं, बल्कि श्रद्धा, लोकविश्वास और सामाजिक चेतना से निर्मित हुई हैं। पशु बलि जैसी परंपरा को लेकर भी समाज में बदलाव एक दिन में नहीं आया। इसके पीछे न्यायालयों की भूमिका के साथ-साथ अनेक लोगों का वर्षों का संघर्ष रहा है।
ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बलि किसने बंद कराई, बल्कि यह भी है कि जिन लोगों ने बिना किसी राजनीतिक पद या प्रचार के इस कुप्रथा के खिलाफ संघर्ष किया, इतिहास में उनका नाम कब और कैसे दर्ज होगा?
हरक सिंह रावत के बयान ने इसी सवाल को फिर सामने ला दिया है। यदि दावा तथ्यों पर आधारित है तो दस्तावेज सामने आने चाहिए और यदि स्थानीय समाज ने स्वयं पहल की थी तो उस सामूहिक प्रयास का सम्मान होना चाहिए। उत्तराखंड की आध्यात्मिक विरासत में श्रेय की राजनीति से अधिक महत्वपूर्ण सामाजिक सुधार के वास्तविक नायकों को पहचानना है।


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