उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश,राजनीति में ‘राष्ट्रवाद’ और ‘हिंदुत्व’ के रथ पर सवार होकर केंद्र से लेकर राज्यों तक पूर्ण बहुमत की सरकारें बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सामने अब एक नया और गंभीर संकट खड़ा हो गया है। संकट किसी विपक्षी दल का नहीं, बल्कि उसके अपने ही उस ‘कोर वोटर’ का है जो अब बंद कमरों से निकलकर चौपालों और सोशल मीडिया पर खुलकर सवाल दागने लगा है। उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड तक, जहां भाजपा ने प्रचंड बहुमत से सत्ता का स्वाद चखा है, वहां का बहुसंख्यक समाज अब यह पूछ रहा है कि सरकार की बड़ी-बड़ी नीतियों और प्रशासनिक फैसलों से उसे जमीन पर क्या हासिल हुआ?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
।सुधारों का क्रेडिट कहीं और, तो हिंदू वोटर को क्या मिला?
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि भाजपा ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के नाम पर तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाया और उत्तराखंड में देश का पहला समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करके इतिहास रचने का दावा किया। राष्ट्रीय स्तर पर इसे पार्टी की बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया जाता है। लेकिन जमीन पर बैठा हिंदू वोटर अब पूछ रहा है कि इन सामाजिक सुधारों से उसके अपने जीवन स्तर, युवाओं के रोजगार या व्यापार में क्या सुधार आया? आलोचकों का कहना है कि पार्टी वोट तो बहुसंख्यक समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं को सहलाकर लेती है, लेकिन नीतियां और कानून दूसरों को साधने के लिए बनाए जाते हैं।
आंकड़ों की बाजीगरी: मुफ्त मकान वहां, रोजी-रोटी पर बुलडोजर यहां?
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में विकास और कानून-व्यवस्था के दावों के बीच एक बड़ा विरोधाभास उभरकर सामने आ रहा है। प्रधानमंत्री आवास योजना के सरकारी आंकड़े जब अल्पसंख्यक समुदायों को मिले भारी लाभ की गवाही देते हैं, तो भाजपा इसे अपनी ‘निरपेक्ष कार्यशैली’ बताती है। लेकिन कटाक्ष तब तीखा हो जाता है जब कानून-व्यवस्था और अतिक्रमण के नाम पर ‘बुलडोजर नीति’ चलती है। स्थानीय स्तर पर कई ऐसी तस्वीरें और शिकायतें सामने आई हैं जहां सालों से दुकान चला रहे छोटे हिंदू व्यापारियों, रेहड़ी-पटरी वालों और मध्यमवर्गीय परिवारों के आशियानों को ‘अवैध’ बताकर ढहा दिया गया। जनता पूछ रही है कि क्या ‘सबका साथ’ सिर्फ मुफ्त राशन और मकान बांटने तक सीमित है, और जब कानून की सख्ती दिखाने की बारी आती है, तो गाज सबसे पहले उसी मध्यमवर्ग पर गिरती है जो ईमानदारी से टैक्स भरता है?
भावनाओं के बाजार’ में कब तक बिकेगा राष्ट्रवाद?
यूपी और उत्तराखंड के जागरूक मतदाताओं के बीच अब यह नैरेटिव गहराता जा रहा है कि भाजपा उन्हें केवल चुनाव के समय ‘पहचान के खतरे’ का डर दिखाकर एकजुट करती है। सत्ता मिलने के बाद, वैश्विक मंचों पर और अंतरराष्ट्रीय दबाव में अपनी छवि ‘सेक्युलर’ और ‘सर्वसमावेशी’ बनाए रखने के लिए सरकार उन वर्गों को प्राथमिकता देने लगती है जो कभी उसके पारंपरिक वोटर रहे ही नहीं। महंगाई की मार, बेरोजगारी का दंश और स्थानीय प्रशासन की मनमानी झेल रहा आम हिंदू अब यह महसूस करने लगा है कि ‘त्याग’ की उम्मीद सिर्फ उसी से क्यों की जाती है?
भाजपा के थिंक-टैंक को यह समझना होगा कि उत्तर प्रदेश की जमीनी हकीकत और उत्तराखंड के पहाड़ी सरोकार अब केवल भाषणों से शांत नहीं होने वाले। अगर पार्टी ने अपने ही बुनियादी समर्थकों के इन सुलगते सवालों और आर्थिक हितों की अनदेखी जारी रखी, तो ‘डबल इंजन’ की रफ्तार को थमते देर नहीं लगेगी।
राष्ट्रवाद के नाम पर कब तक चलेगा ‘त्याग’?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने अपने समर्थकों के भीतर एक ऐसा मानस तैयार कर दिया है जहां वे ‘राष्ट्रहित’ और ‘वैश्विक छवि’ के नाम पर अपनी व्यक्तिगत और सामुदायिक प्राथमिकताओं का त्याग करने को तैयार रहते हैं। लेकिन अब यह नैरेटिव दरकने लगा है। टैक्स का भारी बोझ उठाने वाला मध्यमवर्गीय हिंदू वोटर अब यह महसूस करने लगा है कि उसे केवल चुनाव के वक्त ‘पहचान की राजनीति’ के नाम पर लामबंद किया जाता है, जबकि सत्ता में आने के बाद नीतियां ‘वोट बैंक’ को संतुलित करने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘सेक्युलर’ दिखने के दबाव में बनाई जाती हैं।
