न्यायमूर्ति आलोक माहरा ने याचिकाकर्ता को ये निर्देश पृथक राज्य आंदोलन के दौरान हुई इस घटना के आरोपियों पर मुकदमा चलाए जाने से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई के दौरान दिए।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
सुनवाई के दौरान, अदालत ने अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाया और पूछा कि इस मामले की सुनवाई उत्तराखंड उच्च न्यायालय में होनी चाहिए या इलाहाबाद उच्च न्यायालय में, क्योंकि घटना के समय उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश एक ही राज्य का हिस्सा थे एवं वे बाद में अलग हुए थे।
अदालत ने याचिकाकर्ता से इस मामले पर लिखित जवाब दाखिल करने को कहा है। अगली सुनवाई 29 जुलाई के लिए तय की गई है।
मामले के अनुसार, उत्तराखंड आंदोलनकारी ‘एडवोकेट फोरम’ के अध्यक्ष रमन साह ने देहरादून के ज़िला और विशेष सीबीआई न्यायाधीश के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें मुजफ़्फरनगर (रामपुर तिराहा) मामले को देहरादून से मुजफ़्फरनगर की अदालत में स्थानांतरित किया गया है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान दो अक्टूबर 1994 को दिल्ली जा रहे सैकड़ों प्रदर्शनकारियों के साथ मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर बर्बर व्यवहार किया गया ।
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने जांच के बाद आरोपियों के खिलाफ देहरादून की अदालत में भारतीय दंड संहिता की धारा 304 (गैर-इरादतन हत्या) के तहत आरोपपत्र दाखिल किया । हालांकि, अदालत ने इस मामले का संज्ञान भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) के तहत लिया ।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि उसने पहले राहत पाने के लिए उच्चतम न्यायालय का रुख किया था। हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने उसे उच्च न्यायालय जाने की अनुमति दी, जिसके बाद उसने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में याचिका दायर की ।
