आरा/रुद्रपुर। बिहार के भोजपुर जिले में आरा-सासाराम हाईवे पर एक पिकअप से बरामद 29 बोरे सिक्कों ने पूरे मामले को रहस्यमय बना दिया है। हसन बाजार थाना क्षेत्र के सहेजनी के पास पकड़ी गई पिकअप से मजिस्ट्रेट की निगरानी में गिनती के बाद कुल 13 लाख 91 हजार 775 रुपये के सिक्के बरामद हुए। पुलिस के अनुसार सभी सिक्के पांच रुपये के हैं और वाहन के दस्तावेजों में सिक्कों की जगह हार्डवेयर वाशर-बोल्ट दर्ज था।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
पुलिस ने चालक मो. मनोज गुप्ता को गिरफ्तार किया है। प्रारंभिक पूछताछ में सिक्कों की खेप रोहतास के डेहरी आन सोन से पटना जिले के बिहटा थाना क्षेत्र के परेव ले जाए जाने की जानकारी सामने आई है। अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि इतनी बड़ी मात्रा में सिक्के कहां से आए और इन्हें परेव क्यों ले जाया जा रहा था।
उत्तराखंड कनेक्शन की भी हो जांच
इस पूरे मामले में एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या सिक्कों का यह नेटवर्क बिहार तक ही सीमित है या इसकी कोई कड़ी उत्तराखंड के औद्योगिक शहरों से भी जुड़ती है?
हरिद्वार और रुद्रपुर जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में देश के अलग-अलग राज्यों से बड़ी संख्या में कारोबारी, श्रमिक और छोटे-बड़े उद्योगों से जुड़े लोग आते-जाते हैं। खासकर रुद्रपुर का सिडकुल औद्योगिक क्षेत्र और आसपास की औद्योगिक गतिविधियां इसे बड़े व्यापारिक नेटवर्क से जोड़ती हैं।
ऐसे में यदि बिहार से बरामद सिक्कों की खेप किसी बड़े नेटवर्क का हिस्सा निकलती है तो जांच एजेंसियों के लिए यह भी महत्वपूर्ण होगा कि क्या इसी तरह की सिक्कों की खेप उत्तराखंड के हरिद्वार, रुद्रपुर या अन्य औद्योगिक क्षेत्रों तक पहुंची है?
हालांकि अभी तक बिहार पुलिस की ओर से उत्तराखंड से किसी प्रत्यक्ष कनेक्शन की पुष्टि नहीं की गई है। इसलिए इसे फिलहाल जांच का संभावित कोण ही माना जाना चाहिए।
सिक्कों का इस्तेमाल आखिर किस काम में?
मामले का सबसे अहम सवाल यही है कि आखिर 13.91 लाख रुपये के पांच-पांच रुपये के सिक्कों को 29 बोरों में भरकर एक राज्य से दूसरे राज्य तक ले जाने की जरूरत क्यों पड़ी?
क्या यह किसी वैध कारोबारी लेनदेन का हिस्सा था? क्या सिक्के किसी औद्योगिक या धातु संबंधी काम में इस्तेमाल होने वाले थे? या फिर इन सिक्कों को किसी अन्य उद्देश्य से एकत्र किया गया था?
पुलिस को यह भी जांचना होगा कि सिक्के किस बैंक, कारोबारी, संस्था या व्यक्ति से जुड़े हैं और इनके परिवहन के पीछे वास्तविक भुगतान या कारोबारी लेनदेन क्या था।
परेव के बाद कहीं उत्तराखंड तो नहीं?
परेव तांबा, कांसा, जस्ता और एल्युमिनियम सहित विभिन्न धातुओं के बर्तन निर्माण के लिए जाना जाता है। इसी वजह से पुलिस की नजर परेव तक सिक्कों की खेप पहुंचाने के कारण पर टिकी है।
लेकिन जांच का दायरा केवल परेव तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि सिक्कों का कोई संगठित संग्रह, परिवहन अथवा खपत नेटवर्क सामने आता है तो देश के दूसरे औद्योगिक केंद्रों तक इसकी कड़ियां तलाशना भी जरूरी होगा।
हरिद्वार और रुद्रपुर जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में भी इस बात की पड़ताल की जा सकती है कि हाल के दिनों में असामान्य मात्रा में पांच रुपये के सिक्कों की खरीद, बिक्री, परिवहन या संग्रह तो नहीं हुआ।
आयकर विभाग की सूचना के बाद बढ़ी गंभीरता
मामले की गंभीरता को देखते हुए आयकर विभाग को सूचना दिए जाने की बात सामने आई है। अब जांच में सिक्कों के स्रोत, ट्रांसपोर्ट दस्तावेज, वाहन मालिक, कथित भेजने वाले और प्राप्तकर्ता के साथ-साथ पूरे भुगतान तंत्र की पड़ताल महत्वपूर्ण होगी।
अगर जांच में बिहार से बाहर किसी राज्य या औद्योगिक शहर की कड़ी सामने आती है तो मामला महज सिक्कों की बरामदगी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह एक बड़े कैश-फ्लो और सिक्का परिवहन नेटवर्क की जांच में बदल सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—
13 लाख 91 हजार 775 रुपये के ये सिक्के आए कहां से और जा कहां रहे थे?
और अगर यह किसी बड़े नेटवर्क का हिस्सा है, तो क्या इसकी कोई कड़ी उत्तराखंड के हरिद्वार या रुद्रपुर जैसे औद्योगिक केंद्रों तक भी पहुंचती है?
इन सवालों का जवाब बिहार पुलिस की जांच के साथ-साथ दूसरे राज्यों की एजेंसियों की पड़ताल से ही सामने आएगा।
