पीएम आवास से बदरीनाथ के रिकॉर्ड, भाजपा की नई चुनावी रणनीति और कैंची धाम के जाम तक—उत्तराखंड में ‘डेमोक्रेटिक बदलाव’ की दस्तक, क्या स्थानीय हक और व्यवस्था की परीक्षा भी शुरू


रुद्रपुर। उत्तराखंड इन दिनों एक साथ कई विरोधाभासी तस्वीरें पेश कर रहा है। एक तरफ प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) 2.0 के क्रियान्वयन में राष्ट्रीय स्तर पर राज्य को सम्मान मिल रहा है, बदरीनाथ धाम श्रद्धालुओं की संख्या का अपना पुराना रिकॉर्ड तोड़ चुका है और सरकार सड़क सुरक्षा के लिए कड़े कदमों की तैयारी कर रही है। दूसरी तरफ आवास योजनाओं में वास्तविक लाभार्थियों के चयन, स्थानीय लोगों के अधिकार, लगातार बढ़ते यातायात दबाव, कैंची धाम में लग रहे जाम और आने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा की रणनीति ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


5 अक्टूबर को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित कार्यक्रम में उत्तराखंड को प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) 2.0 के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए ‘सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले राज्य’ की श्रेणी में सम्मानित किया गया। केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य राज्य मंत्री तोखन साहू ने राज्य को यह पुरस्कार प्रदान किया। राज्य की ओर से शहरी विकास विभाग के निदेशक/अपर सचिव विनोद गोस्वामी और सहायक निदेशक राजीव पांडे ने पुरस्कार ग्रहण किया।
राज्य के अनुसार पीएम आवास योजना (शहरी) 2.0 के तहत उत्तराखंड के लिए कुल 3,979 आवास स्वीकृत हैं, जिनमें से 1,867 आवासों की ग्राउंडिंग, यानी निर्माण कार्य शुरू हो चुका है। अगस्त 2026 में राज्य के लिए 1,647 अतिरिक्त आवास स्वीकृत हुए थे और उनकी धनराशि सितंबर में जारी की गई।
यह उपलब्धि निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन इसी के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है—क्या प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ उत्तराखंड के अंतिम पात्र परिवार तक समान रूप से पहुंच रहा है?
राज्य में समय-समय पर यह शिकायत और राजनीतिक चर्चा सामने आती रही है कि सरकारी योजनाओं में उत्तराखंड के स्थानीय पात्र परिवारों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। यदि कहीं उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली अथवा अन्य राज्यों से आए लोगों को स्थानीय पात्रों की तुलना में आवास का लाभ मिलने की शिकायत है तो उसकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। किसी भी समुदाय, धर्म या बाहरी राज्य के व्यक्ति को केवल पहचान के आधार पर दोषी ठहराना उचित नहीं होगा; असली कसौटी पात्रता, स्थायी निवास, आय, दस्तावेज और योजना के नियमों का पालन होना चाहिए।
यही वह बिंदु है जहां सरकार के सामने पारदर्शिता की अगली परीक्षा है। यदि लाभार्थियों की पूरी सूची सार्वजनिक हो, पात्रता की जानकारी उपलब्ध हो और स्थानीय लोगों की शिकायतों का निस्तारण हो तो उपलब्धि पर सवालों की गुंजाइश भी कम होगी।
प्रधानमंत्री आवास योजना के पुराने घटकों में भी उत्तराखंड ने उल्लेखनीय प्रगति का दावा किया है। लाभार्थी आधारित निर्माण (BLC) के तहत 19,380 आवास पूरे हो चुके हैं। भागीदारी में किफायती आवास (AHP) के करीब 15,960 स्वीकृत आवासों में से 11,848 से अधिक पूरे हो चुके हैं। वहीं CLSS के तहत 19,190 आवासों के लिए ब्याज सब्सिडी उपलब्ध कराई गई है।
बदरीनाथ ने तोड़ा रिकॉर्ड, 20 लाख की ओर बढ़ती आस्था
दूसरी तरफ उत्तराखंड की धार्मिक पर्यटन अर्थव्यवस्था के लिए बदरीनाथ धाम से बड़ी खबर सामने आई है। अक्टूबर की शुरुआत में ही भगवान बदरी विशाल के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं की संख्या 18.70 लाख के पार पहुंच गई है। वर्ष 2023 में बना 18.39 लाख श्रद्धालुओं का रिकॉर्ड टूट चुका है।
5 अक्टूबर तक उपलब्ध रिपोर्टों में यह संख्या करीब 18.67 लाख बताई गई थी और लगातार यात्रा जारी रहने के कारण इस वर्ष 20 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के बदरीनाथ पहुंचने की संभावना जताई जा रही है।
श्राद्ध पक्ष में देश-विदेश से लोग अपने पितरों के पिंडदान और तर्पण के लिए बदरीनाथ पहुंच रहे हैं। यह उत्तराखंड की धार्मिक पहचान के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ा अवसर है। मगर बढ़ती भीड़ के साथ पार्किंग, सड़क, स्वास्थ्य, स्वच्छता, यातायात और स्थानीय निवासियों की सुविधाओं का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है।
भाजपा ने शुरू की चुनावी तैयारी, नए चेहरों पर नजर
इसी बीच 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा ने भी संगठनात्मक स्तर पर अपनी रणनीति तेज कर दी है। पार्टी सत्ता विरोधी माहौल की काट के लिए कई सीटों पर नए चेहरों को उतारने की संभावनाओं पर मंथन कर रही है।
प्रदेश में संगठन प्रभारी राम माधव और सह प्रभारी अरविंद मेनन व बांसुरी स्वराज जमीनी फीडबैक लेने में जुटे हैं। पार्टी संगठन को चुनावी मोड में लाने के साथ युवाओं और महिलाओं समेत नए संभावित चेहरों की राजनीतिक स्वीकार्यता भी परख रही है।
उत्तराखंड की राजनीति में सत्ता का चक्र मुख्य रूप से भाजपा और कांग्रेस के बीच घूमता रहा है। भाजपा लगातार दूसरे कार्यकाल में सत्ता में है। ऐसे में एंटी-इनकंबेंसी को लेकर पार्टी की चिंता स्वाभाविक है। यदि टिकट वितरण में बड़े पैमाने पर नए चेहरे सामने आते हैं तो यह उत्तराखंड की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जाएगा।
सड़क सुरक्षा पर सख्ती, ‘नो हेलमेट-नो एंट्री’ की तैयारी
सड़क दुर्घटनाओं को लेकर भी सरकार अब सख्त रुख अपनाने की तैयारी में है। सुप्रीम कोर्ट की सड़क सुरक्षा समिति के अध्यक्ष एवं सेवानिवृत्त न्यायाधीश अभय मनोहर सप्रे ने देहरादून में समीक्षा बैठक के दौरान सरकारी कार्यालयों, स्कूल-कॉलेज और कोचिंग संस्थानों में ‘नो हेलमेट, नो एंट्री’ व्यवस्था लागू करने के निर्देश दिए हैं।
बिना ड्राइविंग लाइसेंस और बिना वाहन बीमा के भी प्रवेश रोकने की व्यवस्था पर जोर दिया गया है। परिवहन कार्यालयों में स्वचालित ड्राइविंग टेस्ट ट्रैक और लाइसेंस जारी करने से पहले कंप्यूटर आधारित परीक्षा को अनिवार्य बनाने की दिशा में भी निर्देश दिए गए।
चारधाम मार्गों पर एएनपीआर कैमरे लगाने तथा नियम तोड़ने वाले वाहनों पर कार्रवाई के साथ ट्रॉमा सेंटर और चालक विश्राम गृह विकसित करने की संभावनाएं तलाशने को भी कहा गया है।
कैंची धाम की आस्था बनी यातायात की चुनौती
लेकिन सड़क सुरक्षा की चर्चा के बीच कैंची धाम की मौजूदा तस्वीर भी सरकार और प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है। हाल के दिनों में कैंची धाम में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के कारण भीमताल से कैंची धाम तक घंटों जाम लगा। रिपोर्टों के मुताबिक कई यात्रियों को तीन घंटे से अधिक समय तक परेशानी झेलनी पड़ी और इसका असर अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, रानीखेत, धारचूला, बागेश्वर और हल्द्वानी आने-जाने वाले यात्रियों पर भी पड़ा।
पुलिस को विशेष यातायात प्लान लागू करना पड़ा और भीमताल तथा भवाली से शटल सेवा चलानी पड़ी।
यह सवाल केवल पर्यटकों की सुविधा का नहीं है। कैंची धाम की बढ़ती लोकप्रियता के कारण स्थानीय ग्रामीण, व्यापारी, कर्मचारी, विद्यार्थी, मरीज और रोजाना आवागमन करने वाले उत्तराखंड के लोग भी जाम की समस्या से प्रभावित हो रहे हैं। गरमपानी के व्यापारियों ने भी जाम से कारोबार प्रभावित होने की बात कही है।
जब एक ओर सरकार शून्य मृत्यु दर वाले जिलों की कार्ययोजना बनाने और सड़क सुरक्षा मजबूत करने की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर धार्मिक स्थलों पर उमड़ती भीड़ से पैदा होने वाले यातायात दबाव का स्थायी समाधान भी जरूरी है। कैंची धाम के लिए बाईपास और वैकल्पिक यातायात व्यवस्था पर काम की जरूरत इसी वजह से और बढ़ जाती है।
जखिया से पहाड़ की रसोई तक लौटती पहचान
इन तमाम राजनीतिक और प्रशासनिक खबरों के बीच उत्तराखंड की पहाड़ी पहचान का एक दूसरा पहलू भी सामने आता है—जखिया। पहाड़ों में पारंपरिक रूप से तड़के के लिए इस्तेमाल होने वाला यह स्थानीय बीज आज फिर चर्चा में है।
जखिया यानी Cleome viscosa की पत्तियां चिपचिपी होती हैं और इसके पीले फूल सुबह खिलते हैं। इसके छोटे काले बीज दाल, सब्जी और कढ़ी के तड़के में इस्तेमाल किए जाते हैं। पारंपरिक ज्ञान में इसे पाचन से जुड़ी समस्याओं और कई घरेलू उपचारों में उपयोग किया जाता रहा है।
हालांकि जखिया को पैरासिटामोल का विकल्प या किसी बीमारी का प्रमाणित उपचार मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। इसे पारंपरिक खाद्य एवं वनस्पति ज्ञान के रूप में देखा जाना चाहिए और औषधीय उपयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूरी है।
उपलब्धियों के बीच असली सवाल
उत्तराखंड की तस्वीर इस समय कई रंगों वाली है—पीएम आवास में राष्ट्रीय पुरस्कार, बदरीनाथ में रिकॉर्ड आस्था, भाजपा की चुनावी रणनीति, सड़क सुरक्षा पर सख्ती, कैंची धाम में यातायात संकट और पहाड़ी परंपराओं की वापसी।
लेकिन लोकतंत्र में असली परीक्षा पुरस्कारों और घोषणाओं से आगे होती है। सवाल यह है कि योजनाओं का लाभ वास्तव में किसे मिल रहा है? क्या स्थानीय पात्र परिवारों को प्राथमिकता मिल रही है? क्या धार्मिक पर्यटन से पहाड़ के स्थानीय लोगों की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है? क्या बढ़ती भीड़ के साथ सड़क और स्वास्थ्य सुविधाएं भी बढ़ रही हैं? क्या नए चेहरों की राजनीति जनता की नाराजगी को समझ पाएगी?
यही सवाल 2027 की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं। उत्तराखंड में बदलाव की दस्तक केवल चुनावी टिकटों से नहीं, बल्कि शासन के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने वाली पारदर्शिता, स्थानीय हित और जवाबदेही से भी सुनाई देगी।