पाकिस्तान के सबसे बड़े और अशांत प्रांत बलूचिस्तान ने पाकिस्तान से आजाद होने और एक नए राष्ट्र के रूप में खुद को स्थापित करने का ऐलान किया है।बलूचों द्वारा एक नए देश के ऐलान ने पाकिस्तान के लिए नई मुसीबतें खड़ी कर दी हैं।

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खुद को बलूचों का प्रतिनिधि बताने वाले मीर यार बलूच ने एक दिन पहले, बुधवार (15 जुलाई) को अपने सोशल मीडिया X के हैंडल से ऐलान किया कि पाकिस्तान के सबसे बड़े प्रांत बलूचिस्तान ने खुद को अलग करते हुए आज़ादी का ऐलान कर दिया है। इस घोषणा के साथ ही ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ के अस्तित्व में आने का दावा किया गया है। आज़ादी की घोषणा पाकिस्तान के खिलाफ बलूचिस्तान की लंबी लड़ाई की नवीनतम घटना है।

X पर किए गए पोस्ट में दावा गया है कि “रिपब्लिक ऑफ़ बलूचिस्तान की रक्षा और सुरक्षा बलों ने बलूचिस्तान के 85 फीसदी इलाकों पर कब्ज़ा कर लिया है।” मीर यार बलूच ने आगे कहा कि “बलूचिस्तान ने अपना राष्ट्रगान ‘मा चुकेन बलोचानी’ अपनाया है, अपना राष्ट्रीय ध्वज पेश किया है और अपनी मुद्रा ‘बलूची फालुस’ शुरू की है।” उन्होंने ऐलान किया कि बलूचिस्तान ने अपना नया राष्ट्रीय ध्वज और शासन प्रणाली भी स्थापित कर ली है।

सोने और तांबे की खदानों पर नियंत्रण का दावा

स्वयंभू बलूच प्रशासन का दावा है कि पाकिस्तान की सेना और सुरक्षा एजेंसियों के कई सदस्यों ने इस्तीफा देकर बलोच आंदोलन का हाथ थाम लिया है। प्रशासन के अनुसार, उनके पास लगभग 5 लाख कर्मियों की फौज है, जो 2026 के अंत तक पाकिस्तानी सेना को पूरी तरह खदेड़ने के लिए तैयार है। वायरल हो बलूचों के पत्र में दावा किया गया है कि नए अधिकारियों ने इलाके में मौजूद सोने और तांबे की खदानों, गैस क्षेत्रों और कोयले की खदानों समेत अहम प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण कर लिया है।

भारत से अपील- हमें पाकिस्तान का हिस्सा न कहें

सबसे बड़ी बात यह है कि बलूचों ने भारत से खास अपील की है और कहा है कि हमें पाकिस्तान का हिस्सा न कहें। बलूचिस्तान के प्रतिनिधियों ने भारतीय मीडिया, बुद्धिजीवियों और नागरिकों से आग्रह किया है कि वे बलोच लोगों को “पाकिस्तान के अपने लोग” कहना बंद करें। उन्होंने स्पष्ट किया कि बलोच और पाकिस्तानी (विशेषकर पंजाबी) अलग हैं, और वे लंबे समय से पाकिस्तानी सेना द्वारा किए जा रहे हवाई हमलों और मानवाधिकारों के हनन का शिकार रहे हैं।

चीन और CPEC पर प्रहार

बलूचिस्तान की इस बगावत के पीछे एक बड़ी वजह चीन का दखल भी है। अरबों डॉलर का चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) और ग्वादर पोर्ट बलोच लोगों के लिए नाराजगी का मुख्य केंद्र हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि चीन और पाकिस्तान मिलकर उनके सोने, चांदी और तांबे जैसे प्राकृतिक संसाधनों का शोषण कर रहे हैं, जबकि स्थानीय जनता आज भी गरीबी में जी रही है। दरअसल, यह इलाका सोना, हीरा, चांदी और तांबे से समृद्ध है। उनका आरोप है कि उन्हें इस क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों से होने वाले मुनाफे का उचित हिस्सा नहीं मिला है और वे गरीबी से जूझ रहे हैं।

भारत के लिए कैसा ‘त्रिकोणीय धर्मसंकट’?

बलूचिस्तान ने भारत से अंतरराष्ट्रीय मान्यता की मांग की है, लेकिन यह नई दिल्ली के लिए एक कूटनीतिक अग्निपरीक्षा की तरह है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत बलूचिस्तान को एक अलग राष्ट्र के तौर पर अंतरराष्ट्रीय मान्यता देता है तो यह पाकिस्तान को टुकड़े-टुकड़े करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित तो होगा लेकिन इसके दूरगामी और कूटनीतिक अंजाम हो सकते हैं। सबसे पहला यह कि अगर भारत बलूचिस्तान को मान्यता देता है, तो पाकिस्तान को कश्मीर के मुद्दे पर नई दिल्ली को घेरने और हस्तक्षेप का आरोप लगाने का मौका मिल जाएगा। दूसरी तरफ पाकिस्तान को UN जैसे मंचों पर रोने का बहाना मिल जाएगा और पूरी दुनिया में वह भारत के खिलाफ नया नैरेटिव गढ़ सकता है।

चीन से होगा तनाव

दूसरा, अगर भारत ने बलूचिस्तान को मान्यता दी तो भारत-चीन संबंधों मेंतनाव का नया दौर शुरू हो सकता है क्योंकि बलूचिस्तान से चीन के गहरे रणनीतिक और व्यापारिक हित जुड़े हैं। बता दें कि बलूचिस्तान, चीन द्वारा वित्तपोषित अरबों डॉलर की परियोजना ‘चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा’ (CPEC) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह परियोजना चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ‘बेल्ट एंड रोड पहल’ का हिस्सा है, जिसमें ओमान की खाड़ी के पास ग्वादर शहर में स्थित गहरे समुद्र का बंदरगाह एक महत्वपूर्ण केंद्र बिंदु माना जाता है। चीन खनन परियोजनाओं और ग्वादर में एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के निर्माण में भी शामिल है। लिहाजा, इस मामले में हस्तक्षेप से भारत-चीन संबंधों में और कड़वाहट आ सकती है।

ईरान के साथ संबंधों में आ सकती है गिरावट

इतना ही नहीं, अगर भारत ने बलूचिस्तान को समर्थन दिया तो ईरान भी नाराज हो सकता है क्योंकि तेहरान ने भी बलोच अलगाववादियों को बाहरी समर्थन के खिलाफ चेतावनी दी है। ऐसे में भारत चाबहार बंदरगाह जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स के कारण ईरान को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकता है। ऐसे में बलूचिस्तान की आज़ादी का समर्थन करने से इलाके में अस्थिरता बढ़ सकती है और क्षेत्रीय भू-राजनीति में तनाव का नया दौर शुरू हो सकता है, जबकि यह इलाका पहले से ही अशांत है और यहाँ आतंकवाद की समस्या पहले से ही गहरी पैठ जमाए हुए है। लिहाजा, बलिचिस्तान के मुद्दे पर भारत की कूटनीति को एक लिटमस टेस्ट पास करना पड़ सकता है।


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