ये हमले भी रात के अंधेरे में किए गए और होर्मुज से लेकर खार्ग तक पर अमेरिकी सेनाओं ने जब भी धावा बोला, रात में ही बोला. फिर अचानक 15 जुलाई को अमेरिका ने ईरान पर सीजफायर टूटने के बाद पहली बार दिनदहाड़े हमले क्यों शुरू कर दिए?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
इससे पहले लगातार तीन-चार रातों तक हमले होते रहे थे. CENTCOM ने खुद इन्हें तीसरी और चौथी निर्णायक रात बताया था. जब 15 जुलाई को दिन में हमला हुआ तो कई मीडिया आउटलेट्स ने इसे दुर्लभ दिन का ऑपरेशन और अब तक की पहली दिन की कार्रवाई करार दिया गया. तो क्या यह बदलाव सामान्य था? ऐसा मानना गलती होगी क्योंकि ये वाकई अमेरिका की ओर से जानबूझकर उठाया गया रणनीतिक कदम था. डोनाल्ड ट्रंप के बयान ने इस बात को साफ भी कर दिया कि ये कोई संयोग नहीं बल्कि अमेरिका का बड़ा प्रयोग है.
क्यों रात से दिन में शिफ्ट हुए हमले?
रात के हमले सैन्य रणनीति में आम हैं क्योंकि अमेरिका के पास नाइट-विजन, स्टील्थ तकनीक और बेहतर सेंसर्स हैं. दुश्मन के रडार रात में कम प्रभावी होते हैं और सिविलियन कैजुअल्टी का खतरा भी थोड़ा कम रहता है. हालांकि दिन में हमला करना कड़ा संदेश देता है और यह दिखाता है कि अमेरिका अब छिपने या बचने की चिंता नहीं कर रहा. वह ईरान को बता रहा है कि हम रात के अंधेरे का इंतजार किए बिना भी तुम्हें मार सकते हैं. यह एक तरह का मनोवैज्ञानिक दबाव है. ईरान को यह महसूस कराना कि उसकी एयर डिफेंस इतनी कमजोर हो चुकी है कि दिन-रात का फर्क अब मायने नहीं रखता.
ट्रंप के बयान ने दिए सटीक कारण
ट्रंप ने फॉक्स न्यूज को दिए बयान में साफ कहा कि इस हफ्ते कई हमले होंगे और अगले हफ्ते और तेज होंगे. उन्होंने पावर प्लांट, पुल और तेल इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाने की बात कही. दिन का हमला इसी आक्रामक रणनीति का हिस्सा था. इसके जरिये अमेरिका क्या संदेश देना चाहता है, हम इस तरह जान सकते हैं –
- ईरान को अमेरिका का संदेश है कि तुम्हारी मिसाइलें, प्रॉक्सी ग्रुप और न्यूक्लियर महत्वाकांक्षा काम नहीं आएंगी. हम तुम्हें हर जगह, हर समय निशाना बना सकते हैं.
- वहीं अमेरिका अब दुनिया को बताना चाहता है कि वो अपनी नीति को एक स्टेप और आगे बढ़कर निर्णायक एक्शन तक लाना चाहता है. खासकर मध्य पूर्व में उसका दबदबा बरकरार है.
- इसके अलावा मध्य पूर्ण में मौजूद अपने क्षेत्रीय सहयोगियों जैसे इजराइल और सऊदी को वो बता रहा है कि हम तुम्हारे साथ हैं. ईरान के खिलाफ कोई समझौता नहीं होगा जब तक वह अपनी नीति नहीं बदलता.
अमेरिका को क्या होगा रणनीति बदलने का फायदा?
दिन के हमलों से ईरान की सैन्य और आर्थिक क्षमता तेजी से कमजोर हो सकती है. इससे तेल निर्यात, बुनियादी ढांचा और कमांड सिस्टम प्रभावित होंगे. इसके अलावा ट्रंप प्रशासन मजबूत स्थिति में आकर ईरान से समझौते पप बातचीत करना चाहता है. ऐसे में अब अमेरिकी मजबूत हमले के बाद शांति की रणनीति अपनाना चाहता है. उधर इजरायल और सऊदी ईरान की प्रॉक्सी ताकतों – हिजबुल्लाह और हूती पर हमले कर रहे हैं, इनकी ताकत कम हुई तो क्षेत्र में तनाव कुछ हद तक कम हो सकता है.
दोधारी तलवार हैं दिन के हमले
अब इसके नुकसान पर बात करें तो इससे ईरान और ज्यादा भड़क सकता है और भयानक जवाबी कार्रवाई कर सकता है. होर्मुज बंद होने, तेल कीमतों में उछाल और बड़े पैमाने पर युद्ध की आशंका बढ़ गई है. खासतौर पर तब, जब चीन लगातार ईरान का साथ दे रहा है और इस अशांति का जिम्मेदार अमेरिका को ठहरा रहा है. दिन के हमलों में आम नागरिकों के मारे जाने की संभावना ज्यादा होती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की छवि खराब हो सकती है. अगर अमेरिका की ये चाल उल्टी पड़ी तो ईरान और मजबूत होकर उभरेगा और अमेरिका की छवि आक्रामक देश के तौर पर बनेगी, जो उसके आगे उसके हितों के लिए ठीक नहीं.
कुल मिलाकर 15 जुलाई का दिन का हमला महज एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि अमेरिका की नई आक्रामक नीति का प्रतीक बन चुका है. ट्रंप प्रशासन ईरान को चेतावनी दे रहा है कि अब खेल पुराना वाला नहीं चलेगा, लेकिन इसके अपने खतरे भी हैं. अगर ईरान झुक गया तो अमेरिका को बड़ी कूटनीतिक जीत मिलेगी, पर कहीं ईरान ने भारी जवाब दिया तो पूरा मध्य पूर्व आग की लपटों में घिर सकता है.
