प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और हरियाणा सहित कई राज्यों में कथित टेरर फंडिंग, मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध घुसपैठ नेटवर्क से जुड़े मामले में की गई छापेमारी ने एक बार फिर देश में संगठित अपराध, अवैध धन और माफिया नेटवर्क पर बहस तेज कर दी है। यूपी एटीएस की एफआईआर के आधार पर शुरू हुई जांच में जिस प्रकार फर्जी दस्तावेज, विदेशी फंडिंग, म्यूल अकाउंट और संदिग्ध वित्तीय लेन-देन का खुलासा हुआ है, उससे स्पष्ट है कि संगठित अपराध केवल सीमाओं तक सीमित विषय नहीं रह गया, बल्कि यह पूरे देश के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है।
इसी संदर्भ में उत्तराखंड को लेकर भी कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं। राज्य में वर्षों से भूमि घोटालों, सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण, अवैध प्लॉटिंग, नशा तस्करी, खनन, भू-माफिया और बाहरी आपराधिक नेटवर्क की सक्रियता को लेकर लगातार चिंताएं व्यक्त होती रही हैं। ऐसे में यह मांग उठना स्वाभाविक है कि यदि विभिन्न राज्यों में आर्थिक अपराधों और माफिया नेटवर्क के विरुद्ध एजेंसियां सक्रिय हैं, तो उत्तराखंड में भी व्यापक और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
राज्य के कई हिस्सों में समय-समय पर सरकारी, वन और ग्राम समाज की भूमि पर कब्जों के आरोप सामने आते रहे हैं। कई मामलों में यह भी कहा जाता है कि रिकॉर्ड में हेरफेर कर जमीनों का स्वरूप बदला गया, प्लॉटिंग हुई और करोड़ों रुपये के सौदे हुए। यदि ऐसे आरोप हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होना कानून के शासन की बुनियादी आवश्यकता है। जिन अभिलेखों में परिवर्तन हुए, उनकी फोरेंसिक और प्रशासनिक जांच कर यह पता लगाया जाना चाहिए कि कहीं अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों की मिलीभगत तो नहीं थी।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
उत्तराखंड में नशे का फैलता कारोबार भी एक गंभीर सामाजिक चुनौती है। युवाओं को नशे की गिरफ्त में धकेलने वाले गिरोहों के आर्थिक स्रोतों की पहचान करना और उनकी संपत्तियों की जांच करना उतना ही आवश्यक है जितना किसी अन्य राज्य में मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों की जांच करना। यदि किसी व्यक्ति या गिरोह ने अवैध कारोबार से अकूत संपत्ति अर्जित की है, तो उसके आय के स्रोतों की कानूनी जांच होनी चाहिए।
इसी प्रकार भू-माफिया के विरुद्ध भी कठोर कार्रवाई की मांग लंबे समय से उठती रही है। यदि किसी ने सरकारी भूमि, वन भूमि या सार्वजनिक संपत्ति पर अवैध कब्जा कर आर्थिक लाभ कमाया है, तो उसकी संपत्तियों, बैंक खातों और दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। कानून का उद्देश्य केवल अपराध दर्ज करना नहीं, बल्कि अपराध से अर्जित संपत्ति तक पहुंचना भी है।
समय-समय पर ऐसे आरोप भी सामने आते रहे हैं कि कुछ सरकारी कर्मचारियों या अधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार अथवा अनियमितताओं की कार्रवाई के बाद भी उनके पास अत्यधिक संपत्ति होने की चर्चा होती है। यदि किसी मामले में आय से अधिक संपत्ति या अवैध धन अर्जित करने के प्रमाण मिलते हैं, तो सक्षम जांच एजेंसियों को तथ्यों के आधार पर कार्रवाई करनी चाहिए। किसी भी व्यक्ति की जांच केवल आरोपों पर नहीं, बल्कि कानूनी साक्ष्यों और प्रक्रिया के अनुरूप ही होनी चाहिए।
उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति, तेजी से बढ़ता शहरीकरण, पर्यटन, निवेश और भूमि का बढ़ता मूल्य भी इसे आर्थिक अपराधों के लिए संवेदनशील बनाते हैं। यदि बाहरी राज्यों के संगठित अपराधी यहां निवेश या संपत्ति खरीदकर अपनी अवैध कमाई को वैध बनाने का प्रयास करते हैं, तो यह राज्य की सुरक्षा और प्रशासन दोनों के लिए गंभीर विषय है। ऐसे मामलों में प्रवर्तन एजेंसियों, पुलिस, आयकर विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।
यह कहना उचित होगा कि कानून की कार्रवाई किसी राज्य, दल, व्यक्ति या प्रभाव के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए। यदि उत्तराखंड में भी ऐसे मामले हैं जिनमें मनी लॉन्ड्रिंग, अवैध संपत्ति, सरकारी भूमि पर कब्जा, फर्जी दस्तावेज, नशा तस्करी या संगठित अपराध के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित एजेंसियों को बिना किसी भेदभाव के कठोर कार्रवाई करनी चाहिए।
देवभूमि उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक संपदा, आध्यात्मिक पहचान और शांत सामाजिक वातावरण के लिए जाना जाता है। इस छवि को बनाए रखना सरकार, प्रशासन और समाज सभी की साझा जिम्मेदारी है। यदि अपराधी तत्व राज्य को सुरक्षित ठिकाना समझने लगें, तो यह चिंता का विषय है और इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
जनता की अपेक्षा है कि भ्रष्टाचार, भू-माफिया, नशा तस्करी, अवैध कब्जों और आर्थिक अपराधों के विरुद्ध कार्रवाई केवल चुनिंदा राज्यों तक सीमित न रहे। जहां भी ठोस साक्ष्य उपलब्ध हों, वहां कानून समान रूप से लागू हो। उत्तराखंड में भी यदि किसी नेता, अधिकारी, भू-माफिया, नशा तस्कर या संगठित अपराध से जुड़े व्यक्ति के विरुद्ध प्रथम दृष्टया पर्याप्त प्रमाण हों, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि कानून सबके लिए समान हो। जांच एजेंसियों की निष्पक्षता, पारदर्शिता और साक्ष्य-आधारित कार्रवाई ही जनता का विश्वास मजबूत करती है। उत्तराखंड सहित पूरे देश में यही अपेक्षा है कि अपराधी कोई भी हो, उसका राजनीतिक, आर्थिक या सामाजिक प्रभाव चाहे जितना हो, कानून का हाथ हर दोषी तक समान रूप से पहुंचे।
