उत्तराखंड,उत्तराखंड में एक गंभीर प्रश्न लगातार उभर रहा है कि क्या पुलिस का मूल दायित्व अपराध रोकना है या फिर हर सरकारी विभाग के अभियान को लागू कराना? हाल के दिनों में पुलिस की तैनाती ऐसे अनेक कार्यों में दिखाई दे रही है, जिनका सीधा संबंध कानून-व्यवस्था से कम और प्रशासनिक अभियानों से अधिक है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
कहीं धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर उतरवाने के लिए पुलिस लगी है, कहीं ध्वनि प्रदूषण के नियम समझा रही है, कहीं हर चौराहे पर यातायात चालान काटने में व्यस्त है, कहीं वीआईपी कार्यक्रमों की सुरक्षा और आवभगत में तैनात है, तो कहीं धरना-प्रदर्शनों की निगरानी में लगी हुई है। अब स्मार्ट मीटर लगाने के अभियान में भी पुलिस बल की तैनाती देखने को मिल रही है।
स्मार्ट मीटर योजना का क्रियान्वयन उत्तराखंड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीसीएल) की जिम्मेदारी है। इस कार्य में आवश्यकता पड़ने पर पीआरडी और होमगार्ड जैसे बलों की भी सहायता ली जा सकती है। इसके बावजूद यदि बड़ी संख्या में नियमित पुलिस बल को मीटर लगाने के दौरान सुरक्षा व्यवस्था के लिए लगाया जाता है, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि उसी समय अपराध नियंत्रण की जिम्मेदारी कौन निभाएगा?
जनता पुलिस से यह अपेक्षा करती है कि वह नशा तस्करों, गैंगस्टरों, साइबर अपराधियों, भूमि माफिया, खनन माफिया, वन तस्करों और संगठित अपराध पर प्रभावी कार्रवाई करे। चोरी, लूट, महिलाओं के विरुद्ध अपराध, साइबर ठगी और फरार अपराधियों की गिरफ्तारी जैसे विषय पुलिस की प्राथमिकता होने चाहिए।
यह भी सत्य है कि न्यायालय के आदेशों का पालन कराना, कानून-व्यवस्था बनाए रखना और आवश्यकता पड़ने पर अन्य विभागों को सुरक्षा उपलब्ध कराना पुलिस की जिम्मेदारियों का हिस्सा है। परंतु यदि हर प्रशासनिक अभियान में नियमित पुलिस बल ही सबसे आगे दिखाई देगा, तो अपराध नियंत्रण के लिए उपलब्ध संसाधन सीमित होना स्वाभाविक है।
समय-समय पर विभिन्न मंचों से यह आरोप भी सामने आते रहे हैं कि नशा तस्करी, अवैध खनन, भूमि कब्जे और अन्य संगठित अपराधों के मामलों में कठोर कार्रवाई की आवश्यकता है। ऐसे आरोपों की निष्पक्ष जांच और अपराधियों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई ही जनता का विश्वास मजबूत कर सकती है।
उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में पुलिस की सबसे बड़ी ताकत उसकी सक्रिय अपराध-रोधी व्यवस्था होनी चाहिए। यदि पुलिस का अधिकतम समय और ऊर्जा अपराधियों की धरपकड़, खुफिया तंत्र को मजबूत करने, सीमावर्ती क्षेत्रों की निगरानी, साइबर अपराध की जांच और जनता की सुरक्षा पर केंद्रित हो, तो कानून-व्यवस्था और अधिक सुदृढ़ हो सकती है।
आखिरकार प्रश्न किसी एक अभियान का विरोध करने का नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं का है। प्रशासनिक अभियानों के लिए संबंधित विभागों, पीआरडी, होमगार्ड और अन्य सहायक व्यवस्थाओं का अधिक प्रभावी उपयोग हो, जबकि नियमित पुलिस बल का मुख्य फोकस अपराध नियंत्रण, कानून-व्यवस्था और नागरिक सुरक्षा पर रहे। यही जनता की सबसे बड़ी अपेक्षा भी है।
