आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू एक प्रतिष्ठित लेखक भी थे. जवाहरलाल नेहरू की रुचि लेखन में शुरू से ही थी. जेल में उनकी लिखी किताबें, जैसे ‘लेटर्स फ्रॉम अ फादर टू हिज डॉटर’, ‘एन ऑटोबायोग्राफी’,’ ग्लिम्पसेज़ ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री’ और ‘द डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ दुनिया भर में पढ़ी और सराही गईं.

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नेहरू ने प्रधानमंत्री पद का दायित्व 17 सालों तक निभाया

14 नवंबर 1889 को इलाहाबाद में जन्मे जवाहरलाल नेहरू 15 साल की उम्र में पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए थे. हैरो में दो साल बिताने के बाद उन्होंने कैब्रिज विश्वविद्यालय में दाखिला लिया. जहां से उन्होंने ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की. 1912 में भारत लौटने के बाद वह राजनीति से जुड़ गए. जवाहरलाल नेहरू को 1930-1935 के दौरान नमक आंदोलन और कांग्रेस के अन्य आंदोलनों के कारण कई बार जेल जाना पड़ा. अपने पूरे जीवन में वह नौ बार जेल गए. उन्होंने इस समय का उपयोग भारत के इतिहास के बारे में अपने विचारों को लिखने के लिए किया.

जेल की तनहाई दूर करने के लिए लिखा

उसी दौरान जवाहरलाल नेहरू ने अपनी जीवनी ‘एन ऑटोबायोग्राफी’ लिखी थी. पिछले दिनों इसका हिंदी रूपांतरण ‘मेरी कहानी’ नाम से पेंगुइन स्वदेश ने प्रकाशित किया है. इसका अनुवाद श्रीरामनाथ सुमन ने किया है. जवाहरलाल नेहरू ने किताब की प्रस्तावना में लिखा है, “इस पुस्तक को लिखने का उद्देश्य यह था कि मैं किसी निश्चित काम में लग जाऊं जो जेल जीवन की तनहाई काटने के लिए जरूरी होता है. साथ ही मैं पिछले दिनों की भारत की उन घटनाओं का विवेचन भी कर लेना चाहता था, जिनसे मेरा ताल्लुक रहा है.”

जेल में रहने के दौरान जवाहरलाल नेहरू ने अपनी जीवनी ‘एन ऑटोबायोग्राफी’ लिखी थी. पिछले दिनों इसका हिंदी रूपांतरण ‘मेरी कहानी’ नाम से पेंगुइन स्वदेश ने प्रकाशित किया है.

बादशाह के बुलावे पर आए दिल्ली
जवाहरलाल नेहरू ने ‘मेरी कहानी’ में अपने कश्मीरी घराने के बारे में बताया है. साथ ही उन्होंने यह भी लिखा है कि उनके पूर्वज किन परिस्थितियों में कश्मीर छोड़कर दिल्ली आ बसे. वह लिखते हैं, “हम कश्मीर के रहने वाले हैं. दो सौ बरस से अधिक हुए होंगे, अठारहवीं सदी के शुरू में हमारे पूर्वज यश और धन कमाने के इरादे से कश्मीर की सुंदर घाटियों से नीचे के उपजाऊ मैदानों में आए. वे मुगल साम्राज्य के पतन के दिन थे. औरंगजेब मर चुका था और फर्रुखसियर बादशाह था. हमारे जो पूर्वज सबसे पहले आए, उनका नाम था राज कौल. कश्मीर के संस्कृत और फारसी के विद्वानों में उनका बड़ा नाम था. फर्रुखसियर जब कश्मीर गया, तो उसकी नजर उन पर पड़ी और शायद उसी के कहने से उनका परिवार दिल्ली आया, जोकि उस समय मुगलों की राजधानी थी.”

फिर कैसे हुए कौल से नेहरू‘मेरी कहानी’ के मुताबिक, ” यह सन् 1716 के आसपास की बात है. राज कौल को एक मकान और कुछ जागीर दी गई. मकान नहर के किनारे था, इसी से उनका नाम नेहरू पड़ गया. कौल जो उनका कौटुम्बिक नाम था, बदलकर कौल-नेहरू हो गया और आगे चलकर कौल तो गायब हो गया और हम महज नेहरू रह गए. उसके बाद ऐसा डांवाडोल युग आया कि हमारे कुटुम्ब के वैभव का अंत हो गया और वह जागीर भी तहस-नहस हो गई. मेरे परदादा लक्ष्मीनारायण नेहरू, दिल्ली के बादशाह के नाममात्न के दरबार में कंपनी सरकार के पहले वकील हुए. मेरे दादा गंगाधर नेहरू, 1857 के गदर के कुछ पहले तक दिल्ली के कोतवाल थे. 1861 में 34 साल की भरी जवानी में ही वह परलोक सिधार गए.”

दिल्ली से आगरा जाकर बस गया परिवार

नेहरू लिखते हैं, “1857 के गदर की वजह से हमारे परिवार का संपूर्ण वैभव बिखर गया. हमारे खानदान के तमाम कागज पत्तर और दस्तावेज तहस-नहस हो गए. इस तरह अपना सब-कुछ खो चुकने पर हमारा परिवार, दिल्ली छोड़ने वाले और कई लोगों के साथ, वहां से चल पड़ा और आगरा जाकर बस गया. कुछ बरसों तक वे लोग आगरा रहे और वहीं 6 मई, 1861 को पिताजी (मोतीलाल नेहरू) का जन्म हुआ. मगर वह पैदा हुए थे मेरे दादा के मरने के तीन महीने बाद. मेरे दादा की एक छोटी तस्वीर हमारे यहां है, जिसमें वह मुगलों का दरबारी लिबास पहने और हाथ में एक टेढ़ी तलवार लिए हुए हैं. उसमें वह एक मुगल सरदार जैसे लगते हैं, हालांकि सूरत-शक्ल उनकी कश्मीरियों की-सी ही थी.”

ताऊ ने किया पिता का लालन-पालन

‘मेरी कहानी’ के मुताबिक, “तब हमारे परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी मेरे दो ताऊओं पर आ पड़ी, जोकि उम्र में मेरे पिता से काफी बड़े थे. बड़े ताऊ बंसीधर नेहरू थोड़े ही दिन बाद ब्रिटिश सरकार के न्याय विभाग में नौकर हो गए. जगह-जगह उनका तबादला होता रहा, जिससे वह परिवार के और लोगों से बहुत कुछ जुदा पड़ गए. मेरे छोटे ताऊ नंदलाल नेहरू राजपूताना की एक छोटी-सी रियासत, खेतड़ी, के दीवान हुए और वहां दस बरस तक रहे. बाद में उन्होंने कानून का अध्ययन किया और आगरा में वकालत शुरू की. मेरे पिता भी उन्हीं के साथ रहे और उन्हीं की छत्रछाया में उनका लालन-पालन हुआ.”

आगरा से इलाहाबाद चला गया परिवार

जवाहरलाल नेहरू ने लिखा, “दोनों का आपस में बड़ा प्रेम था और उसमें बंधु-प्रेम, पितृ-प्रेम और वात्सल्य का अनोखा मिश्रण था. मेरे पिताजी सबसे छोटे होने के कारण मेरी दादी के बहुत लाड़ले थे. मेरी दादी बड़ी दबंग महिला थीं. किसी की ताब नहीं थी कि उनकी बात से इनकार करे. मेरे ताऊजी नए हाईकोर्ट में जाया करते थे और जब वह हाई कोर्ट इलाहाबाद चला गया तो हमारे परिवार के लोग भी वहां जा बस गए. तब से इलाहाबाद ही हमारा घर बन गया और वहीं, बहुत साल बाद, मेरा जन्म हुआ. ताऊजी की वकालत धीरे-धीरे बढ़ती गई और इलाहाबाद के बड़े वकीलों में उनकी गिनती होने लगी.”


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