हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | विशेष रिपोर्ट
लेखक: अवतार सिंह बिष्ट, संवाददाता, रुद्रपुर
प्रकाशन तिथि: 10 अप्रैल 2025
ताकतवरों की सूची में धामी की छलांग, लेकिन जनता के सवाल अब भी कायम
सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं, स्वाभिमान मोर्चा ने भी उठाए सवाल
रुद्रपुर। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को हाल ही में एक प्रतिष्ठित पत्रिका की 100 सबसे ताकतवर भारतीयों की सूची में 32वां स्थान मिला है। पिछले साल वे इस सूची में 61वें स्थान पर थे। हालांकि, यह खबर राज्य सरकार के लिए भले ही गौरव की बात हो, लेकिन सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं तक, इसे लेकर आलोचनाओं का सिलसिला शुरू हो गया है।
स्वाभिमान मोर्चा का तीखा बयान:
उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा के प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्ता बॉबी पंवार ने इस रैंकिंग को एक “मजाक और जनधोखा” बताते हुए कहा:
“अगर शराब को सस्ती और शिक्षा को महंगी करने से ताकतवर बना जाता है, तो ये ताकत नहीं, जनविरोध है। मुख्यमंत्री धामी का नाम भ्रष्ट तंत्र के प्रतीक के रूप में देखा जाने लगा है। ऐसी रैंकिंग्स जनता की पीड़ा को मिटा नहीं सकती।”
उन्होंने आगे कहा कि सरकार की उपलब्धियों से ज्यादा जनता की नाराज़गी वास्तविक शक्ति का संकेत देती है।
सोशल मीडिया की गूंज:उत्तराखंड डीपीएल, उत्तराखंड एक्टिविस्ट्स फोरम, और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर लोगों ने तीखी प्रतिक्रियाएं दीं:
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“गरीबों की कमर तोड़ दी, शराब सस्ती कर दी, शिक्षा महंगी कर दी। अब बताओ ताकतवर कौन है?”
- “धामी को ताकतवर कहने से पहले जनता की ताकत को पहचानो।”
- “सरकारी प्रचार और मीडिया मैनेजमेंट से रैंकिंग पाई जाती है, जनसमर्थन से नहीं।”
जनता और सत्ता का टकराव:
उत्तराखंड में हाल ही में हुए आंदोलन—जैसे पेपर लीक घोटाला, खनन माफिया के खिलाफ प्रदर्शन, और लोकायुक्त की मांग—इस बात के संकेत हैं कि जनता लगातार जवाब मांग रही है, लेकिन सरकार की ओर से या तो चुप्पी है या फिर आत्मप्रचार।
सवाल जो उठ रहे हैं:
- क्या यह रैंकिंग सत्ता और पूंजी के मेल से बनी है?
- क्या मुख्यमंत्री का वास्तविक फीडबैक ज़मीनी कार्यकर्ताओं से लिया जा रहा है?
- क्यों सरकार जनसमस्याओं की बजाय प्रचार में व्यस्त है?
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को मिली “ताकतवर भारतीयों” में रैंकिंग सिर्फ एक आंकड़ा हो सकता है, लेकिन उत्तराखंड की जनता के लिए यह वह आइना बन गया है जिसमें वे अपनी तकलीफें देख रहे हैं। जब तक शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर ठोस काम नहीं होता, तब तक कोई भी रैंकिंग सत्ता की मजबूती नहीं बल्कि चुप्पी का प्रदर्शन मानी जाएगी।
2025सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री की ‘पावर रैंकिंग’ पर तीखी प्रतिक्रियाएं, उठे कई असहज सवाल
रुद्रपुर। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने देश के 100 सबसे ताकतवर भारतीयों की सूची में 32वां स्थान हासिल किया है। पिछले वर्ष वह इस सूची में 61वें स्थान पर थे। यह छलांग राज्य सरकार के लिए जहां उपलब्धि मानी जा रही है, वहीं आम जनता खासकर युवा और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इस खबर के चलते बहस छिड़ गई है, जिसमें धामी सरकार की नीतियों और कार्यशैली को लेकर कई सवाल उठाए गए हैं।
सोशल मीडिया रिएक्शन: क्या बोले यूज़र?
उत्तराखंड डीपीएल जैसे चर्चित पब्लिक प्लेटफॉर्म पर पोस्ट होते ही इस खबर पर सैकड़ों प्रतिक्रियाएं आईं, जिनमें से कई बेहद आलोचनात्मक थीं:
- “गरीबों की कमर तोड़ दी, शराब सस्ती कर दी, शिक्षा और राशन महंगे कर दिए, फिर भी ताकतवर?”
- “अवैध खनन के पैसे ने इस मुकाम तक पहुंचा दिया।”
- “अगर इंडियन एक्सप्रेस को पैसे दूं, तो मैं भी टॉप 50 में आ सकता हूं।”
- “ये तो घूसखोरों की लिस्ट में भी टॉप 10 में आएंगे।”
- “पांच मंत्रालय अपने पास रखे हैं, इसलिए ताकतवर हैं?”
इन टिप्पणियों से जनता की असंतोष झलकता है, खासकर राज्य में बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, शराब नीति और शिक्षा को लेकर।
पिछली मिसालें और वर्तमान सन्देह
कुछ यूज़र्स ने पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को याद करते हुए लिखा कि उन्हें भी वर्ष 2019-20 में सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री का अवार्ड मिला था। इससे यह सवाल उठता है कि क्या ऐसी रैंकिंग्स वास्तव में जनता के विश्वास को दर्शाती हैं, या फिर यह सिर्फ एक छवि निर्माण का हिस्सा हैं?
विश्लेषण: रैंकिंग बनाम ज़मीनी हकीकत
राजनीतिक रैंकिंग्स में स्थान मिलना एक प्रतीकात्मक मान्यता हो सकती है, लेकिन अगर उसी वक्त जनता गुस्से और व्यंग्य से भरपूर प्रतिक्रिया दे रही हो, तो यह एक बड़ा संदेश है। यह साफ करता है कि ताकत का अर्थ सिर्फ सत्ता या छवि नहीं, बल्कि जनसमर्थन और ईमानदार कार्यप्रणाली भी है।
मुख्य सवाल जो उभरे:
- क्या मीडिया रैंकिंग्स को जनता अब गंभीरता से लेती है?
- क्या राज्य में सरकार की नीतियां वास्तव में जनहित में हैं?
- क्या आलोचना को दबाने की बजाय समझा जा रहा है?
