उत्तराखंड की सड़कें इन दिनों शोर में डूबी हैं। सरकार ने ध्वनि प्रदूषण पर नकेल कसने के लिए डेसीबल मीटर खरीदे हैं, जुर्माना और जेल का प्रावधान भी कर दिया है। यह अच्छी पहल है, लेकिन असली खतरा ध्वनि प्रदूषण से कहीं बड़ा है—वह है वायु प्रदूषण, जो धीरे-धीरे देवभूमि की आबोहवा को जहर बना रहा है।
पहाड़ों में तीर्थाटन और पर्यटन के नाम पर बेतहाशा गाड़ियां दौड़ रही हैं। हर सीजन में लंबा जाम लगना अब आम बात हो गई है। इन गाड़ियों के धुएं से न सिर्फ हवा दूषित होती है, बल्कि हाल ही में पहाड़ों पर घनी धुंध की चादर छा गई थी, जैसे दिल्ली में स्मॉग होता है। यह संकेत है कि पहाड़ों की फिजा अब दिल्ली जैसे हालात की ओर बढ़ रही है। अगर समय रहते चेतावनी नहीं ली गई, तो शुद्ध हवा के लिए पहचाने जाने वाले उत्तराखंड की छवि को गहरा धक्का लग सकता है।
गाड़ियों की यह भीड़ न सिर्फ पर्यावरण बिगाड़ रही है, बल्कि सड़कों पर हादसों को भी न्योता दे रही है। कई बार देखा गया है कि 10 साल से ज्यादा पुरानी गाड़ियां, जिनकी मशीनें कमजोर हो चुकी हैं, पहाड़ी चढ़ाई में फेल हो जाती हैं या ब्रेक फेल होने से खाई में गिर जाती हैं। पहाड़ की सड़कें नई गाड़ियों के लिए भी चुनौतीपूर्ण होती हैं, फिर पुरानी और दम तोड़ती गाड़ियां यहां जानलेवा ही साबित होती हैं।
सरकार को चाहिए कि वह सिर्फ ध्वनि प्रदूषण पर नहीं, बल्कि वायु प्रदूषण और सड़क सुरक्षा पर भी सख्त कदम उठाए। क्यों न नीति बनाई जाए कि 10 साल से अधिक पुरानी गाड़ियां पहाड़ों पर चढ़ने ही न दी जाएं? इससे न केवल प्रदूषण घटेगा, बल्कि दुर्घटनाओं पर भी अंकुश लगेगा। साथ ही सरकार को हर तीर्थ और पर्यटन सीजन में गाड़ियों की संख्या सीमित करनी चाहिए ताकि नजारे देखने आए सैलानी जहरीली हवा और घंटों के जाम में न फंसे रहें।
इसके अलावा ट्रैफिक नियमों के पालन में कठोरता जरूरी है। हमारे यहां नियम बनाए तो जाते हैं, लेकिन उनका पालन करवाने की इच्छाशक्ति अक्सर नदारद होती है। बिना हेलमेट, बिना सीट बेल्ट, ओवरलोडिंग, ओवरस्पीडिंग और शराब पीकर गाड़ी चलाना—ये सब बेशक कानूनन जुर्म हैं, लेकिन धरातल पर हर जगह यही होता नजर आता है।
