उद्धव ठाकरे और आशीष नेगी का यह पुनर्मिलन दो नेताओं की मुलाकात , दूसरी पीढ़ी द्वारा पुराने संघर्षों और संबंधों को आगे बढ़ाने का प्रतीक बनकर उभरा। स्वर्गीय बालासाहेब ठाकरे और दिवाकर भट्ट के दौर की मित्रता और पहाड़ के हितों के समर्थन को नई पीढ़ी ने फिर से जीवित करने का संदेश दिया। यह मिलन उत्तराखंड की अस्मिता, सांस्कृतिक एकता और क्षेत्रीय जनआंदोलन को नई ऊर्जा देने वाला माना जा रहा
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
उत्तराखंड एक भौगोलिक प्रदेश , संघर्ष, संस्कृति, त्याग और आत्मसम्मान की जीवंत पहचान है। हिमालय की गोद में बसे इस राज्य की आत्मा उसके गांवों, लोकसंस्कृति, लोकभाषाओं, परंपराओं और उन लाखों पहाड़ी लोगों में बसती है जो रोज़गार, शिक्षा और बेहतर जीवन की तलाश में देश-दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जाकर बस गए, लेकिन अपने पहाड़ को कभी दिल से अलग नहीं कर पाए। यही कारण है कि जब भी उत्तराखंड की अस्मिता, उसके अधिकारों और उसके मूल मुद्दों की बात उठती है तो प्रवासी पहाड़ी समाज हमेशा अग्रिम पंक्ति में दिखाई देता है।
हाल ही में मुंबई में बसे प्रवासी पहाड़ी समाज द्वारा उत्तराखंड क्रांति दल को मजबूत करने का लिया गया संकल्प केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि यह पहाड़ की उस चेतना का प्रतीक है जो वर्षों से अपने अस्तित्व, पहचान और अधिकारों की लड़ाई लड़ रही है। यह बैठक कई मायनों में महत्वपूर्ण मानी जा सकती है, क्योंकि इसमें केवल राजनीति की चर्चा नहीं हुई, बल्कि पहाड़ के जल, जंगल, जमीन, रोजगार, पलायन और गैरसैंण जैसे मूल मुद्दों को केंद्र में रखकर एक व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक विमर्श सामने आया।
इस बैठक में युवाओं, मातृशक्ति और वरिष्ठ साथियों की एकजुट आवाज़ ने यह स्पष्ट कर दिया कि उत्तराखंड का संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है। राज्य बनने के 25 वर्ष बाद भी पहाड़ आज भी उन्हीं सवालों से जूझ रहा है जिनके समाधान के लिए आंदोलन हुआ था। गांव खाली हो रहे हैं, युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा, कृषि संकट में है, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं पहाड़ तक नहीं पहुंच पा रही हैं, और गैरसैंण जैसे भावनात्मक मुद्दे आज भी अधर में लटके हुए हैं।
ऐसे समय में क्षेत्रीय सोच और जनआंदोलन की ताकत को फिर से मजबूत करने की बात एक नई उम्मीद जगाती है। उत्तराखंड क्रांति दल लंबे समय से राज्य की क्षेत्रीय आकांक्षाओं की आवाज़ रहा है। भले ही राजनीतिक स्तर पर पार्टी को वह सफलता नहीं मिली जिसकी अपेक्षा थी, लेकिन यह भी सत्य है कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन की मूल भावना को सबसे अधिक यदि किसी दल ने जीवित रखा, तो वह उत्तराखंड क्रांति दल ही रहा।
मुंबई जैसे महानगर में बसे प्रवासी पहाड़ी समाज का इस तरह खुलकर समर्थन देना यह संकेत देता है कि पहाड़ की जनता अब केवल पारंपरिक राजनीति से संतुष्ट नहीं है। वह विकास के उन सवालों पर गंभीर चर्चा चाहती है जिनका सीधा संबंध पहाड़ के अस्तित्व से है। “जय पहाड़ – जय पहाड़ी” का नारा केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि यह सांस्कृतिक अस्मिता और सामाजिक एकजुटता का संदेश है।
इस पूरी बैठक का एक और महत्वपूर्ण पक्ष था उत्तराखंड क्रांति दल के अध्यक्ष आशीष नेगी की उद्धव ठाकरे से मुलाकात। इस मुलाकात ने राजनीतिक और भावनात्मक दोनों स्तरों पर कई पुरानी स्मृतियों को ताज़ा कर दिया। बैठक में मौजूद अरविंद सावंत और विनायक राउत सहित अन्य नेताओं की उपस्थिति ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि महाराष्ट्र और उत्तराखंड के बीच सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंधों की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रही है।
दरअसल, उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान स्वर्गीय बालासाहेब ठाकरे का समर्थन आज भी पहाड़ी समाज के लिए भावनात्मक महत्व रखता है। उस दौर में जब अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर आंदोलन अपने चरम पर था, तब देश के कई राजनीतिक दलों और नेताओं ने खुलकर समर्थन नहीं दिया था। लेकिन बालासाहेब ठाकरे ने पहाड़ की जनता की भावनाओं को समझा और उत्तराखंड राज्य निर्माण की मांग के प्रति सकारात्मक रुख अपनाया। यही कारण है कि आज भी पहाड़ी समाज के भीतर उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता का भाव दिखाई देता है।
जब बैठक में यह कहा गया कि उद्धव ठाकरे और आशीष नेगी का मिलन मानो बालासाहेब ठाकरे और स्वर्गीय दिवाकर भट्ट के मिलन जैसा प्रतीत होता है, तो यह केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं थी, बल्कि यह उस ऐतिहासिक रिश्ते की याद थी जिसने राज्य आंदोलन के दिनों में पहाड़ की आवाज़ को मजबूती दी थी।
उत्तराखंड आंदोलन की पूरी यात्रा को यदि देखा जाए तो यह केवल प्रशासनिक पुनर्गठन की मांग नहीं थी। यह उस उपेक्षा, बेरोजगारी, पलायन और विकासहीनता के खिलाफ संघर्ष था जिसे पहाड़ दशकों से झेल रहा था। राज्य बनने के बाद उम्मीद थी कि स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय लोगों का अधिकार मजबूत होगा, युवाओं को रोजगार मिलेगा, गांवों का विकास होगा और पहाड़ की संस्कृति को संरक्षण मिलेगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि आज भी बड़ी संख्या में गांव खाली हो रहे हैं।
पलायन आयोग की रिपोर्टें बार-बार यह संकेत देती रही हैं कि पहाड़ के दूरस्थ इलाकों से लोग लगातार मैदानों और महानगरों की ओर जा रहे हैं। गांवों में खेती छोड़ दी गई है, स्कूल बंद हो रहे हैं, स्वास्थ्य सेवाएं कमजोर हैं और युवाओं का विश्वास सरकारी व्यवस्थाओं से कम होता जा रहा है। ऐसे में प्रवासी पहाड़ी समाज का सक्रिय होना यह दिखाता है कि पहाड़ के प्रति जुड़ाव आज भी जीवित है।
मुंबई, दिल्ली, चंडीगढ़, बेंगलुरु और देश के अन्य हिस्सों में बसे उत्तराखंडी लोग आज आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत स्थिति में हैं। यदि यही समाज संगठित होकर पहाड़ के मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाता है तो निश्चित रूप से इससे उत्तराखंड की राजनीति और नीतियों पर प्रभाव पड़ेगा। यही कारण है कि प्रवासी समाज की भूमिका अब केवल सांस्कृतिक आयोजनों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि वह नीति और जनसरोकारों की बहस का हिस्सा बन रहा है।
इस बैठक में मातृशक्ति की भागीदारी भी विशेष महत्व रखती है। उत्तराखंड के इतिहास में महिलाओं ने हमेशा संघर्षों का नेतृत्व किया है। चाहे वह चिपको आंदोलन हो, शराब विरोधी आंदोलन हो या फिर राज्य आंदोलन — हर मोर्चे पर पहाड़ की महिलाओं ने अपनी निर्णायक भूमिका निभाई। आज भी जल, जंगल और जमीन की असली संरक्षक पहाड़ की महिलाएं ही हैं। इसलिए जब मातृशक्ति क्षेत्रीय सोच और जनआंदोलन को मजबूत करने की बात करती है, तो यह केवल राजनीतिक समर्थन नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का संकेत होता है।
युवाओं की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। वर्तमान समय में उत्तराखंड का सबसे बड़ा संकट युवाओं का पलायन और बेरोजगारी है। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी युवाओं को अपने राज्य में पर्याप्त अवसर नहीं मिलते। परिणामस्वरूप उन्हें महानगरों की ओर जाना पड़ता है। यदि क्षेत्रीय दल और सामाजिक संगठन युवाओं को मंच देते हैं, उनके सवालों को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाते हैं, तो इससे नई राजनीतिक चेतना पैदा हो सकती है।
गैरसैंण का मुद्दा भी इस बैठक में प्रमुखता से उठा। गैरसैंण केवल राजधानी का प्रश्न नहीं, बल्कि पहाड़ की भावनाओं और संतुलित विकास का प्रतीक है। राज्य आंदोलन के दौरान गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग इसलिए उठी थी ताकि पहाड़ के दूरस्थ क्षेत्रों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके। लेकिन आज भी यह मुद्दा राजनीतिक घोषणाओं और प्रतीकों तक सीमित दिखाई देता है।
उत्तराखंड के संसाधनों पर बाहरी नियंत्रण और स्थानीय लोगों की घटती भागीदारी भी चिंता का विषय है। जल, जंगल और जमीन को लेकर लगातार बहस होती रही है। पहाड़ की नदियां पूरे देश को पानी और बिजली देती हैं, लेकिन उन्हीं क्षेत्रों के लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करते हैं। पर्यटन और विकास परियोजनाओं के नाम पर स्थानीय हितों की अनदेखी होने के आरोप भी समय-समय पर लगते रहे हैं। ऐसे में क्षेत्रीय राजनीति की प्रासंगिकता स्वतः बढ़ जाती है।
हालांकि, यह भी सच है कि केवल भावनात्मक नारों से बदलाव नहीं आएगा। क्षेत्रीय दलों और सामाजिक संगठनों को व्यवहारिक और दूरदर्शी राजनीति करनी होगी। उन्हें युवाओं, महिलाओं, किसानों और प्रवासी समाज को जोड़कर विकास का स्पष्ट रोडमैप देना होगा। केवल बड़े दलों की आलोचना करने से काम नहीं चलेगा; जनता अब ठोस नीतियां और परिणाम चाहती है।
प्रवासी पहाड़ी समाज का यह संकल्प इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह राजनीति को सांस्कृतिक चेतना से जोड़ता है। उत्तराखंड की संस्कृति केवल लोकगीतों और मेलों तक सीमित नहीं है। यह सामूहिकता, सहयोग, संघर्ष और प्रकृति के साथ संतुलन की संस्कृति है। यदि यही भावना राजनीति में दिखाई दे तो उत्तराखंड की दिशा बदल सकती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि उत्तराखंड की राजनीति केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित न रहे, बल्कि राज्य निर्माण के मूल उद्देश्यों की ओर लौटे। विकास का मॉडल ऐसा हो जिसमें गांव बचें, स्थानीय रोजगार बढ़े, पारंपरिक कृषि और लोककला को संरक्षण मिले, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत हों और पहाड़ के युवाओं को अपने ही राज्य में भविष्य दिखाई दे।
मुंबई में हुई यह बैठक एक संदेश देती है कि उत्तराखंड की चेतना सीमाओं में बंधी नहीं है। जो लोग रोज़गार और जीवन की तलाश में पहाड़ से दूर चले गए, वे आज भी अपने गांव, अपनी मिट्टी और अपनी संस्कृति से जुड़े हुए हैं। यही जुड़ाव भविष्य में एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन का आधार बन सकता है।
“जय पहाड़ – जय पहाड़ी” का नारा तभी सार्थक होगा जब यह केवल मंचों तक सीमित न रहकर नीति, विकास और जनभागीदारी में दिखाई दे। उत्तराखंड को केवल चुनावी राजनीति नहीं, बल्कि वैचारिक और सामाजिक पुनर्जागरण की आवश्यकता है। यदि प्रवासी समाज, युवाशक्ति, मातृशक्ति और क्षेत्रीय चेतना मिलकर आगे बढ़ती है तो वह दिन दूर नहीं जब उत्तराखंड वास्तव में उन सपनों का राज्य बनेगा जिनके लिए हजारों लोगों ने संघर्ष किया था।
स्वर्गीय बालासाहेब ठाकरे और दिवाकर भट्ट जैसे नेताओं की स्मृतियां केवल इतिहास यह याद दिलाती हैं कि बड़े परिवर्तन जनभावनाओं और संघर्षों से पैदा होते हैं। आज फिर उत्तराखंड एक नए मोड़ पर खड़ा है। प्रश्न यही है कि क्या राज्य अपनी मूल आत्मा और जनआंदोलन की भावना को फिर से पहचान पाएगा, या फिर विकास और राजनीति के शोर में पहाड़ की असली आवाज़ कहीं खो जाएगी।
मुंबई की इस बैठक ने कम से कम इतना तो साबित कर दिया है कि पहाड़ की वह आवाज़ अभी जीवित है, और उसे सुनने वाले लोग आज भी बड़ी संख्या में मौजूद हैं।
