2025नंदा देवी राजजात यात्रा :नंदा देवी का महत्व, कोठी गांव और पिंडर घाटी मैं मोहिनी बिष्ट की धार्मिक यात्रा

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पिंडर घाटी,चमोली, लिंगंडी से कोठी गांव आस्था का अनमोल पर्व?उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है, क्योंकि यहाँ की धरती का हर कण देवी-देवताओं की उपस्थिति और लोकमान्यताओं से ओतप्रोत है। यहां की नदियाँ, बुग्याल, घाटियाँ और ऊँचे-ऊँचे हिमालयी शिखर केवल भौगोलिक संरचनाएँ नहीं हैं, बल्कि वे आस्था और श्रद्धा के प्रतीक हैं। इन्हीं आस्थाओं में सबसे बड़ी और प्राचीन परंपरा है – नंदा देवी राजजात यात्रा

कोठी गांव में पूजा अर्चना करते हुए मोहनी बिष्ट

नंदा देवी केवल एक देवी नहीं हैं, बल्कि उत्तराखंड की सामूहिक चेतना और लोकसंस्कृति का केंद्र हैं। उन्हें उत्तराखंड की कुलदेवी कहा जाता है। गढ़वाल और कुमाऊँ, दोनों अंचलों की यह आराध्या देवी हैं। लोकविश्वास है कि नंदा देवी स्वयं हिमालय की पुत्री हैं और भगवान शंकर की अर्धांगिनी पार्वती का ही एक रूप हैं। स्कंद पुराण और अन्य ग्रंथों में भी नंदा देवी का उल्लेख शक्ति और हिमालय की रक्षक के रूप में मिलता है।


शैल ग्लोबल टाइम्स ,मुख्य संपादक मोहिनी बिष्ट पूजा अर्चना


यह यात्रा केवल धार्मिक दृष्टिकोण से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परंपराओं का भी जीता-जागता प्रमाण है। इस यात्रा में देवी की विदाई बेटी की विदाई की तरह होती है। गाँव-गाँव में लोग बेटी-बहन के भाव से नंदा देवी की डोली का स्वागत और विदाई करते हैं। यही कारण है कि इसे “उत्तराखंड का महाकुंभ” कहा जाता है।


नौटी गांव : नंदा देवी का मायका

चमोली जिले का नौटी गांव नंदा देवी यात्रा का केंद्र है। इसे मां नंदा का मायका माना जाता है। यही वह स्थान है जहाँ से 12 साल में एक बार होने वाली भव्य नंदा राजजात यात्रा की शुरुआत होती है।

नौटी गांव में सिद्धपीठ नंदा देवी मंदिर स्थित है। लोकमान्यता है कि यहीं से नंदा देवी अपने ससुराल (हिमालय) की ओर विदा होती हैं। इस विदाई में हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं। यह यात्रा न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक उत्सव का भी प्रतीक है।

नौटी गांव से शुरू होकर यह यात्रा जंगलों, पहाड़ों, नदियों और ऊँचे हिमालयी दर्रों को पार करती है। यात्रा के मार्ग में बुग्याल (हिमालयी घास के मैदान), रहस्यमयी झीलें और तीर्थस्थल आते हैं। अंततः यह यात्रा होमकुंड पहुंचकर संपन्न होती है।


मोहिनी बिष्ट की श्रद्धा : कोठी गांव में पूजा-अर्चना

इस बार की छोटी नंदा राजराजेश्वरी यात्रा में एक विशेष क्षण तब आया जब रुद्रपुर निवासी मोहिनी बिष्ट ने अपनी श्रद्धा और भक्ति का परिचय देते हुए कोठी गांव में मां नंदा राजराजेश्वरी की पूजा-अर्चना की।

मोहिनी बिष्ट का मायका पिंडर घाटी,ग्राम लिंगड़ी, पोस्टऑफिस बोरा गाढ़, तहसील देवाल, (जिलाचमोली) है। वे रुद्रपुर से टैक्सी द्वारा देवल बाजार पहुंचीं। वहां से लगभग 3 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर उन्होंने कोठी गांव तक का सफर तय किया।

कोठी गांव पहुँचकर मोहिनी बिष्ट ने मां नंदा राजराजेश्वरी के साक्षात स्वरूप की पूजा-अर्चना की और आशीर्वाद प्राप्त किया। यह क्षण उनके लिए आध्यात्मिक और भावनात्मक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण था।

ध्यान देने योग्य बात है कि रुद्रपुर से चमोली का यह सफर लगभग 330 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद संभव हो पाता है। लेकिन श्रद्धा के आगे दूरी और कठिनाइयाँ कोई मायने नहीं रखतीं। यही भावना इस यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता है।


यात्रा की विशेषता : बेटी की विदाई जैसा भाव

नंदा राजजात यात्रा की सबसे अनूठी विशेषता है इसमें निहित भावनात्मक गहराई। जब डोली किसी गांव से विदा होती है, तो उसे बेटी की विदाई की तरह विदा किया जाता है। ग्रामीण महिलाएँ रोती हैं, गाती हैं और देवी से पुनः लौटने की प्रार्थना करती हैं।

यह दृश्य इतना भावुक होता है कि उसमें भाग लेने वाला हर व्यक्ति अपने घर की बेटी-बहन के विवाह जैसी अनुभूति करता है। यही कारण है कि नंदा देवी यात्रा को केवल धार्मिक या सांस्कृतिक उत्सव कहना पर्याप्त नहीं होगा – यह समाज की आत्मा से जुड़ा महापर्व है।


ऐतिहासिक पृष्ठभूमि : राजवंशों की भूमिका

नंदा राजजात यात्रा का इतिहास बेहद समृद्ध है। कत्यूरी और चंद राजवंशों ने इस यात्रा को संगठित और संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय यह यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं थी, बल्कि राजाओं और स्थानीय समुदायों के बीच एकता का प्रतीक भी थी।

यात्रा के माध्यम से न केवल आस्था को बल मिला, बल्कि यह पर्व सामाजिक समरसता और राजनीतिक शक्ति का भी प्रतीक बना। हर 12 साल में जब यह भव्य यात्रा आयोजित होती है, तो पूरे उत्तराखंड के गांवों, कस्बों और शहरों में रौनक छा जाती है।


स्कंद पुराण और नंदा देवी

स्कंद पुराण और कई प्राचीन ग्रंथों में नंदा देवी का उल्लेख शक्ति, सौंदर्य और हिमालय की रक्षक देवी के रूप में मिलता है। लोककथा यह कहती है कि नंदा देवी अपने ससुराल हिमालय की ओर प्रस्थान करती हैं और यह यात्रा उसी का प्रतीक है।

सबसे रोचक पहलू है चौसिंग्या खाडू (चार सींग वाला मेढ़ा), जो हर 12 साल में पैदा होता है और यात्रा की अगुवाई करता है। होमकुंड पहुँचकर इस मेढ़े को मुक्त कर दिया जाता है। यह लोकविश्वास है कि देवी का वाहन बनकर यह मेढ़ा मां की यात्रा को पूर्ण करता है।


2025प्रत्येक वर्ष छोटी राजजात यात्रा का आयोजन किया जाता है, “नंदा राजजात” इसमें श्रद्धालु अपने-अपने गांवों से निकलकर मां नंदा के डोले, छंतोली और ध्वज के साथ निर्धारित स्थलों तक जाते हैं। यह यात्रा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और लोकसंस्कृति का जीवंत उत्सव भी है।

छोटी राजजात का स्वरूप भले ही सीमित होता है, पर इसमें लोगों की आस्था और उमंग उतनी ही गहरी रहती है जितनी बारहवें वर्ष में होने वाली बड़ी नंदा राजजात में दिखाई देती है।

मोहिनी बिष्ट की भक्ति और संदेश

मोहिनी बिष्ट द्वारा कोठी गांव में की गई पूजा-अर्चना इस बात का प्रतीक है कि चाहे इंसान कहीं भी रहे, उसकी जड़ें, उसकी आस्था और उसका विश्वास हमेशा अपनी मातृभूमि और देवी से जुड़े रहते हैं।

रुद्रपुर से लंबी दूरी तय कर कोठी गांव में मां नंदा राजराजेश्वरी का आशीर्वाद लेना, उत्तराखंड की संस्कृति की उस गहरी जड़ों को दर्शाता है, जो प्रवास में रह रहे लोगों को भी अपनी परंपरा से जोड़कर रखती हैं।




यात्रा का विराट स्वरूप : कठिनाई में भक्ति की चमक

नंदा राजजात यात्रा का मार्ग केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं है, बल्कि यह मानव धैर्य, साहस और श्रद्धा का अद्भुत संगम है। यह यात्रा लगभग 280 किलोमीटर की पैदल यात्रा है, जो चमोली जिले के नौटी गांव से शुरू होकर होमकुंड में समाप्त होती है।

इस यात्रा को पूरा करने में लगभग 19 से 20 दिन लगते हैं। मार्ग में घने जंगल, बर्फ से ढके दर्रे, ऊँचे-ऊँचे पर्वत शिखर, बुग्याल और पवित्र झीलें आती हैं। हर मोड़ पर प्रकृति का नया रूप दिखाई देता है।


प्रमुख पड़ाव और उनका महत्व

1. नौटी गांव

यात्रा का प्रारंभिक बिंदु। इसे नंदा देवी का मायका माना जाता है। नौटी से ही डोली उठती है और आस्था का महासागर उमड़ पड़ता है।

2. कुरुड़ गांव

पहला बड़ा पड़ाव, जहाँ ग्रामीण देवी का स्वागत करते हैं। यहां देवी को बेटी की तरह विदा किया जाता है।

3. कोठी गांव

इस गांव का विशेष महत्व है। यहाँ पूजा-अर्चना होती है और श्रद्धालु देवी का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस बार मोहिनी बिष्ट ने यहीं पर पूजा-अर्चना की।

4. बेदनी बुग्याल

हिमालयी घास का यह मैदान दुनिया के सबसे सुंदर बुग्यालों में गिना जाता है। यात्रा के दौरान यहाँ लोकनृत्य और भजन संध्या होती है। यह स्थल आस्था और प्राकृतिक सुंदरता दोनों का संगम है।

5. रूपकुंड झील

इसे “कंकाल झील” भी कहते हैं। यहां प्राचीन मानव अस्थियाँ मिली हैं, जिनका वैज्ञानिकों ने भी अध्ययन किया है। धार्मिक दृष्टि से इसे रहस्यमयी और पवित्र स्थान माना जाता है।

6. होमकुंड

यात्रा का अंतिम पड़ाव। यहाँ विशेष अनुष्ठान के बाद चौसिंग्या खाडू (चार सींग वाला मेढ़ा) को मुक्त किया जाता है। माना जाता है कि देवी का वाहन यहीं से अदृश्य हो जाता है।

अन्य पड़ाव

  • कंसुआ
  • वाण
  • गैरोलीपातल
  • शिला समुद्र
  • चंदनियाघाट
  • सुतोल

हर जगह की अपनी पौराणिक और सांस्कृतिक कहानी है। इन पड़ावों में ग्रामीण अपनी परंपरागत वेशभूषा में स्वागत करते हैं, लोकगीत गाते हैं और देवी की डोली के सामने नृत्य प्रस्तुत करते हैं।


बेटी की विदाई जैसा भाव

यात्रा का सबसे भावुक पक्ष है – बेटी की विदाई। जब डोली गांव से विदा होती है, तो महिलाएँ गीत गाती हैं –

  • “नंदा जा रही है अपने ससुराल…”
  • “बेटी की तरह विदा करो…”

लोगों की आँखों से आँसू बहते हैं। यह दृश्य एक साथ धार्मिक और सामाजिक दोनों ही दृष्टि से अनमोल है।


लोक संस्कृति और आस्था का संगम

नंदा देवी यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह लोक संस्कृति का महोत्सव भी है।

  • लोकनृत्य – पांडव नृत्य, झोड़ा, चांचरी।
  • भजन-कीर्तन – ढोल-दमाऊं और रंण-घंण की थाप पर देवी के भजन।
  • पारंपरिक वेशभूषा – महिलाएँ घाघरा-चोली और पुरुष पगड़ी, चूड़ीदार में।
  • लोकगीत – विदाई गीत, स्वागत गीत और देवी की स्तुति।

यह यात्रा ग्रामीणों के लिए अपनी सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने का भी अवसर है।


प्राकृतिक सौंदर्य और हिमालयी रहस्य

यात्रा का मार्ग प्रकृति की अद्भुत छटा से भरा हुआ है।

  • बुग्याल – घास के विस्तृत मैदान, जिनमें हरे कालीन जैसे दृश्य।
  • झीलें – रूपकुंड जैसी रहस्यमयी झीलें।
  • दर्रे – कठिन पहाड़ी दर्रे, जिन पर चलना आस्था और साहस दोनों की परीक्षा है।
  • हिमालयी वनस्पति – बुरांश के फूल, औषधीय जड़ी-बूटियाँ।
  • जीव-जंतु – हिमालयी भेड़, पक्षी, और कभी-कभी हिम तेंदुआ के निशान।

प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक भावना का यह संगम इस यात्रा को विश्व की सबसे अद्वितीय तीर्थयात्राओं में शामिल करता है।


चौसिंग्या खाडू : रहस्य और आस्था

यात्रा का अगुवा होता है – चौसिंग्या खाडू। यह चार सींग वाला मेढ़ा हर 12 साल में जन्म लेता है और देवी की डोली के साथ चलता है।

लोकमान्यता है कि यही नंदा देवी का वाहन है। होमकुंड पहुँचकर इस मेढ़े को मुक्त कर दिया जाता है। लोग इसे देवी के अदृश्य रूप का प्रतीक मानते हैं।


सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व

यह यात्रा समाज में एकता, भाईचारा और सामूहिकता की अनोखी मिसाल पेश करती है। गढ़वाल और कुमाऊँ के लोग मिलकर इस यात्रा में भाग लेते हैं। जाति, धर्म और वर्ग के भेद मिट जाते हैं।

राजवंशों के समय में यह यात्रा सत्ता और समाज को जोड़ने का माध्यम थी। आज यह लोकसंस्कृति और आध्यात्मिक चेतना को जीवित रखने का साधन है।


हिन्दुस्तान ग्लोबल टाइम्स;हिमालय की गोद में आस्था का महापर्व

नंदा राजजात यात्रा उत्तराखंड की आध्यात्मिक आत्मा है। यह यात्रा बताती है कि पर्वतों की कठिनाई, लंबा पैदल सफर और ठंडी हवाएँ भी तब छोटी पड़ जाती हैं, जब इंसान की आस्था मजबूत होती है।

हर गांव में बेटी की विदाई, हर पड़ाव पर लोकनृत्य और हर मोड़ पर हिमालय की छटा – यही इस यात्रा की पहचान है।

मोहिनी बिष्ट जैसी श्रद्धालु जब रुद्रपुर से सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय कर नंदा देवी की पूजा करने पहुंचती हैं, तो यह संदेश और भी गहरा हो जाता है कि भक्ति सीमाओं से परे होती है, और आस्था ही मनुष्य को उसकी जड़ों से जोड़ती है।




नंदा देवी की पौराणिक कथा : हिमालय की पुत्री?हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स

उत्तराखंड की सामूहिक चेतना में नंदा देवी केवल शक्ति का स्वरूप नहीं, बल्कि बेटी का भाव भी है। लोककथाओं और पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, नंदा देवी हिमालय की पुत्री और भगवान शंकर की पत्नी पार्वती का ही रूप हैं।

कहा जाता है कि जब नंदा देवी का विवाह भगवान शिव से हुआ, तो वह अपने मायके से विदा होकर कैलाश की ओर गईं। विदाई का यह भाव इतना गहरा था कि उसे स्मरण करने और जीवित रखने के लिए यह यात्रा आयोजित की जाती है।

हर 12 साल में होने वाली राजजात यात्रा उसी विदाई की स्मृति है। लोग मानते हैं कि जब वे डोली के साथ चलते हैं तो वे नंदा देवी को उनके मायके से ससुराल तक विदा करने में सहभागी बनते हैं।


स्कंद पुराण और शास्त्रीय उल्लेख? हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स

स्कंद पुराण और कई प्राचीन ग्रंथों में नंदा देवी का उल्लेख शक्ति और हिमालय की रक्षक देवी के रूप में किया गया है।

  • स्कंद पुराण के अनुसार, नंदा देवी हिमालय क्षेत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं।
  • वे केवल पर्वतों की रक्षा ही नहीं करतीं, बल्कि हिमालयी समाज की समृद्धि और रक्षा की भी प्रतीक हैं।
  • पुराणों में उल्लेख है कि “नंदा बिना हिमालय अधूरा है।”

कहा जाता है कि नंदा देवी की कृपा से ही यहाँ के लोग खेती, पशुपालन और प्राकृतिक संसाधनों का आनंद उठाते हैं।


राजवंशीय इतिहास : कत्यूरी और चंद राजाओं की भूमिका, हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स

नंदा राजजात यात्रा का इतिहास केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक भी है।

कत्यूरी राजवंश

  • कत्यूरी राजाओं ने नंदा देवी को अपनी कुलदेवी माना।
  • उन्होंने यात्रा को संगठित किया और इसे जनमानस तक पहुँचाया।
  • उनके संरक्षण में यात्रा का स्वरूप और भी भव्य हुआ।

चंद राजवंश

  • कुमाऊँ के चंद राजाओं ने भी नंदा देवी को अपनी कुलदेवी माना।
  • यात्रा में उनकी सक्रिय भूमिका रही।
  • इससे कुमाऊँ और गढ़वाल की सांस्कृतिक कड़ी और मजबूत हुई।

इन राजवंशों की वजह से यह यात्रा केवल धार्मिक आयोजन न रहकर समाज और सत्ता की एकता का प्रतीक बन गई।


चौसिंग्या खाडू : देवी का वाहन? शैल ग्लोबल टाइम्स,मुख्य संपादक मोहिनी बिष्ट

राजवंशीय समय से ही इस यात्रा की अगुवाई चौसिंग्या खाडू (चार सींग वाला मेढ़ा) करता है। इसे देवी का वाहन माना जाता है।

  • यह दुर्लभ मेढ़ा हर 12 साल में जन्म लेता है।
  • यात्रा के दौरान यह आगे-आगे चलता है।
  • अंत में होमकुंड पहुँचकर इसे मुक्त कर दिया जाता है।

यह परंपरा बताती है कि किस तरह लोकविश्वास और पौराणिक धारणाएँ मिलकर इस यात्रा को और भी रहस्यमयी और शक्तिशाली बनाती हैं।


आधुनिक उत्तराखंड और नंदा देवी यात्रा, शैल ग्लोबल टाइम्स प्रिंट न्यूज़

जहां मोहनी बिष्ट खड़ी हैं, सामने का दृश्य अद्भुत है—ऊँचे-ऊँचे देवदार और बुरांश के वृक्षों के बीच बहती पिंडर नदी का शोर, जैसे प्रकृति का शाश्वत संगीत हो। दूर बर्फ से ढकी चोटियाँ इस नदी की गोद में झांकती प्रतीत होती हैं, मानो स्वयं माता पार्वती का आशीर्वाद इस जलधारा में प्रवाहित हो रहा हो। यही कारण है कि पिंडर नदी केवल एक धारा नहीं, बल्कि आस्था और संस्कृति की जीवित प्रतीक मानी जाती है।

आज जब दुनिया आधुनिकता की ओर तेजी से बढ़ रही है, तब भी नंदा राजजात यात्रा अपनी परंपरा और महत्व को बनाए हुए है।

धार्मिक महत्व

  • लोग इसे देवी नंदा की कृपा पाने का अवसर मानते हैं।
  • यात्रा में शामिल होना पुण्य और जीवन का सौभाग्य माना जाता है।

सांस्कृतिक महत्व

  • लोकनृत्य, गीत, वाद्य और भजन इस यात्रा को लोक संस्कृति का उत्सव बना देते हैं।
  • ग्रामीण महिलाएँ और पुरुष पारंपरिक वेशभूषा में यात्रा में शामिल होते हैं।

सामाजिक महत्व

  • यह यात्रा समाज में एकता का प्रतीक है।
  • गढ़वाल और कुमाऊँ के लोग एक साथ आते हैं, जाति-धर्म के भेद मिट जाते हैं।

पर्यटन और विश्व पहचान

  • इस यात्रा ने उत्तराखंड को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई है।
  • दुनिया भर से शोधकर्ता और यात्री इस यात्रा में रुचि लेते हैं।

भावनात्मक पक्ष : बेटी की विदाई

इस यात्रा को समझने का सबसे भावुक पहलू है बेटी की विदाई का भाव

हर गांव में जब डोली विदा होती है, तो महिलाएँ रोती हैं, गीत गाती हैं और देवी से पुनः लौटने की प्रार्थना करती हैं। यह भाव इतना गहरा होता है कि उसमें शामिल हर व्यक्ति अपने घर की बेटी की विदाई को अनुभव करता है।


मोहिनी बिष्ट की यात्रा : आस्था की जीवंत मिसाल

इस बार की यात्रा में रुद्रपुर निवासी मोहिनी बिष्ट का कोठी गांव में पूजा-अर्चना करना एक विशेष अध्याय है।

  • रुद्रपुर से 330 किलोमीटर की दूरी तय करना।
  • पैदल यात्रा कर कोठी गांव पहुँचना।
  • मां नंदा राजराजेश्वरी की पूजा-अर्चना करना।

यह बताता है कि आज भी आधुनिक समाज में आस्था कितनी गहरी है। प्रवास में रहने वाले लोग भी अपनी जड़ों से कटे नहीं हैं।


वैश्विक परिप्रेक्ष्य : संस्कृति का संरक्षण

आज जब वैश्वीकरण और आधुनिक जीवनशैली पारंपरिक संस्कृति को पीछे छोड़ रही है, नंदा राजजात यात्रा हमें अपनी पहचान याद दिलाती है।

  • यह बताती है कि हमारी परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान की शक्ति भी है।
  • इस यात्रा के माध्यम से उत्तराखंड अपनी सांस्कृतिक धरोहर को दुनिया के सामने प्रस्तुत करता है।
  • यह आयोजन पर्यटन, लोकसंस्कृति और अध्यात्म – तीनों को जोड़ता है।

नंदा देवी की यात्रा – आस्था और एकता का महापर्व

नंदा राजजात यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यह उत्तराखंड की आत्मा का उत्सव है।

  • यह यात्रा आस्था, संस्कृति और समाज को जोड़ती है।
  • इसमें बेटी की विदाई, लोकनृत्य, भजन और हिमालय की गोद में आध्यात्मिक अनुभव सब एक साथ मिलते हैं।
  • मोहिनी बिष्ट जैसी श्रद्धालु इस बात की जीवंत मिसाल हैं कि भक्ति सीमाओं और दूरियों से परे होती है।

नंदा देवी केवल उत्तराखंड की कुलदेवी नहीं, बल्कि वह हर उस इंसान की शक्ति और प्रेरणा हैं जो कठिनाइयों के बीच भी विश्वास बनाए रखता है।

इस यात्रा का संदेश यही है –
आस्था हमें जोड़ती है, संस्कृति हमें पहचान देती है, और देवी नंदा हमें जीवन का साहस देती हैं।”






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