सांप्रदायिक:इगास की पूर्व संध्या पर जुबिन नौटियाल की स्वर-वर्षा: संस्कृति, श्रद्धा और विकास का अनूठा संगम”

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संपादकीय लेख
“इगास की पूर्व संध्या पर जुबिन नौटियाल की स्वर-वर्षा: संस्कृति, श्रद्धा और विकास का अनूठा संगम”

उत्तराखंड की लोकसंस्कृति का प्रतीक पर्व इगास-बग्वाल इस बार एक नए उल्लास, नई ऊंचाई और अद्भुत सांस्कृतिक गौरव के साथ मनाया गया। देवभूमि के सुकुमार स्वरों के धनी, विश्वप्रसिद्ध गायक श्री जुबिन नौटियाल ने इगास की पूर्व संध्या को अपनी मधुर आवाज़ से ऐसा सजाया कि पूरा उत्तराखंड श्रद्धा, भक्ति और उत्साह की सुगंध से सराबोर हो उठा।

इस बार का इगास उत्सव केवल एक धार्मिक पर्व नहीं रहा, बल्कि यह उत्तराखंडी अस्मिता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का उत्सव बन गया। जुबिन नौटियाल ने अपने गीतों के माध्यम से न केवल देवभूमि की लोकसंस्कृति का गौरव बढ़ाया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि आधुनिकता के बीच भी हमारी जड़ें लोकगीत, लोकधुन और पारंपरिक आस्था से जुड़ी रहनी चाहिए।

कार्यक्रम में जब उनके सुरों की गूंज “जय बद्रीविशाल” और “घुघूती बासूती” के भावों से गूंजी, तो दर्शकों की आंखें श्रद्धा से नम हो गईं। यह क्षण केवल संगीत का नहीं, बल्कि भावनाओं का संगम था—जहां धर्म, संस्कृति और विकास एक ही सुर में बंधे प्रतीत हुए।

इगास पर्व की महिमा इस बार इसलिए भी विशेष रही क्योंकि इसका आयोजन सांस्कृतिक विकास और सामाजिक एकता के प्रतीक के रूप में हुआ। आयोजन स्थल को सजाने से लेकर वीडियो रिकॉर्डिंग और प्रसारण तक, हर स्तर पर स्थानीय युवाओं और कलाकारों की सहभागिता रही। यह इस बात का प्रमाण है कि उत्तराखंड का युवा अब केवल पर्व मनाने में नहीं, बल्कि अपनी परंपराओं को डिजिटल युग में आगे बढ़ाने में भी अग्रणी भूमिका निभा रहा है।

जुबिन नौटियाल ने अपने उद्बोधन में सभी को विकास और सांस्कृतिक गौरव की बधाई दी और कहा कि इगास जैसे लोकपर्व ही हमें अपनी पहचान का बोध कराते हैं। उनका यह संदेश आज के युवाओं के लिए प्रेरणा है कि आधुनिक जीवन की भागदौड़ के बीच भी अपनी मातृभूमि और लोकसंस्कृति से जुड़ाव कभी नहीं टूटना चाहिए।

इस अवसर पर जारी किया गया वीडियो क्लिप न केवल जुबिन के प्रशंसकों के लिए उपहार है, बल्कि यह उत्तराखंड की संस्कृति की एक जीवंत झलक भी प्रस्तुत करता है। सोशल मीडिया पर इस वीडियो का प्रसारण निश्चित रूप से इगास पर्व की लोकप्रियता को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाएगा।

इगास उत्सव के शुभ अवसर पर मेरी धर्मपत्नी, माधव सिंह भंडारी जी की वंशज श्रीमती मोहिनी भंडारी बिष्ट ने पारंपरिक दीप प्रज्वलित किए। उनके द्वारा जलाया गया यह दीप न केवल इगास पर्व की आध्यात्मिक ज्योति का प्रतीक बना, बल्कि विकास, संस्कृति और आस्था के संगम का संदेश भी लेकर आया। मोहिनी भंडारी बिष्ट ने कहा कि देवभूमि की यह पावन परंपरा हमारी पहचान है, और जब महिलाएँ संस्कृति के दीप को जलाती हैं, तो पूरा समाज आलोकित होता है। यह क्षण इगास उत्सव की आत्मा बन गया।

श्रीमती मोहनी भंडारी बिष्ट
mohani Bhandari bisht

विकास की बधाई:
इस सुंदर आयोजन के पीछे जिन हाथों ने अथक परिश्रम किया—चाहे वे आयोजक हों, स्थानीय प्रशासन, सांस्कृतिक समितियां या युवा स्वयंसेवी—सभी विकास के वाहक हैं। उत्तराखंड में इस प्रकार के सांस्कृतिक आयोजन न केवल सामाजिक सौहार्द को मजबूत करते हैं, बल्कि पर्यटन और रोजगार की दिशा में भी नए अवसर खोलते हैं।

अंततः, यह कहा जा सकता है कि इस बार का इगास उत्सव केवल दीपों और गीतों का नहीं, बल्कि आत्मगौरव, एकता और विकास का उत्सव बन गया।
जुबिन नौटियाल के स्वर ने इस पर्व को अमर बना दिया है, और हर उत्तराखंडी के हृदय में यह संदेश अंकित कर दिया है कि—
“हम अपनी मिट्टी से जुड़े रहेंगे, तो विकास अपने आप स्वर में ढल जाएगा।”

– अवतार सिंह बिष्ट
(संपादकीय लेख,  हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स) रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


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