संपादकीय“अपनी बोली, अपनी मिट्टी — कुमाऊनी सम्मेलन का समापन बने सांस्कृतिक एकता का संदेश”

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रुद्रपुर। कुमाऊनी भाषा, संस्कृति और पहचान को समर्पित तीन दिवसीय सम्मेलन का आज अंतिम दिन है — एक ऐसा दिन जो केवल समापन नहीं बल्कि हमारी सामूहिक चेतना का पुनर्जागरण है। पहले दो दिनों में जहां कुमाऊनी साहित्यकारों, शिक्षाविदों और सांस्कृतिक दिग्गजों ने अपनी-अपनी राय रखकर भाषा के संरक्षण पर नई दिशाएं दिखाईं, वहीं आज तीसरे दिन इस सम्मेलन में पूरे कुमाऊँ से आए प्रतिभागियों का जमावड़ा इतिहास रचने जा रहा है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

यह सम्मेलन अपने तय समय पर शुरू होगा, और इसमें विशेष रूप से चंदोला होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज व वसुंधरा नर्सिंग होम के द्वारा पर्यावरण संरक्षण पर दिया जा रहा संदेश इस आयोजन को और भी अर्थपूर्ण बना रहा है। प्रकृति और संस्कृति — दोनों का संरक्षण ही हमारी असली पहचान है। कुमाऊनी भाषा की जड़ें भी इन्हीं पहाड़ों की मिट्टी से जुड़ी हैं, और जब हम पर्यावरण की रक्षा करते हैं तो अपनी संस्कृति को भी जीवित रखते हैं।

सम्मेलन के तीसरे दिन का यह समापन केवल मंचीय कार्यक्रम नहीं बल्कि एक आह्वान है — अपनी भाषा बोलने, अपनी संस्कृति को सहेजने और अपने परिवेश को बचाने का। कुमाऊनी बोलना केवल बोली नहीं, एक भाव है, एक पहचान है जो हमें ‘हम’ बनाती है।

आज जब मीडिया का भी जमावड़ा इस यादगार पल को अपने कैमरे में कैद करने को तैयार है, तब यह हर कुमाऊनी के लिए गर्व का अवसर है। जो भी इस सम्मेलन के आसपास हैं — चाहे छात्र हों, शिक्षाविद हों या आम नागरिक — उन्हें अवश्य पहुंचना चाहिए और अपनी राय रखनी चाहिए।

यह सम्मेलन सिर्फ साहित्य या कला का मंच नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आंदोलन है — अपने अस्तित्व की रक्षा का।
अगर आप अपनी मिट्टी, अपनी बोली, और अपनी संस्कृति से प्रेम करते हैं, तो आज का दिन आपके लिए है।
रुद्रपुर का यह ऐतिहासिक सम्मेलन यह संदेश दे रहा है —
“कुमाऊँ बोले, कुमाऊँ जागे — अपनी भाषा, अपनी धरती बचाए।” 🌿📚


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