

पिथौरागढ़,पुलिस व्यवस्था का मूल आधार जन-विश्वास है। जनता मानती है कि वर्दी न्याय की प्रतीक है, शक्ति का दुरुपयोग नहीं। लेकिन जब इसी वर्दी के भीतर से अत्याचार की आवाजें उठें—जब किसी आम नागरिक को हिरासत में लेकर नग्न कर पीटा जाए—तो यह केवल एक व्यक्ति के साथ हुआ अत्याचार नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की आत्मा पर चोट बन जाता है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
पिथौरागढ़ निवासी लक्ष्मी दत्त जोशी के साथ हुई घटना इसी कड़वे सच की याद दिलाती है। साल 2023 की यह घटना दो साल बाद न्याय की दृष्टि से निर्णायक मोड़ पर पहुंची है। राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण ने पूर्व आईपीएस लोकेश्वर सिंह को दोषी ठहराते हुए उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की संस्तुति की है। यह फैसला देर से सही, पर यह संदेश बेहद स्पष्ट है—उत्तराखंड में अब वर्दी के नाम पर ज्यादती को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
इस मामले का सबसे गंभीर पक्ष यह है कि पीड़ित को न सिर्फ अवैध रूप से हिरासत में रखा गया, बल्कि एसपी कार्यालय के भीतर नग्न कर पीटा गया—यह अपने आप में पुलिस अत्याचार का चरम रूप है। पीड़ित के आपराधिक इतिहास, विवादों या मुकदमों का हवाला देकर कोई भी अधिकारी अपने कृत्य को वैध नहीं ठहरा सकता। कानून अपराधियों को भी समान अधिकार देता है—और वही व्यवस्था की विश्वसनीयता का आधार है।
दूसरी ओर, यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि लोकेश्वर सिंह ने पुलिस सेवा से त्यागपत्र देकर अंतरराष्ट्रीय संगठन में नई भूमिका स्वीकार कर ली है। परंतु यह जिम्मेदारियों से बचने का अवसर नहीं हो सकता। शासन को प्राधिकरण की संस्तुति पर त्वरित और कठोर कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि ऐसे मामलों को “पद परिवर्तन” या “सेवा परिवर्तन” के पंख न मिल जाएं।
न्यायमूर्ति एनएस धानिक और उनकी टीम का यह निर्णय न केवल एक व्यक्ति को राहत देता है, बल्कि पूरे राज्य तंत्र के लिए एक चेतावनी है कि सत्ता का दुरुपयोग अब अनदेखा नहीं होगा। पुलिस सुधारों की लगातार होती मांग आज फिर साबित करती है कि निगरानी तंत्र केवल कागजों में नहीं, बल्कि धरातल पर सक्रिय होना चाहिए।
अंततः, यह मामला उत्तराखंड की जनता के लिए एक सीख और उम्मीद दोनों है—सीख यह कि कोई भी शक्ति कानून से ऊपर नहीं, और उम्मीद यह कि न्याय की प्रक्रिया चाहे धीमी हो, पर चलती जरूर है। अब जिम्मेदारी शासन की है कि इस फैसले को केवल “कागजी कार्रवाई” के पन्नों में न दबने दे।
वर्दी का सम्मान तभी है, जब वह नागरिकों की सुरक्षा का प्रतीक बने—न कि उनके भय का कारण।
प्राधिकरण ने पीड़ित लक्ष्मी दत्त जोशी की शिकायत की जांच के बाद पाया कि आईपीएस अफसर ने पीड़ित को अपने ऑफिस में बुलाकर कपड़े उतरवाए और मारपीट की। प्राधिकरण ने शासन (गृह विभाग) से एसपी लोकेश्वर सिंह के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की है। लोकेश्वर सिंह हाल में नौकरी से इस्तीफा दे चुके हैं।
मामला फरवरी 2023 का है। पीड़ित लक्ष्मी दत्त जोशी ने मामले में प्रार्थना पत्र दिया था। इसमें आरोप लगाया गया था कि छह फरवरी 2023 को उन्हें पुलिस अधीक्षक कार्यालय पिथौरागढ़ में एसपी लोकेश्वर सिंह और छह अन्य पुलिसकर्मियों ने बुरी तरह पीटा। इससे उन्हें गंभीर चोटें आईं। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि एसपी ने उन्हें पूर्व में भी परेशान किया और उनके खिलाफ फर्जी मुकदमे दर्ज कराए।
आईपीएस ने आरोपों को निराधार बताया
पुलिस अधीक्षक लोकेश्वर सिंह ने अपने शपथ पत्र में आरोपों को झूठा और निराधार बताया। उन्होंने कहा कि जोशी आपराधिक किस्म के व्यक्ति हैं। उनके खिलाफ जुआ अधिनियम, मारपीट, और गुंडा अधिनियम सहित कई मुकदमे दर्ज हैं। एसपी ने कहा कि जोशी को केवल वाहनों में आग लगाने की घटनाओं के संबंध में पूछताछ के लिए बुलाया गया था। पूछताछ के बाद उन्हें परिजनों के सुपुर्द कर दिया गया। सिंह ने मारपीट की घटना से साफ इनकार किया। हालांकि, प्राधिकरण ने एसपी के शपथ पत्रों में गंभीर विरोधाभास पाया। एक शपथ पत्र में कहा गया कि जोशी 6 फरवरी 2023 को पुलिस कार्यालय में उपस्थित नहीं थे। अन्य शपथ पत्रों में पूछताछ के लिए बुलाए जाने की पुष्टि की गई।
मेडिकल जांच में चोट की पुष्टि
शिकायतकर्ता ने सात फरवरी 2023 को मेडिकल जांच कराई थी। इसमें डॉक्टर की राय में चोटें हार्ड एंड ब्लंट ऑब्जेक्ट से आना अंकित था। ये चोटें गिरने से भी आ सकती हैं। शिकायतकर्ता ने छह फरवरी 2023 के पुलिस अधीक्षक कार्यालय के वीडियो फुटेज की मांग आरटीआई के तहत की थी। इसे तकनीकी आधार पर उपलब्ध नहीं कराया गया। प्राधिकरण ने अपने निष्कर्ष में पाया कि इस प्रकरण में साक्ष्य से यह स्पष्ट है कि शिकायतकर्ता को छह फरवरी 2023 को पुलिस अधीक्षक कार्यालय बुलाया गया था, जहां उसके साथ मारपीट और अभद्रता की गई।
प्राधिकरण पीठ ने पुलिस अधीक्षक लोकेश्वर सिंह को दोषी मानते हुए उत्तराखंड पुलिस अधिनियम के अनुसार कार्यवाही की सिफारिश की। पीठ में प्राधिकरण के अध्यक्ष न्यायमूर्ति एनएस धानिक, सदस्य अजय जोशी, पुष्पक ज्योति, दयाशंकर पांडे, मोहन चंद्र तिवाड़ी शामिल रहे।




