अंकिता न्याय की आग: रुद्रपुर से उठी आवाज़ ने सत्ता की चुप्पी को कठघरे में खड़ा किया

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रुद्रपुर | विशेष रिपोर्ट रुद्रपुर कलेक्ट्रेट परिसर में कांग्रेस पार्टी द्वारा अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर सीबीआई जांच की मांग के साथ किया गया जोरदार धरना-प्रदर्शन बुधवार को उस समय सुर्खियों में आ गया, जब प्रदर्शन के दौरान पुलिस और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच तीखी धक्का-मुक्की के दृश्य सामने आए। कांग्रेस ने पुलिस पर लाठीचार्ज के आरोप लगाए, जबकि प्रशासन ने स्थिति को नियंत्रित करने की बात कही। देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड में न्याय की मांग को लेकर उपजे इस टकराव ने एक बार फिर सत्ता, पुलिस और जनभावनाओं के बीच बढ़ती दूरी को उजागर कर दिया।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड)
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि अंकिता भंडारी हत्याकांड अब केवल एक आपराधिक मामला नहीं रहा, बल्कि यह सत्ता-संरक्षण, वीआईपी संस्कृति और चयनित न्याय का प्रतीक बन चुका है। धरने के दौरान नेताओं ने आरोप लगाया कि इतने गंभीर मामले में भी राज्य सरकार सीबीआई जांच से बच रही है, जो अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि जब तक निष्पक्ष जांच नहीं होगी और कथित वीआईपी चेहरों की भूमिका सामने नहीं आएगी, तब तक न्याय अधूरा रहेगा।
इसी कड़ी में बाजपुर में नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य के नेतृत्व में धरना प्रदर्शन किया गया, जबकि इससे पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल द्वारा कैंडल मार्च निकाला जा चुका है। कांग्रेस पार्टी लगभग हर विधानसभा क्षेत्र में सुनियोजित तरीके से अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने के लिए सड़क पर उतरती दिखाई दे रही है। पार्टी नेताओं का दावा है कि यह आंदोलन किसी एक परिवार या जिले तक सीमित नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सामूहिक चेतना का प्रश्न बन चुका है।
धरने के दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की चुप्पी को लेकर भी तीखे सवाल उठाए गए। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि यदि सरकार निष्पक्ष है तो सीबीआई जांच से डर क्यों? उनका आरोप है कि वीआईपी नाम सामने आने के बावजूद गिरफ्तारियों से परहेज किया गया, जिससे जनता में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। बाजारों, चाय की दुकानों और गांवों की चौपालों तक यह चर्चा आम हो चली है कि यदि अंकिता को न्याय नहीं मिला तो इसका राजनीतिक असर 2027 के विधानसभा चुनाव में साफ दिखाई देगा।
हालांकि, कांग्रेस की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस को अपने अतीत पर भी आत्ममंथन करना होगा, क्योंकि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों के दौर में भी कई संवेदनशील मुद्दों पर चुप्पी और राजनीतिक संरक्षण के आरोप लगते रहे हैं। इसके बावजूद यह भी सच है कि वर्तमान समय में यदि कोई पार्टी लगातार सड़क पर उतरकर सरकार से जवाब मांग रही है, तो वह कांग्रेस ही है।
पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अंकिता भंडारी हत्याकांड अब कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा। यह उत्तराखंड की राजनीति, सामाजिक चेतना और भविष्य से जुड़ा सवाल बन चुका है। आने वाले विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा केवल विकास के वादों से नहीं, बल्कि बेटियों की सुरक्षा, कानून की समानता और सत्ता की जवाबदेही के सवाल पर भी लड़ा जाएगा। जनता अब यह तय करने के मूड में दिख रही है कि क्या देवभूमि में न्याय सचमुच जीवित है या सत्ता की छाया में दम तोड़ रहा है।


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