

कुमाऊँ में घुघुतिया ,मकर संक्रांति केवल एक तिथि या पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में ऋतु परिवर्तन, कृषि जीवन और प्रकृति के साथ मनुष्य के आत्मीय संबंध का उत्सव है। इसी पावन अवसर पर कुमाऊँ अंचल में मनाया जाने वाला लोकपर्व घुघुतिया (घुघुतिया त्यार/उत्तरायणी) आज भी अपनी सांस्कृतिक सुगंध, लोककथाओं और बाल-मन की निष्कलुष भावनाओं के साथ पूरे क्षेत्र में धूम मचा रहा है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
सूर्य के उत्तरायण होने, ठंड के धीरे-धीरे विदा लेने और नई ऊर्जा के संचार का प्रतीक यह पर्व कुमाऊँ की लोकआत्मा में रचा-बसा है। 14 जनवरी को मकर संक्रांति के दिन मनाया जाने वाला घुघुतिया, अपने स्वरूप में जितना सरल है, अपने भावार्थ में उतना ही गहन और मानवीय है।
घर-घर तैयारियाँ, रसोई से संस्कृति तक
घुघुतिया से एक दिन पूर्व ही कुमाऊँ के घरों में विशेष हलचल दिखाई देती है। घरों की साफ-सफाई के बाद रसोई में आटा, सूजी, घी, दूध, तेल और गुड़ से बने मीठे पकवान—घुघुते—तैयार किए जाते हैं। इन घुघुतों को विशेष आकृतियों में ढाला जाता है—पक्षी, ढाल, तलवार, डमरू, खिलौने—जो बच्चों के आकर्षण का केंद्र होते हैं।
मीठे आटे से बने इन पकवानों को एक धागे में पिरोकर घुघुती माला बनाई जाती है। यह माला केवल भोजन नहीं, बल्कि परंपरा, प्रेम और लोकस्मृति का प्रतीक है।
बच्चों का पर्व, कौवों से संवाद
घुघुतिया को विशेष रूप से बच्चों का लोकपर्व कहा जाता है। मकर संक्रांति की सुबह बच्चे घुघुती माला गले में पहनकर छतों और आंगनों में निकलते हैं। उनकी सामूहिक आवाज—
“काले कौवा काले, घुघुती माला खा ले”—
के साथ आसमान में मानो लोकसंस्कृति गूंज उठती है।
कौवों को बुलाकर उन्हें घुघुते खिलाना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, प्रकृति से संवाद और जीव-जंतुओं के साथ सह-अस्तित्व की भावना का जीवंत उदाहरण है। भारतीय लोकमान्यता में कौवे पितरों के दूत माने जाते हैं, ऐसे में यह परंपरा श्रद्धा और संवेदनशीलता का अनूठा संगम प्रस्तुत करती है।
घुघुतिया की लोककथा: विश्वास और मित्रता की जीत
घुघुतिया पर्व के पीछे प्रचलित लोककथा इसे और भी भावनात्मक गहराई प्रदान करती है। कुमाऊँ के चंद्रवंशीय राजा कल्याण चंद और उनके पुत्र निर्भयचंद (घुघुती) की कथा, विश्वासघात पर मित्रता की विजय का प्रतीक है।
कथा के अनुसार, जब मंत्री ने षड्यंत्र कर बालक घुघुती को जंगल में ले जाने का प्रयास किया, तब उसके मित्र कौवों ने उसकी रक्षा की। कौवों की सूझबूझ और सामूहिक साहस से घुघुती सुरक्षित अपने माता-पिता तक पहुंचा। इस घटना के बाद घुघुती ने अपने मित्र कौवों को पकवान खिलाए और यही परंपरा कालांतर में पूरे कुमाऊँ का लोकपर्व बन गई।
यह कथा बच्चों को साहस, मित्रता, करुणा और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का संदेश देती है।
लोकसंस्कृति की जीवंत पहचान
आज के आधुनिक और डिजिटल युग में भी घुघुतिया का जीवित रहना इस बात का प्रमाण है कि लोकसंस्कृति केवल अतीत नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतना भी है। अल्मोड़ा, बागेश्वर, नैनीताल, पिथौरागढ़, चंपावत सहित पूरे कुमाऊँ मंडल में यह पर्व सामाजिक एकता और सांस्कृतिक निरंतरता का सेतु बना हुआ है।
घुघुतिया हमें यह भी याद दिलाता है कि विकास की दौड़ में प्रकृति से कटाव नहीं, बल्कि उसके साथ संतुलन आवश्यक है। कौवों को अन्न अर्पित करना, ऋतुओं का सम्मान करना और बच्चों के माध्यम से परंपराओं को आगे बढ़ाना—यही इस पर्व का मूल संदेश है।
घुघुतिया केवल एक पर्व नहीं, बल्कि कुमाऊँ की आत्मा की आवाज है। यह त्योहार बताता है कि हमारी लोकपरंपराएँ आज भी हमें प्रकृति, समाज और मानवीय मूल्यों से जोड़ने की शक्ति रखती हैं। जब तक बच्चों की आवाज में “काले कौवा काले” गूंजता रहेगा, तब तक कुमाऊँ की यह अनमोल सांस्कृतिक धरोहर जीवित रहेगी।
मकर संक्रांति: धर्म, संस्कृति और जीवन-संतुलन का पर्व
भारतीय सनातन परंपरा में मकर संक्रांति केवल एक तिथि या पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, खगोल और आध्यात्मिक चेतना के समन्वय का जीवंत उत्सव है। वर्ष 2026 में 14 जनवरी को मनाया जाने वाला यह पर्व सूर्य के धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश का साक्षी बनेगा। दोपहर 3:13 बजे से आरंभ होने वाला पुण्य काल और 4:58 बजे तक रहने वाला महा पुण्य काल, भारतीय जीवन दर्शन में समय की पवित्रता और कर्म की महत्ता को रेखांकित करता है।
मकर संक्रांति उत्तरायण का प्रतीक है—वह काल जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर बढ़ते हैं। शास्त्रों में उत्तरायण को प्रकाश, ज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग बताया गया है। यही कारण है कि इस अवधि में किया गया स्नान, दान, जप और पूजा कई गुना पुण्य फल प्रदान करते हैं। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि प्रकृति की गति के साथ स्वयं को संतुलित करना ही जीवन की सच्ची साधना है।
पौराणिक कथाएं इस पर्व की गहनता को और भी दृढ़ करती हैं। महाभारत में भीष्म पितामह द्वारा उत्तरायण की प्रतीक्षा करते हुए देह त्याग करने की कथा, इस काल की मोक्षदायिनी महत्ता को दर्शाती है। यह विश्वास केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि जीवन के अंतिम लक्ष्य—मुक्ति—की ओर संकेत करता है।
मकर संक्रांति का एक सुंदर पक्ष है खिचड़ी—जो केवल भोजन नहीं, बल्कि ग्रहों और जीवन-तत्वों का संतुलन है। चावल (चंद्रमा) मन को शांति देता है, काली उड़द (शनि) कर्म और अनुशासन का प्रतीक बनती है, हल्दी (बृहस्पति और विष्णु) ज्ञान और भाग्य का संचार करती है, नमक (शुक्र) जीवन में रस और समृद्धि लाता है, जबकि हरी सब्जियां (बुध) बुद्धि और संवाद को सशक्त करती हैं। यह लोकज्ञान दर्शाता है कि भारतीय परंपरा में भोजन भी चिकित्सा, साधना और ज्योतिष का समन्वय है।
दान और सेवा मकर संक्रांति की आत्मा हैं। ब्राह्मणों, साधुओं, निर्धनों और जरूरतमंदों को दान देकर समाज के कमजोर वर्गों के साथ एकात्मता का भाव जागृत किया जाता है। यही भाव भारतीय संस्कृति को केवल कर्मकांड से ऊपर उठाकर मानवीय संवेदना का पर्व बनाता है।
आज जब आधुनिक जीवन भागदौड़ और उपभोक्तावाद में उलझा है, मकर संक्रांति हमें रुककर आत्ममंथन करने, प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठाने और समाज के प्रति अपने दायित्व को याद करने का अवसर देती है। यह पर्व सिखाता है कि सूर्य की तरह हमें भी अंधकार से प्रकाश की ओर, जड़ता से चेतना की ओर निरंतर अग्रसर रहना चाहिए।
मकर संक्रांति वास्तव में संक्रांति है—केवल सूर्य की नहीं, बल्कि मानव जीवन की भी।
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उत्तरायण का पावन सूर्य आपके जीवन में नई ऊर्जा, सुख-समृद्धि और यश की निरंतर वृद्धि करे। आप सपरिवार स्वस्थ, प्रसन्न और मंगलमय जीवन व्यतीत करें। मकर संक्रांति, घुघुतिया एवं उत्तरायणी पर्व की सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएं।
सादर — अवतार सिंह बिष्ट
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स




