सार्वजनिक भूमि, आस्था और कानून: क्या उत्तराखंड अब भी गंभीर है?

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सार्वजनिक भूमि पर अवैध धार्मिक निर्माण पर सख्ती, राज्यों को छह सप्ताह में नीति बनाने के निर्देश
नई दिल्ली। सार्वजनिक सड़कों, पार्कों और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर बने अवैध धार्मिक ढाँचों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कड़ा निर्देश दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर या गुरुद्वारा आदि के नाम पर किसी भी प्रकार का नया अवैध निर्माण न तो किया जाएगा और न ही उसकी अनुमति दी जाएगी।
साथ ही, पहले से बने अवैध धार्मिक निर्माणों की राज्य सरकारें मामला-दर-मामला समीक्षा करें और आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करें। न्यायालय ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को निर्देश दिया है कि वे छह सप्ताह के भीतर विस्तृत हलफनामा दाखिल कर अब तक की गई कार्रवाई और भविष्य की कार्ययोजना की जानकारी दें।
न्यायालय ने यह भी कहा कि आदेशों के पालन की निगरानी संबंधित उच्च न्यायालय करेंगे तथा उल्लंघन की स्थिति में अवमानना की कार्यवाही भी की जा सकती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं है और कानून का समान रूप से पालन अनिवार्य है।



देश के सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि सार्वजनिक सड़कों, उद्यानों और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर किसी भी प्रकार के अवैध धार्मिक निर्माण को न तो अनुमति दी जाएगी और न ही उसे संरक्षण मिलेगा। वर्ष 2009 और 2010 के आदेशों की पुनर्पुष्टि करते हुए न्यायालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देशित किया है कि वे न केवल नए निर्माणों को रोकें, बल्कि पहले से बने अवैध ढाँचों पर भी ठोस कार्रवाई सुनिश्चित करें।
न्यायालय ने साफ कहा है कि
सार्वजनिक स्थलों पर मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर या गुरुद्वारा जैसे किसी भी धार्मिक ढांचे का अवैध निर्माण प्रतिबंधित है।
मुख्य सचिवों को विस्तृत हलफनामा दाखिल कर यह बताना होगा कि क्या कार्रवाई की गई।
आदेशों के उल्लंघन पर अवमानना की कार्यवाही संबंधित उच्च न्यायालय के माध्यम से की जाएगी।
राज्यों को छह सप्ताह के भीतर नीति बनाकर स्पष्ट करना होगा कि अवैध निर्माणों को हटाने, स्थानांतरित करने या नियमित करने की प्रक्रिया क्या होगी।
यह केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि संविधान के मूल सिद्धांत—कानून के समक्ष समानता—की पुनर्स्थापना है।
उत्तराखंड: आस्था की भूमि या अव्यवस्था की प्रयोगशाला?
उत्तराखंड देवभूमि है। यहां आस्था स्वाभाविक है, लेकिन क्या आस्था के नाम पर सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण उचित है? क्या सड़क के बीच में उग आया एक मंदिर, या पार्क के कोने में बनी कोई संरचना, कानून से ऊपर हो सकती है?
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह मामला किसी धर्म विशेष का नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था और विधि के शासन का है। फिर भी उत्तराखंड सहित कई राज्यों में वर्षों से यह प्रवृत्ति चलती रही कि पहले निर्माण कर लो, फिर उसे “भावनाओं” का मुद्दा बना दो।
सबसे गंभीर प्रश्न यह है —
क्या राज्य सरकार ने अब तक कोई व्यापक और पारदर्शी नीति बनाई है?
क्या जिलाधिकारियों और स्थानीय निकायों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं?
क्या पुराने मामलों की सूची सार्वजनिक की गई है?
राजनीति की चुप्पी क्यों?
अक्सर देखा गया है कि प्रशासन अवैध निर्माणों पर कार्रवाई करने से बचता है, क्योंकि उसे राजनीतिक विरोध का भय रहता है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब टालमटोल नहीं चलेगा।
जब न्यायालय कह रहा है कि आदेशों की निगरानी उच्च न्यायालय करेगा और अवमानना की कार्रवाई भी संभव है, तो फिर देरी किस बात की?
यदि राज्य सरकारें वास्तव में विधि शासन के प्रति प्रतिबद्ध हैं, तो उन्हें चाहिए कि—
जिला स्तर पर सर्वे कर सार्वजनिक भूमि की सूची जारी करें।
सभी अवैध धार्मिक ढाँचों का डेटा सार्वजनिक पोर्टल पर अपलोड करें।
समयबद्ध कार्रवाई की कार्ययोजना घोषित करें।
आस्था बनाम अतिक्रमण: अंतर समझना होगा
धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय है। लेकिन सार्वजनिक भूमि राज्य की संपत्ति है, जनता की संपत्ति है। यदि हर व्यक्ति अपनी सुविधा के अनुसार सड़क, पार्क या सरकारी भूमि पर निर्माण करने लगे, तो शहरों का क्या होगा?
न्यायालय ने यह भी कहा है कि पहले से बने ढाँचों की “मामला-दर-मामला समीक्षा” हो। इसका अर्थ यह नहीं कि सभी को नियमित कर दिया जाए, बल्कि यह कि कानून सम्मत समाधान निकले—जहां आवश्यक हो, हटाया जाए; जहां संभव हो, वैकल्पिक स्थान दिया जाए।
उत्तराखंड के लिए चेतावनी
देवभूमि की पहचान आध्यात्मिकता से है, अवैधता से नहीं। यदि राज्य सरकार और प्रशासन इस मुद्दे पर गंभीर नहीं हुए, तो आने वाले समय में न्यायालय की कठोर कार्रवाई से बचना मुश्किल होगा।

नई दिल्ली, 31 जनवरी 2018।
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने सार्वजनिक स्थलों पर अवैध धार्मिक निर्माणों पर सख्ती दिखाते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को स्पष्ट निर्देश दिए। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा व अमिताव रॉय की पीठ ने कहा कि सड़कों, पार्कों व सार्वजनिक स्थानों पर नया धार्मिक निर्माण पूर्णतः प्रतिबंधित रहेगा। पहले से बने ढांचों की पहचान कर उन्हें हटाने, स्थानांतरित करने या नियमित करने हेतु समयबद्ध नीति बनानी होगी। मुख्य सचिवों को हलफनामा दाखिल करने और आदेशों के कड़ाई से पालन की जिम्मेदारी सौंपी गई। निगरानी संबंधित उच्च न्यायालय करेंगे।


यह संपादकीय किसी धर्म के खिलाफ नहीं है। यह उस प्रवृत्ति के खिलाफ है जिसमें कानून को भावनाओं के नाम पर दरकिनार कर दिया जाता है।
सर्वोच्च न्यायालय का संदेश स्पष्ट है —
“सार्वजनिक भूमि पर अवैध धार्मिक निर्माण किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं।”
अब देखना यह है कि उत्तराखंड सरकार इस संदेश को केवल फाइलों में रखती है या जमीन पर भी लागू करती है।


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