

रुद्रपुर/देहरादून।उत्तराखंड सरकार द्वारा वर्ष 2016 में जारी की गई नीति के तहत लोक मार्गों, लोक पार्कों तथा अन्य सार्वजनिक स्थलों पर बिना अनुमति निर्मित धार्मिक संरचनाओं को हटाने, पुनर्स्थापित करने अथवा विनियमित करने की प्रक्रिया स्पष्ट की गई है। हाल में यह नीति एक बार फिर प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
नीति के अनुसार, राज्य में ऐसे सभी अनधिकृत धार्मिक स्थलों को चिन्हित किया जाएगा जो—
आवागमन में बाधा उत्पन्न कर रहे हों,
जनसाधारण अथवा राजकीय कार्यों के संचालन में असुविधा पैदा कर रहे हों,
अथवा जिनके कारण भविष्य में सड़क चौड़ीकरण जैसी विकास योजनाओं में अवरोध की संभावना हो।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला
नीति में स्पष्ट उल्लेख है कि विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 8519/2006, भारत संघ बनाम गुजरात राज्य व अन्य में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दिनांक 29.09.2009 को पारित आदेश के अनुपालन में यह व्यवस्था लागू की गई। आदेश के अनुसार, सार्वजनिक स्थलों पर नए धार्मिक निर्माण की अनुमति नहीं होगी।
जिला स्तर पर कलेक्टर उत्तरदायी
नीति के तहत जनपद स्तर पर कलेक्टर को नोडल अधिकारी की जिम्मेदारी सौंपी गई है। उपजिलाधिकारी (एसडीएम) उपखंड स्तर पर कार्रवाई के लिए उत्तरदायी होंगे। अवैध निर्माण हटाने के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पर्याप्त पुलिस बल उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी प्रशासन की होगी।
प्रत्येक तीन माह में समीक्षा बैठक आयोजित कर यह सुनिश्चित किया जाएगा कि—
चिन्हित अवैध संरचनाओं को हटाया गया है या नहीं,
आवश्यक होने पर उनका विधिसम्मत पुनर्स्थापन किया गया है या नहीं,
तथा संबंधित विभागों द्वारा कार्रवाई की रिपोर्ट शासन को भेजी गई है।
पुरातात्विक स्थलों पर विशेष प्रावधान
ऐसे स्थल जो प्राचीन अथवा पुरातात्विक महत्व के हैं, उनके संबंध में पुरातत्व विभाग की सलाह को अनिवार्य माना गया है।
जनभावनाओं का ध्यान, पर अवैध कब्जे पर सख्ती
नीति में यह भी उल्लेखित है कि जिन स्थानों पर वास्तविक धार्मिक गतिविधि न होकर केवल आवासीय या व्यावसायिक अतिक्रमण धार्मिक आड़ में किया गया हो, वहाँ कठोर कार्रवाई की जाएगी। वहीं, पूर्व में प्रशासनिक सहमति से स्थापित स्थलों के मामलों में जनहित आधारित पर्याप्त कारण के बिना हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।
नई दिल्ली, 31 जनवरी 2018।सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने सार्वजनिक स्थलों पर अवैध धार्मिक निर्माणों पर सख्ती दिखाते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को स्पष्ट निर्देश दिए। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा व अमिताव रॉय की पीठ ने कहा कि सड़कों, पार्कों व सार्वजनिक स्थानों पर नया धार्मिक निर्माण पूर्णतः प्रतिबंधित रहेगा। पहले से बने ढांचों की पहचान कर उन्हें हटाने, स्थानांतरित करने या नियमित करने हेतु समयबद्ध नीति बनानी होगी। मुख्य सचिवों को हलफनामा दाखिल करने और आदेशों के कड़ाई से पालन की जिम्मेदारी सौंपी गई। निगरानी संबंधित उच्च न्यायालय करेंगे।
राज्य सरकार की यह नीति विकास कार्यों को सुचारु बनाए रखने और सार्वजनिक स्थलों को अतिक्रमण से मुक्त रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस नीति को कितनी प्रभावी और निष्पक्षता से लागू करता है।




