

सरस मेला या मिशन 2027? रुद्रपुर की सांस्कृतिक शाम में राजनीति और प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर सवाल
रुद्रपुर से लाइव विशेष रिपोर्ट | संपादकीय विश्लेषण

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
देवभूमि उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जनपद मुख्यालय रुद्रपुर में आयोजित सरस आजीविका मेला इन दिनों चर्चा के केंद्र में है। रंग-बिरंगी रोशनी, बड़े मंच, सरकारी योजनाओं के पोस्टर और वीआईपी आवाजाही के बीच एक बड़ा सवाल उभर रहा है—क्या यह आयोजन सचमुच आजीविका और संस्कृति का उत्सव था, या 2027 के चुनावी समीकरणों की पृष्ठभूमि?
सुरक्षा की छाया में असुरक्षा
मेले के दौरान पुलिस और प्रशासन की भारी तैनाती दिखी। मंच के आसपास सुरक्षा घेरा, वीआईपी गैलरी में व्यवस्था, अधिकारियों की सक्रियता—सब कुछ व्यवस्थित प्रतीत हुआ। लेकिन इसी बीच मेला देखकर लौट रही एक महिला के साथ दुष्कर्म की घटना ने पूरे आयोजन पर प्रश्नचिह्न लगा दिया।
सवाल यह है कि क्या सुरक्षा का फोकस आम जनता पर था, या मंच और नेताओं पर? क्या पर्याप्त महिला पुलिसकर्मी, सीसीटीवी निगरानी, गश्त और सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित किए गए थे? जब किसी सार्वजनिक आयोजन में ऐसी घटना होती है, तो यह केवल अपराध नहीं, प्रशासनिक प्राथमिकताओं का भी आईना बन जाती है।
संस्कृति या राजनीतिक मंच?
मंच से दिए गए भाषणों में सरकारी योजनाओं का उल्लेख, उपलब्धियों की सूची और भविष्य की प्रतिबद्धताओं का दोहराव सुनाई दिया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की प्रशंसा के पुल बाँधे गए। विकास, रोजगार और महिला सशक्तिकरण की बातें हुईं—जो स्वागतयोग्य हैं—परंतु स्थानीय समस्याओं पर ठोस उत्तर कम दिखाई दिए।
आगामी 2027 विधानसभा चुनावों की पृष्ठभूमि में यह आयोजन कई दर्शकों को “मिशन 2027” की प्रस्तावना जैसा लगा। नौकरशाहों की अग्रिम भूमिका और राजनीतिक नेतृत्व की उपस्थिति ने इस धारणा को और बल दिया। सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या प्रशासनिक संसाधनों का उपयोग जनकल्याण के लिए था या राजनीतिक छवि निर्माण के लिए?
‘लखपति दीदी’—संकल्प और सच्चाई
मंच से “लखपति दीदी” पहल का बार-बार उल्लेख हुआ। यह केंद्र सरकार की वह पहल है, जिसका उद्देश्य स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को वार्षिक एक लाख रुपये या उससे अधिक आय तक पहुँचाना है। विचार सराहनीय है—ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में यह सकारात्मक कदम है।
लेकिन क्या केवल स्टॉल आवंटन और मंचीय सम्मान से यह लक्ष्य पूरा होगा? क्या इन समूहों को स्थायी बाज़ार, डिजिटल प्लेटफॉर्म, ई-कॉमर्स से जोड़ने, कार्यशील पूंजी और प्रशिक्षण की निरंतर व्यवस्था है? यदि नहीं, तो यह पहल प्रतीकात्मक बनकर रह जाएगी।
स्टॉल आवंटन—स्थानीय बनाम बाहरी
मेला स्थानीय आजीविका के नाम पर आयोजित था, किंतु स्टॉल दिल्ली, झारखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर से आए प्रतिभागियों को भी दिए गए। बाहरी भागीदारी सांस्कृतिक आदान-प्रदान का हिस्सा हो सकती है, पर यदि स्थानीय कारीगरों को सीमित अवसर मिलें और वही नाम बार-बार दोहराए जाएँ, तो पारदर्शिता पर प्रश्न उठना लाजिमी है।
क्या स्टॉल आवंटन की प्रक्रिया सार्वजनिक थी? क्या ऑनलाइन आवेदन और ड्रॉ सिस्टम अपनाया गया? या “पास-संस्कृति” और सिफारिश यहाँ भी प्रभावी रही?
पास-संस्कृति और वीआईपी गैलरी
वीआईपी गैलरी में अधिकारी, जनप्रतिनिधि और पार्टी कार्यकर्ता परिवार सहित बैठे दिखे। दूसरी ओर, कई वरिष्ठ नागरिक और स्थानीय प्रतिष्ठित लोग पीछे खड़े होकर कार्यक्रम देखने को विवश रहे। मीडिया को प्रवेश मिला, पर उनके परिवारों को नहीं। यह सार्वजनिक मेला था या सीमित आमंत्रण का समारोह?
लोकतंत्र में जनभागीदारी का अर्थ केवल भीड़ नहीं, समान अवसर भी है।
स्थानीय कलाकारों की अनदेखी
उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान लोकगीतों और लोकनृत्यों से है। फिर भी, कई दर्शकों ने शिकायत की कि स्थानीय कलाकारों को अपेक्षित मंच नहीं मिला। बाहर से बुलाए गए कलाकारों को प्राथमिकता दी गई, जबकि पहाड़ी लोकधुनों को सीमित समय मिला।
यदि यह आयोजन सांस्कृतिक आत्मविश्वास का प्रतीक है, तो स्थानीय प्रतिभाओं को केंद्र में होना चाहिए। अन्यथा यह संदेश जाता है कि अपनी संस्कृति पर भरोसा कम है।
“पहाड़ी उत्पाद” और बाज़ार की हकीकत
कई स्टॉलों पर सीमित मात्रा में राजमा, झंगोरा, मंडुवा जैसे उत्पाद रखे दिखे। प्रश्न है—क्या यह टिकाऊ बाज़ार मॉडल है? यदि उद्देश्य वास्तविक आर्थिक सशक्तिकरण है, तो सप्लाई चेन, ब्रांडिंग, पैकेजिंग और स्थायी खरीदार नेटवर्क जरूरी है। अन्यथा आयोजन फोटो-ऑप बनकर रह जाएगा।
जड़ी-बूटी और चमत्कारी दावे
कुछ स्टॉलों पर “खोई हुई जवानी” फिर से प्राप्त करें,जैसे दावे भी देखे गए। सार्वजनिक आयोजनों में ऐसे दावों की निगरानी किसकी जिम्मेदारी है? क्या स्वास्थ्य विभाग ने इन उत्पादों की वैधता की जांच की? उपभोक्ता संरक्षण के मानकों का पालन हुआ या नहीं—यह स्पष्ट होना चाहिए।
लागत बनाम लाभ
करदाताओं के धन से आयोजित ऐसे आयोजनों में पारदर्शिता अनिवार्य है। मंच, लाइट-साउंड, कलाकार शुल्क, सुरक्षा, प्रचार—हर मद का विवरण सार्वजनिक होना चाहिए। यदि स्वतंत्र ऑडिट रिपोर्ट जारी हो, तो संदेह स्वतः कम होंगे।
जनता पूछ रही है—क्या इस मेले से वास्तविक आर्थिक लाभ हुआ, या केवल राजनीतिक संदेश गया?
प्रशासन की जवाबदेही
जिला प्रशासन और आयोजन समिति को स्पष्ट करना चाहिए:
स्टॉल आवंटन की प्रक्रिया क्या थी?
कलाकारों का चयन और भुगतान किस आधार पर हुआ?
सुरक्षा प्रबंधन की जिम्मेदारी किसकी थी?
कुल व्यय और ऑडिट रिपोर्ट कब सार्वजनिक होगी?
पारदर्शिता ही विश्वास का आधार है।
निष्कर्ष
रुद्रपुर का सरस मेला एक अवसर था—संस्कृति, आजीविका और सामुदायिक सहभागिता को जोड़ने का। लेकिन यदि यह राजनीतिक छाया, पास-संस्कृति और प्रशासनिक चूक की खबरों से घिर जाए, तो मूल उद्देश्य धुंधला पड़ जाता है।
2027 की तैयारी किसी भी दल का लोकतांत्रिक अधिकार है। परंतु जनधन से आयोजित कार्यक्रमों में प्राथमिकता सुरक्षा, पारदर्शिता और स्थानीय सहभागिता को मिलनी चाहिए। वरना रोशनी के पीछे खड़े साये और गहरे होते जाएँगे।
यह समय है आत्ममंथन का—क्या हम मेले को उत्सव बनाएँगे या मंच? निर्णय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को लेना है, पर जवाब जनता को देना




