भाजपा की सेंधमारी बनाम उभरता क्षेत्रीय स्वाभिमान: क्या चुनावी शतरंज में बदलेगा खेल?

Spread the love


रुद्रपुर देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में इस समय सतह पर भले ही सत्तारूढ़ दल का आत्मविश्वास दिखाई दे रहा हो, लेकिन भीतर ही भीतर कई स्तरों पर हलचल तेज है। एक ओर भारतीय जनता पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में “हैट्रिक” के लक्ष्य के साथ व्यापक सदस्यता विस्तार और विपक्ष में सेंधमारी की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय अस्मिता का प्रश्न फिर से राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आता दिख रहा है।
22 मार्च को श्रीनगर गढ़वाल से शुरू होने वाली रैली, फिर हल्द्वानी और देहरादून में प्रस्तावित कार्यक्रम—यह सब चुनाव पूर्व शक्ति प्रदर्शन की कड़ी माने जा रहे हैं। पार्टी का दावा है कि नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में प्रदेश विकास की नई ऊंचाइयों पर है, इसलिए विपक्षी दलों के कार्यकर्ता स्वतः भाजपा का रुख कर रहे हैं।
लेकिन सवाल यह है—क्या राजनीतिक दलों की यह आवक-जावक वास्तविक जनाधार का संकेत है या सिर्फ चुनावी गणित का खेल?
उत्तराखंड क्रांति दल की वापसी: क्षेत्रीय भावना फिर प्रखर
इन सबके बीच सबसे दिलचस्प पहलू है उत्तराखंड क्रांति दल की बढ़ती सक्रियता। लंबे समय तक हाशिए पर रहने के बाद यूकेडी ने संगठनात्मक स्तर पर पुनर्गठन कर कई क्षेत्रों में पकड़ मजबूत की है। राजनीतिक गलियारों में यह अनुमान लगाया जा रहा है कि यदि परिस्थितियाँ अनुकूल रहीं तो दल 12 से अधिक सीटों पर प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा सकता है।
राज्य निर्माण आंदोलन की पृष्ठभूमि से निकला यह दल हमेशा से स्थानीय मुद्दों—भूमि, रोजगार, शिक्षा और सांस्कृतिक पहचान—को प्रमुखता देता रहा है। ऐसे में जब राष्ट्रीय दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता है, तब क्षेत्रीय स्वाभिमान की राजनीति मतदाताओं को आकर्षित कर सकती है।
यूजीसी और स्वर्ण समाज: एकतरफा ध्रुवीकरण का खतरा
इस चुनावी हलचल के बीच एक और मुद्दा तेजी से उभर रहा है—यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) से जुड़े निर्णयों और शिक्षा नीति को लेकर असंतोष। उच्च शिक्षा संस्थानों में नियुक्तियों, आरक्षण व्यवस्था और स्वर्ण समाज की नाराज़गी जैसे प्रश्नों ने एक अलग विमर्श खड़ा कर दिया है।
यदि यह असंतोष संगठित रूप लेता है, तो “रिकॉर्डिंग की तरह एकतरफा वोटिंग” की स्थिति भी बन सकती है—यानी किसी विशेष वर्ग का एकमुश्त झुकाव किसी एक दल की ओर। यह लोकतंत्र के लिए स्वस्थ संकेत नहीं माना जा सकता, क्योंकि इससे मुद्दों की बजाय भावनात्मक ध्रुवीकरण हावी हो जाता है।
यूजीसी से जुड़े विवादों ने पहले भी विश्वविद्यालयों में पारदर्शिता, स्वायत्तता और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल खड़े किए हैं। यदि राज्य सरकार और केंद्र इस पर संतुलित व संवेदनशील रुख नहीं अपनाते, तो इसका राजनीतिक लाभ विपक्ष या क्षेत्रीय दल उठा सकते हैं।
कांग्रेस की चुनौती: क्या वापसी संभव?
दूसरी ओर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी पूरे दमखम के साथ चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। हालांकि पिछले एक दशक में उसे लगातार पराजय का सामना करना पड़ा है, परंतु स्थानीय असंतोष, बेरोजगारी, महंगाई और शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को वह मुख्य हथियार बनाने की कोशिश में है।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठनात्मक मजबूती और विश्वसनीय नेतृत्व की है। यदि वह इन दोनों मोर्चों पर संतुलन साध पाती है, तो मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है।
चुनावी शतरंज: संख्या बनाम संवेदना
भाजपा का 22 लाख सदस्यता का दावा और लगातार चुनावी जीत का रिकॉर्ड निश्चित रूप से उसकी ताकत है। लेकिन उत्तराखंड की राजनीति केवल आंकड़ों से नहीं चलती; यहां भावनात्मक मुद्दे—पलायन, बेरोजगारी, स्थानीय पहचान, भूमि कानून—मतदाताओं को प्रभावित करते हैं।
यदि क्षेत्रीय अस्मिता का सवाल जोर पकड़ता है और यूजीसी जैसे मुद्दों पर व्यापक असंतोष उभरता है, तो चुनावी समीकरण अप्रत्याशित रूप ले सकते हैं।
आखिरकार लोकतंत्र में अंतिम निर्णय मतदाता का होता है—और उत्तराखंड का मतदाता अक्सर शांत रहते हुए भी निर्णायक संदेश देने के लिए जाना जाता है।

भाजपा की सेंधमारी की रणनीति, कांग्रेस की पुनर्संगठन की कोशिशें और उत्तराखंड क्रांति दल का उभार—इन तीनों के बीच आगामी विधानसभा चुनाव दिलचस्प होने के संकेत दे रहे हैं।
यूजीसी और शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर यदि समय रहते पारदर्शी समाधान नहीं निकाला गया, तो यह चुनावी हवा की दिशा बदल सकता है।
अब देखना यह है कि क्या सत्ता का आत्मविश्वास कायम रहता है, या क्षेत्रीय चेतना और वर्गीय असंतोष मिलकर उत्तराखंड की राजनीति में नया अध्याय लिखते हैं।


Spread the love