

उत्तराखंड राज्य का निर्माण केवल प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं था, वह एक भावनात्मक, सांस्कृतिक और अस्तित्व की लड़ाई का परिणाम था। “जय पहाड़, जय पहाड़ी” केवल नारा नहीं—यह उस पीड़ा, उस अस्मिता और उस आत्मसम्मान की आवाज थी जिसने अंततः 9 नवम्बर 2000 को अलग राज्य का सपना साकार किया। इस संघर्ष में अनगिनत लोगों ने लाठियाँ खाईं, गोलियाँ झेलीं, मुकदमे झेले। आप जैसे अनेक आंदोलनकारियों पर केस दर्ज हुए—उधम सिंह नगर से लेकर हरिद्वार तक आवाजें उठीं, और कई साथी आज हमारे बीच भी नहीं रहे।
लेकिन 25 वर्षों बाद प्रश्न वही है—क्या पहाड़ को उसका हक मिला?

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
राज्य की मूल अवधारणा: पहाड़ का विकास, पलायन का अंत
उत्तराखंड की परिकल्पना इस विचार पर आधारित थी कि पहाड़ी क्षेत्रों की भौगोलिक, सांस्कृतिक और आर्थिक चुनौतियाँ अलग हैं। मैदानी मानसिकता से शासन करने पर पहाड़ का भला नहीं होगा। इसलिए राज्य बना—ताकि निर्णय देहरादून से नहीं, पहाड़ की जरूरतों से संचालित हों।
परंतु आज तस्वीर उलट दिखाई देती है। देहरादून सत्ता का केंद्र बन गया है, जबकि सीमांत गांवों की धड़कन कोई सुनने वाला नहीं। गांव खाली हो रहे हैं, खेत बंजर हैं, स्कूलों में ताले हैं, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं।
“जय पहाड़, जय पहाड़ी” का अर्थ था—
स्थानीय युवाओं को रोजगार
पलायन पर रोक
शिक्षा और स्वास्थ्य की सुलभ व्यवस्था
प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय अधिकार
लेकिन आज जनता पूछ रही है—इनमें से कितना हासिल हुआ?
सांस्कृतिक मेले या राजनीतिक मंच?
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा एक के बाद एक सांस्कृतिक मेलों का आयोजन किया गया। हरियाणा, राजस्थान, यूपी और बिहार के कलाकारों ने मंच सजाया। स्थानीय कलाकारों को भी अवसर मिला—यह स्वागतयोग्य है।
परंतु सवाल यह है कि क्या केवल मनोरंजन ही विकास का पैमाना है?
जब गांवों में सड़क धंस रही हो, पहाड़ खिसक रहे हों, आपदा में घर उजड़ रहे हों, तब क्या मंचीय रोशनी उस अंधेरे को ढक सकती है?
मनोरंजन से मन बहल सकता है, लेकिन खाली जेब और टूटी छत का दर्द नहीं मिटता।
आपदा, मुआवजा और आश्वासन
पहाड़ का भूगोल नाजुक है। हर साल भूस्खलन, बादल फटना, सड़क धंसना आम खबर बन चुकी है। हजारों परिवारों की जीवन भर की कमाई आपदा में बह जाती है।
लेकिन अनेक मामलों में पीड़ितों को न मुआवजा मिला, न स्थायी पुनर्वास। केवल सर्वे, केवल आश्वासन।
देहरादून में बैठकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करना आसान है, लेकिन धारचूला, जोशीमठ, पिथौरागढ़, टिहरी या चमोली के गांवों में जाकर सुनना कठिन है।
जब सरकार खनन के लिए केंद्र से प्रमाण पत्र लेकर प्रचार करती है, तब पहाड़ के सीने में गूंजता सवाल है—क्या विकास का मॉडल पहाड़ की कीमत पर बनेगा?
कांग्रेस और भाजपा: 25 साल की राजनीति
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत से लेकर वर्तमान मुख्यमंत्री तक—दोनों राष्ट्रीय दलों ने राज्य पर शासन किया। आरोप-प्रत्यारोप, घोटालों के आरोप, अंदरखाने की नाराजगी—जनता सब देख रही है।
इन 25 वर्षों में यदि किसी का सबसे अधिक विकास हुआ तो वह है—राजनीतिक वर्ग।
विधायक, मंत्री, जनप्रतिनिधि सशक्त हुए।
पर क्या पहाड़ सशक्त हुआ?
युवाओं में बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितता, भर्ती घोटालों की चर्चा—इन सबने भरोसे को चोट पहुंचाई है। यूजीसी और शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी आक्रोश स्पष्ट है, क्योंकि सवाल बच्चों के भविष्य का है।
उत्तराखंड क्रांति दल की वापसी?
ऐसे समय में उत्तराखंड क्रांति दल का नाम फिर चर्चा में है।
25 वर्ष का युवा नेतृत्व—आशीष नेगी जैसे चेहरे—राजनीतिक रूप से उभरते दिखाई दे रहे हैं।
राज्य आंदोलन की मूल भावना को यदि कोई दल सबसे पहले लेकर चला था, तो वह यही दल था। “जय पहाड़, जय पहाड़ी” उसकी आत्मा में था।
यदि 2027 में जनता विकल्प तलाशती है, तो यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं होगा—यह मूल अवधारणा की ओर लौटने का प्रयास होगा।
पहली आकलनों में 12 से अधिक सीटों की संभावना जताई जा रही है। अभी एक वर्ष शेष है—राजनीति में समीकरण तेजी से बदलते हैं।
2027: चुनाव या जनमत संग्रह?
2027 का चुनाव केवल सरकार चुनने का चुनाव नहीं हो सकता।
यह तय करेगा कि—
क्या राज्य अपनी मूल आत्मा की ओर लौटेगा?
क्या पहाड़ को प्राथमिकता मिलेगी?
क्या पलायन पर ठोस नीति बनेगी?
क्या आपदा प्रबंधन केवल कागजों से बाहर आएगा?
यदि भाजपा को जनता कटघरे में खड़ा कर रही है, तो उसे उत्तर देना होगा—
सांस्कृतिक आयोजनों से आगे ठोस आर्थिक मॉडल क्या है?
पहाड़ी जिलों में स्थायी रोजगार योजना क्या है?
खनन नीति का स्थानीय संतुलन क्या है?
निष्कर्ष: नारे की पुनर्परिभाषा
“जय पहाड़, जय पहाड़ी” का अर्थ किसी एक दल का विरोध नहीं—बल्कि पहाड़ के हित में शासन की मांग है।
यह नारा याद दिलाता है कि उत्तराखंड केवल पर्यटन पोस्टर नहीं, बल्कि संघर्षों की भूमि है।
यदि 25 वर्षों बाद भी पहाड़ का दर्द जस का तस है, तो आत्ममंथन आवश्यक है—सरकार के लिए भी और जनता के लिए भी।
2027 की आहट साफ है।
परिवर्तन की संभावना भी।
अब प्रश्न यह है—
क्या उत्तराखंड फिर अपनी जड़ों की ओर लौटेगा?
या फिर मेले की रोशनी में पहाड़ की पीड़ा अनसुनी रह जाएगी?
“जय पहाड़, जय पहाड़ी”—यह नारा फिर गूंज रहा है।
और इस बार यह केवल भावनात्मक उद्घोष नहीं, बल्कि राजनीतिक चेतावनी भी बन सकता है।




