बंगाल मॉडल पर उत्तराखंड में सियासत तेज, राज्य आंदोलनकारियों ने उठाए सवाल?क्या उत्तराखंड बंगाल बनेगा या आंदोलनकारियों के सपनों का राज्य?

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बंगाल मॉडल पर उत्तराखंड में सियासत तेज, राज्य आंदोलनकारियों ने उठाए सवाल
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन द्वारा उत्तराखंड में पश्चिम बंगाल की तर्ज पर जनभागीदारी और वैचारिक आधार पर चुनावी रणनीति अपनाने की बात पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। राज्य आंदोलनकारियों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि उत्तराखंड किसी राजनीतिक प्रयोगशाला नहीं, बल्कि शहीदों और आंदोलनकारियों के संघर्ष से बना राज्य है। उन्होंने सवाल उठाया कि राज्य निर्माण की मूल अवधारणा—रोजगार, पलायन रोकना, पर्वतीय विकास और स्थानीय अधिकार—पर सरकार का ध्यान क्यों नहीं है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड

आंदोलनकारियों ने कहा कि 2027 का चुनाव उत्तराखंड के मूल मुद्दों पर लड़ा जाना चाहिए, न कि बाहरी राजनीतिक मॉडल पर।


भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन द्वारा उत्तराखंड में पश्चिम बंगाल की तर्ज पर वैचारिक और जनभागीदारी आधारित चुनावी मॉडल लागू करने की बात ने एक नया राजनीतिक विमर्श खड़ा कर दिया है। प्रश्न यह है कि क्या उत्तराखंड की जनता अपने राज्य की मूल अवधारणा को भूलकर बाहरी राजनीतिक प्रयोगों की प्रयोगशाला बनने को तैयार है?
उत्तराखंड कोई सामान्य भौगोलिक इकाई नहीं है। यह उन हजारों राज्य आंदोलनकारियों के संघर्ष, बलिदान और सपनों का परिणाम है जिन्होंने पृथक राज्य के लिए वर्षों तक आंदोलन किया। यह वही धरती है जहां मातृशक्ति ने सड़कों पर उतरकर संघर्ष किया, जहां युवाओं ने लाठियां खाईं, जेल गए और अनेक आंदोलनकारियों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
राज्य निर्माण आंदोलन के पुरोधा स्वर्गीय इंद्रमणि बडोनी ने जिस उत्तराखंड की कल्पना की थी, वह स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय लोगों के अधिकार, पलायन रोकने, रोजगार सृजन, पर्वतीय विकास और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा पर आधारित था। लेकिन आज सवाल उठ रहा है कि क्या उत्तराखंड की राजनीति इन मूल उद्देश्यों से भटक रही है?
नितिन नवीन ने बंगाल मॉडल का उल्लेख करते हुए कार्यकर्ताओं से मतदाताओं को वैचारिक लड़ाई का सहभागी बनाने की बात कही। लेकिन उत्तराखंड के बुद्धिजीवी और राज्य आंदोलनकारी पूछ रहे हैं कि क्या यहां की सबसे बड़ी वैचारिक लड़ाई बेरोजगारी, पलायन, बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, कृषि संकट और पर्वतीय क्षेत्रों के खाली होते गांव नहीं हैं?
देश की सीमाओं पर अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर सैनिकों की इस भूमि ने हमेशा राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा है। उत्तराखंड का शायद ही कोई परिवार होगा जिसका कोई सदस्य सेना में न रहा हो। ऐसे प्रदेश को राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाने से पहले क्या सरकार को यह नहीं बताना चाहिए कि राज्य निर्माण के मूल उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उसने अब तक क्या किया?
आज भी हजारों गांव पलायन की मार झेल रहे हैं। युवा रोजगार की तलाश में मैदानों और महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। राज्य आंदोलनकारियों और शहीदों के सपनों का उत्तराखंड आखिर कब बनेगा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल की परिस्थितियां और उत्तराखंड की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना पूरी तरह अलग हैं। ऐसे में बंगाल मॉडल का प्रयोग यहां लागू करने की बजाय सरकार को उत्तराखंड मॉडल विकसित करना चाहिए, जो राज्य आंदोलन की मूल भावना और जनता की वास्तविक समस्याओं पर आधारित हो।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या 2027 का चुनाव उत्तराखंड के मूल मुद्दों पर लड़ा जाएगा या फिर वैचारिक ध्रुवीकरण और राजनीतिक प्रयोगों के सहारे जनता का ध्यान मूल समस्याओं से हटाने का प्रयास होगा?
उत्तराखंड की जनता आज जवाब चाहती है—राज्य आंदोलन के शहीदों के सपनों का क्या हुआ? पलायन कब रुकेगा? स्थानीय युवाओं को रोजगार कब मिलेगा? पर्वतीय क्षेत्रों का विकास कब होगा?
क्योंकि उत्तराखंड किसी राजनीतिक प्रयोगशाला का नाम नहीं, बल्कि संघर्ष, बलिदान और स्वाभिमान की वह धरती है जिसे उसके शहीदों ने अपने रक्त से सींचा है।
यह लेख/खबर सरकार और भाजपा की राजनीतिक रणनीति पर सवाल उठाते हुए उत्तराखंड राज्य आंदोलन की मूल अवधारणा, शहीद आंदोलनकारियों, वीर सैनिकों और जनभावनाओं को केंद्र में रखता है।


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