

उत्तराखंड राज्य बने हुए 25 साल पूरे होने को हैं। इस राज्य की कल्पना उस समय की गई थी जब पहाड़ के लोग बेहतर शिक्षा, पारदर्शी प्रशासन और ईमानदार व्यवस्था की उम्मीद कर रहे थे। लेकिन आज जब उत्तराखंड बोर्ड की परीक्षाओं में “मुन्नाभाई” और नकलचियों की खबरें सामने आती हैं, तो यह सवाल उठना लाजिमी हो जाता है कि क्या यही वह उत्तराखंड है जिसकी कल्पना राज्य आंदोलनकारियों ने की थी?

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
21 फरवरी से शुरू हुई उत्तराखंड बोर्ड परीक्षाओं के दौरान अब तक 10 मुन्नाभाई पकड़े जा चुके हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इन सभी का कनेक्शन हरिद्वार जिले से सामने आया है और इनमें 4 लड़कियां भी शामिल हैं। इससे भी ज्यादा हैरान करने वाला तथ्य यह है कि जिन जिलों से पहले सरकारी भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, सॉल्वर गैंग और दलालों के नेटवर्क का खुलासा हुआ था, वहीं अब बोर्ड परीक्षाओं में भी नकल का जाल फैलता दिखाई दे रहा है।
सरकार ने कड़े नकल विरोधी कानून बनाए हैं। कागजों में इन कानूनों की सख्ती इतनी है कि कोई भी छात्र या नकल गिरोह परीक्षा में गड़बड़ी करने से पहले सौ बार सोचे। लेकिन जमीन पर हकीकत बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है। यदि कानून इतना प्रभावी होता तो फिर बोर्ड परीक्षाओं में मुन्नाभाई कैसे पकड़ में आते?
सबसे ज्यादा चौंकाने वाला मामला हरिद्वार के सावित्री निकेतन परीक्षा केंद्र से सामने आया है, जहां से अकेले 8 मुन्नाभाई पकड़े गए हैं। अब शिक्षा विभाग इस सेंटर को डिबार करने की तैयारी कर रहा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ एक सेंटर को डिबार कर देने से समस्या खत्म हो जाएगी? या फिर यह नकल माफिया की जड़ें शिक्षा व्यवस्था के अंदर तक फैल चुकी हैं?
असल समस्या सिर्फ छात्रों की नहीं है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह सब बिना किसी मिलीभगत के संभव है? क्या किसी परीक्षा केंद्र में बार-बार मुन्नाभाई पकड़े जाना केवल संयोग है? या फिर इसके पीछे शिक्षा विभाग के कुछ अधिकारी, स्कूल प्रबंधन और कुछ शिक्षक भी शामिल हो सकते हैं?
उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों में सरकारी भर्ती परीक्षाओं में जिस तरह से पेपर लीक और सॉल्वर गैंग का खुलासा हुआ, उसने पूरे राज्य को शर्मसार किया था। उस समय सरकार ने दावा किया था कि नकल माफियाओं पर सख्त कार्रवाई की जाएगी और भविष्य में ऐसी घटनाएं नहीं होंगी। लेकिन अब बोर्ड परीक्षाओं में मुन्नाभाई का पकड़ा जाना इस दावे पर सवाल खड़े कर रहा है।
यह भी सच है कि शिक्षा मंत्री लगातार यह दावा कर रहे हैं कि बोर्ड परीक्षाएं पूरी तरह साफ-सुथरे तरीके से कराई जा रही हैं। लेकिन अगर वास्तव में सब कुछ पारदर्शी होता, तो फिर 10 दिनों के भीतर 10 मुन्नाभाई पकड़े जाने की नौबत ही क्यों आती?
यह भी संभव है कि यह केवल वे मामले हैं जो पकड़ में आ गए। लेकिन यह भी सोचने वाली बात है कि न जाने कितने स्कूलों और परीक्षा केंद्रों में इसी तरह का धंधा चल रहा होगा, जो अभी तक सामने नहीं आया है।
उत्तराखंड के युवाओं के साथ यह सबसे बड़ा अन्याय है। एक तरफ मेहनत करने वाले छात्र दिन-रात पढ़ाई करते हैं, दूसरी तरफ नकल माफिया पैसे लेकर फर्जी परीक्षार्थी बैठाकर सिस्टम का मजाक बना देते हैं। इससे न सिर्फ मेहनती छात्रों का मनोबल टूटता है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था पर भी लोगों का भरोसा खत्म होने लगता है।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन केवल एक प्रशासनिक राज्य बनाने के लिए नहीं था। यह आंदोलन एक बेहतर समाज, बेहतर शिक्षा और ईमानदार व्यवस्था के लिए लड़ा गया था। लेकिन आज जब शिक्षा व्यवस्था में ही नकल माफिया हावी दिखाई देते हैं, तो यह राज्य आंदोलन की मूल भावना के बिल्कुल विपरीत है।
धामी सरकार ने नकल माफियाओं के खिलाफ कई सख्त कदम उठाने का दावा किया है, लेकिन जमीनी स्तर पर अगर ऐसी घटनाएं लगातार सामने आती रहेंगी तो यह कहना गलत नहीं होगा कि सरकार का फार्मूला कहीं न कहीं फेल होता दिखाई दे रहा है।
अब जरूरत केवल कानून बनाने की नहीं है, बल्कि उस कानून को सख्ती से लागू करने की है। परीक्षा केंद्रों की जवाबदेही तय करनी होगी। जिन स्कूलों और अधिकारियों की मिलीभगत सामने आए, उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई करनी होगी।
अगर ऐसा नहीं किया गया तो नकल माफिया का यह नेटवर्क और मजबूत होता जाएगा, और एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब मेहनत और ईमानदारी से पढ़ने वाले छात्र खुद को इस सिस्टम में ठगा हुआ महसूस करेंगे।
उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था को बचाने के लिए अब केवल बयानबाजी नहीं, बल्कि कड़ी कार्रवाई की जरूरत है। क्योंकि अगर शिक्षा ही कमजोर हो गई, तो फिर उत्तराखंड के उज्ज्वल भविष्य की कल्पना करना भी मुश्किल हो जाएगा।




