विश्व पर्यावरण दिवस विशेष: विकास की अंधी दौड़ में कंक्रीट का जंगल बनता उत्तराखंड- अवतार सिंह बिष्ट

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5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर देशभर में पौधारोपण कार्यक्रम आयोजित होते हैं, सरकारी दफ्तरों से लेकर विद्यालयों तक हर जगह पर्यावरण संरक्षण की बातें होती हैं। नेता पौधे लगाते हैं, अधिकारी फोटो खिंचवाते हैं, सामाजिक संगठन अभियान चलाते हैं और सोशल मीडिया पर हरियाली बचाने के संदेशों की बाढ़ आ जाती है। अगले दिन अखबारों के पन्ने वृक्षारोपण की तस्वीरों से भर जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या वास्तव में पर्यावरण संरक्षण केवल एक दिन की रस्म अदायगी से संभव है?
यदि इस प्रश्न का उत्तर उत्तराखंड के संदर्भ में तलाशा जाए तो तस्वीर बेहद चिंताजनक दिखाई देती है। देवभूमि उत्तराखंड, जिसे कभी हिमालय की गोद में बसे घने जंगलों, स्वच्छ नदियों, निर्मल वातावरण और जैव विविधता के लिए जाना जाता था, आज विकास और पर्यटन के नाम पर तेजी से कंक्रीट के जंगल में बदलता जा रहा है। जिस राज्य की पहचान प्रकृति थी, वही राज्य अब प्रकृति के अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है।
विकास की कीमत पर पर्यावरण का विनाश
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद विकास की नई अवधारणा सामने आई। चौड़ी सड़कें, बड़े होटल, बहुमंजिला भवन, नए शहर, चारधाम परियोजनाएं, जलविद्युत परियोजनाएं और पर्यटन विस्तार को विकास का पैमाना माना गया। विकास आवश्यक है, लेकिन जब विकास प्रकृति की क्षमता और सीमाओं की अनदेखी करके किया जाए तो उसका परिणाम विनाश के रूप में सामने आता है।
पिछले दो दशकों में उत्तराखंड के पहाड़ों को जिस तरह काटा गया है, उसने हिमालय की प्राकृतिक संरचना को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। पहाड़ों को विस्फोटकों से उड़ाकर चौड़ी सड़कें बनाई जा रही हैं। नदी किनारों पर निर्माण हो रहे हैं। जंगलों की जगह रिसॉर्ट और होटल खड़े हो रहे हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में कंक्रीट का दबाव इतना बढ़ गया है कि प्राकृतिक जलस्रोत तक सूखने लगे हैं।
जो पहाड़ हजारों वर्षों से स्थिर खड़े थे, वे अब हर मानसून में दरक रहे हैं। जगह-जगह भूस्खलन हो रहे हैं। सड़कें बह रही हैं। गांव खतरे में हैं। इसके बावजूद विकास के नाम पर पर्यावरणीय चिंताओं को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
पर्यटन: वरदान या अभिशाप?
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में पर्यटन की महत्वपूर्ण भूमिका है। हर साल करोड़ों श्रद्धालु और पर्यटक राज्य में आते हैं। पर्यटन रोजगार देता है, व्यापार बढ़ाता है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करता है। लेकिन अनियंत्रित पर्यटन अब पर्यावरण के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है।
दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश से हजारों वाहन रोज पहाड़ों की ओर बढ़ते हैं। अधिकांश लोग अपनी कारों में “टंकी फुल” कर निकलते हैं और फिर पहाड़ों की घाटियों में धुआं छोड़ते हुए घूमते हैं। कभी स्वच्छ हवा के लिए पहचाने जाने वाले नैनीताल, मसूरी, रानीखेत, मुक्तेश्वर और औली जैसे पर्यटन स्थलों पर अब ट्रैफिक जाम और प्रदूषण आम बात हो गई है।
गर्मी के मौसम में नैनीताल और मसूरी में वाहनों की लंबी कतारें यह बताती हैं कि पर्यटन प्रबंधन की स्थिति कितनी गंभीर है। पहाड़ों की संकरी सड़कों पर घंटों जाम लगता है और हजारों वाहन लगातार कार्बन उत्सर्जन करते रहते हैं।
विडंबना यह है कि लोग स्वच्छ वातावरण की तलाश में पहाड़ों पर आते हैं और अनजाने में उसी वातावरण को प्रदूषित कर वापस लौट जाते हैं।
कचरे का पहाड़ बनता पहाड़
आज उत्तराखंड का शायद ही कोई प्रमुख पर्यटन स्थल ऐसा हो जहां प्लास्टिक की बोतलें, चिप्स के पैकेट, पॉलीथिन और अन्य ठोस कचरा न दिखाई देता हो।
नैनीताल झील हो, टिहरी झील हो, केदारनाथ यात्रा मार्ग हो, हेमकुंड साहिब का क्षेत्र हो या फिर फूलों की घाटी—हर जगह पर्यटकों द्वारा छोड़ा गया कचरा पर्यावरण के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है।
कई पर्वतीय क्षेत्रों में कूड़ा निस्तारण की स्थायी व्यवस्था नहीं है। परिणामस्वरूप कचरा या तो जंगलों में फेंका जाता है या फिर नदी-नालों में बहा दिया जाता है।
एक समय था जब हिमालयी क्षेत्रों का पानी सीधे स्रोतों से पीने योग्य माना जाता था। आज अनेक स्थानों पर जल स्रोत प्लास्टिक और अन्य प्रदूषकों से प्रभावित हो रहे हैं।
जंगलों में बढ़ती आग और बदलता जलवायु चक्र
उत्तराखंड में हर वर्ष जंगलों की आग एक बड़ी त्रासदी बनकर सामने आती है। हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र आग की चपेट में आ जाते हैं। करोड़ों रुपये की वन सम्पदा नष्ट होती है। वन्यजीव मारे जाते हैं। मिट्टी की उर्वरता समाप्त होती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान और मानवीय गतिविधियां जंगलों की आग को और भयावह बना रही हैं।
पिछले वर्षों में उत्तराखंड ने रिकॉर्ड तापमान, अनियमित वर्षा, बादल फटने की घटनाएं और असामान्य मौसम परिवर्तन देखे हैं। यह केवल प्राकृतिक बदलाव नहीं हैं बल्कि पर्यावरणीय असंतुलन के संकेत हैं।
नदियों का बदलता स्वरूप
गंगा और यमुना जैसी जीवनदायिनी नदियों का उद्गम उत्तराखंड में है। लेकिन इन्हीं नदियों के किनारे बढ़ते अतिक्रमण, निर्माण और प्रदूषण चिंता का विषय हैं।
नदियों को केवल जलधारा नहीं बल्कि संसाधन के रूप में देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है। नदी तटों पर निर्माण, खनन और अवैज्ञानिक हस्तक्षेपों ने उनके प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित किया है।
हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि हिमालयी ग्लेशियरों का सिकुड़ना भविष्य में जल संकट को जन्म दे सकता है।
चारधाम परियोजना और पर्यावरणीय प्रश्न
चारधाम यात्रा उत्तराखंड की आस्था और अर्थव्यवस्था दोनों से जुड़ी है। लेकिन सड़क चौड़ीकरण और निर्माण कार्यों के दौरान बड़े पैमाने पर पहाड़ों की कटाई ने कई पर्यावरणीय सवाल खड़े किए हैं।
विशेषज्ञ लंबे समय से कह रहे हैं कि हिमालय युवा और संवेदनशील पर्वत श्रृंखला है। यहां किसी भी निर्माण गतिविधि को अत्यंत सावधानी के साथ किया जाना चाहिए।
हालांकि सरकारें विकास और सुविधा को प्राथमिकता देती हैं, लेकिन यदि पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ता है तो भविष्य में इसकी कीमत कहीं अधिक चुकानी पड़ सकती है।
सोशल मीडिया वाला पर्यावरण प्रेम
विश्व पर्यावरण दिवस पर नेताओं, अभिनेताओं, अधिकारियों और सामाजिक संगठनों की गतिविधियां देखते ही बनती हैं। पौधे लगाए जाते हैं, फोटो खिंचवाई जाती हैं और सोशल मीडिया पर पोस्ट साझा की जाती हैं।
लेकिन क्या इन पौधों की देखभाल होती है?
कितने पौधे एक वर्ष बाद जीवित रहते हैं?
कितने विभाग यह बताने को तैयार हैं कि पिछले पांच वर्षों में लगाए गए पौधों में से कितने आज वृक्ष बन चुके हैं?
वास्तविकता यह है कि अधिकांश पौधारोपण अभियान फोटो अवसर बनकर रह जाते हैं। पौधों की सुरक्षा, सिंचाई और निगरानी पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता।
पर्यावरण संरक्षण केवल पौधे लगाने का नाम नहीं है। यह जीवनशैली में बदलाव, संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का विषय है।
पलायन और पर्यावरण
उत्तराखंड का एक बड़ा संकट पलायन भी है। हजारों गांव खाली हो चुके हैं। खेती बंजर हो रही है। पारंपरिक जल स्रोत और कृषि प्रणालियां समाप्त हो रही हैं।
विडंबना यह है कि जिन गांवों में कभी प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग होता था, वहां अब सन्नाटा पसरा है। दूसरी ओर शहरों और पर्यटन स्थलों पर जनसंख्या का दबाव लगातार बढ़ रहा है।
यह असंतुलन भी पर्यावरणीय संकट को बढ़ा रहा है।
क्या केवल सरकार जिम्मेदार है?
पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों का दायित्व नहीं है। समाज, उद्योग, पर्यटक और आम नागरिक भी समान रूप से जिम्मेदार हैं।
जब हम प्लास्टिक का उपयोग करते हैं, जब जंगल में कचरा फेंकते हैं, जब अनावश्यक वाहन उपयोग करते हैं, जब जल स्रोतों को प्रदूषित करते हैं, तब हम भी पर्यावरणीय संकट को बढ़ाने में योगदान देते हैं।
पर्यावरण संरक्षण के लिए सामूहिक जिम्मेदारी की भावना विकसित करनी होगी।
उत्तराखंड के लिए जरूरी कदम
पर्यटन स्थलों की वहन क्षमता निर्धारित की जाए।
प्लास्टिक मुक्त पर्यटन नीति को सख्ती से लागू किया जाए।
पर्वतीय क्षेत्रों में निर्माण कार्यों के लिए वैज्ञानिक मानक अनिवार्य किए जाएं।
स्थानीय प्रजातियों के वृक्षारोपण को प्राथमिकता दी जाए।
जल स्रोतों के संरक्षण के लिए विशेष अभियान चलाए जाएं।
जंगलों की आग रोकने के लिए आधुनिक तकनीक और सामुदायिक सहभागिता बढ़ाई जाए।
सार्वजनिक परिवहन को मजबूत बनाया जाए ताकि निजी वाहनों पर निर्भरता कम हो।
पर्यावरण शिक्षा को व्यवहारिक रूप में लागू किया जाए।

विश्व पर्यावरण दिवस पर साइकिल से नगर निगम पहुंचे डॉ. ललित मोहन उप्रेती, दिया पर्यावरण संरक्षण का संदेश,रुद्रपुर। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर जहां नगर निगम परिसर में लग्जरी वाहनों की आवाजाही सामान्य दिनों की तरह जारी रही, वहीं पूर्व स्वास्थ्य निदेशक डॉ. ललित मोहन उप्रेती अपनी साइकिल से नगर निगम पहुंचे। उनकी सादगी और पर्यावरण के प्रति जागरूकता ने सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स की टीम की नजर जब साइकिल से पहुंचे डॉ. उप्रेती पर पड़ी तो उनसे इसके पीछे का कारण पूछा गया। इस पर उन्होंने सहज भाव से कहा, “आज विश्व पर्यावरण दिवस है। यदि हम वास्तव में पर्यावरण संरक्षण का संदेश देना चाहते हैं तो इसकी शुरुआत स्वयं से करनी होगी। छोटी-छोटी आदतें भी बड़ा बदलाव ला सकती हैं।”
उन्होंने कहा कि वाहनों के अत्यधिक उपयोग से बढ़ते प्रदूषण को कम करने के लिए लोगों को समय-समय पर साइकिल और पैदल चलने जैसी स्वस्थ एवं पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली अपनानी चाहिए। उनका यह प्रयास विश्व पर्यावरण दिवस पर एक सार्थक संदेश बनकर सामने आया।


विश्व पर्यावरण दिवस केवल भाषणों, नारों और पौधारोपण कार्यक्रमों का दिन नहीं होना चाहिए। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्य के लिए यह आत्ममंथन का अवसर है। यदि विकास की वर्तमान दिशा बिना पर्यावरणीय संतुलन के जारी रही तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।
देवभूमि की पहचान उसके जंगल, नदियां, हिमालय, जैव विविधता और स्वच्छ वातावरण हैं। यदि यही समाप्त हो गया तो फिर उत्तराखंड केवल नक्शे पर एक राज्य रह जाएगा, प्रकृति की वह अद्भुत धरोहर नहीं जिसके लिए पूरी दुनिया उसे जानती है।
आज आवश्यकता केवल पौधे लगाने की नहीं, बल्कि पेड़ों को बचाने की है। केवल पर्यावरण दिवस मनाने की नहीं, बल्कि पर्यावरण को जीवन का हिस्सा बनाने की है। यदि हमने अब भी प्रकृति की चेतावनियों को नहीं समझा तो विकास की यह अंधी दौड़ हमें ऐसे मोड़ पर ले जाएगी जहां से लौटना संभव नहीं होगा।


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