

एक डिस्ट्रेस मैसेज भी सामने आया है जिसने गोलीबारी की घटना की असल वजह बता दी है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड) रही थी।
एनसीबी न्यूज के मुताबिक भारतीय जहाज पर मौजूद एक क्रू मेंबर ने कहा था- आपने हमें आगे बढ़ने की अनुमति दी थी और अब आप हम पर फायरिंग कर रहे हैं, मुझे पीछे मुड़ने दीजिए। एक वीडियो फुटेज सामने आया है जिससे पता चलता है कि ‘सैनमार हेराल्ड’ जहाज़ ग्रीन एरिया में आगे बढ़ रहा था। फिर अचानक से जहाज ने अपना Automatic Identification System (AIS) बंद कर दिया। जब सिग्नल फिर बहाल हुए तो जहाज पश्चिमी दिशा की ओर बढ़ चुका था।
गोली किसने चलाई थी?
जिस क्षेत्र में गोलीबारी की यह घटना हुई है, वो पश्चिम एशिया युद्ध की वजह से काफी संवेदनशील बन चुका है, यहां पर सबसे ज्यादा नौसिक गतिविधियां देखने को मिल रही हैं। अभी तक स्पष्ट नहीं है कि गोली किसने चलाई थी और क्या सीधे जहाजों को निशाने पर लिया गया या नहीं। एक टैंकर कप्तान ने जरूर ऐसा दावा किया है कि फायरिंग की यह घटना ईरान इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स द्वारा की गई थी। वहीं ईरानी मीडिया का कहना है कि गोली सिर्फ इसलिए चलाई गई थी क्योंकि जहाज ने अपना डायरेक्शन बदल लिया था।
एनबीसी ने अनुसार भारतीय अधिकारी इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि उन्हें जानबूझकर टारगेट पर नहीं लिया गया था, वहीं जहाज को भी कोई नुकसान नहीं पहुंचा।
भारत की प्रतिक्रिया
भारत के विदेश सचिव ने अपने बयान में कहा कि ईरान के राजदूत के साथ हुई बैठक के दौरान विदेश सचिव ने सुबह होर्मुज जलडमरूमध्य में भारतीय ध्वज वाले दो जहाजों से जुड़ी गोलीबारी की घटना पर भारत की गहरी चिंता व्यक्त की। इसके साथ ही भारतीय विदेश सचिव ने व्यापारिक जहाजों और नाविकों की सुरक्षा को भारत द्वारा दिए जाने वाले महत्व को रेखांकित किया और याद दिलाया कि ईरान ने पहले भी भारत जाने वाले कई जहाजों के सुरक्षित मार्ग को सुगम बनाया था।
CNN-न्यूज18 को भारतीय खुफिया सूत्रों ने बताया, भारतीय टैंकरों के पास हुई ‘वॉर्निंग फायरिंग’ दरअसल ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची की कूटनीतिक लाइन के खिलाफ सेना की सीधी चुनौती थी. बताया जा रहा है कि ईरान के भीतर इस वक्त सत्ता का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है. US-इजरायल हमले में सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत के बाद वहां एक बड़ा नेतृत्व शून्य पैदा हो गया है, जिससे पूरा सिस्टम अस्थिर हो गया है.
सेना अपने ही विदेश मंत्रालय के खिलाफ क्यों?
इसी अस्थिरता के बीच ईरान की सबसे ताकतवर सैन्य संस्था IRGC और विदेश मंत्रालय आमने-सामने आ गए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, IRGC प्रमुख अहमद वहिदी और उनकी टीम को लगता है कि विदेश मंत्री अराघची पश्चिमी देशों के साथ बातचीत में ‘जरूरत से ज्यादा नरम’ रुख अपना रहे हैं. IRGC का मानना है कि परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल सिस्टम और हिजबुल्लाह-हमास जैसे संगठनों से जुड़े फैसलों में कूटनीतिक नरमी देश के हितों के खिलाफ है. यही वजह है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने को लेकर विदेश मंत्रालय की लाइन को सेना ने खुले तौर पर चुनौती दी. IRGC से जुड़े मीडिया प्लेटफॉर्म ने भी अराघची के बयान की आलोचना की और इसे ‘खतरनाक झुकाव’ बताया. इस आंतरिक टकराव का सबसे बड़ा असर इस्लामाबाद में चल रही अमेरिका-ईरान बातचीत पर भी दिखा है.
IRGC के नाराजगी की क्या है असल वजह?
जानकारी के मुताबिक, IRGC चाहता है कि उसके करीबी अधिकारी मोहम्मद-बाकर जोलगदर को शांति से जुड़ी बातचीत टीम में शामिल किया जाए, ताकि पूरी वार्ता पर उसका सीधा नियंत्रण रहे. लेकिन विदेश मंत्री अराघची ने इसका विरोध किया है, यह कहते हुए कि जोलगदर के पास बातचीत का अनुभव नहीं है. इस खींचतान ने इस्लामाबाद की बातचीत को एक ‘तीन तरफा जंग’ बना दिया है- एक तरफ ईरानी कूटनीतिज्ञ, दूसरी तरफ IRGC के हार्डलाइनर और तीसरी तरफ बाहरी मध्यस्थ.
ईरानी सेना क्यों है परेशान?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, खामेनेई के बाद बने इस सत्ता शून्य ने IRGC को और ज्यादा आक्रामक बना दिया है. उसे डर है कि अगर कूटनीतिक समझौता हो गया तो उसकी ताकत और फंडिंग कमजोर हो सकती है. इसी वजह से होर्मुज जैसे रणनीतिक इलाके पर उसका नियंत्रण और सख्त हो गया है. इसका सीधा असर भारत समेत पूरी दुनिया पर पड़ सकता है. अब ईरान एकजुट फैसले लेने वाला देश नहीं रह गया है, बल्कि वहां अलग-अलग ताकतें अलग-अलग दिशा में खींच रही हैं. ऐसे में कोई भी कूटनीतिक वादा जमीनी स्तर पर सैन्य कार्रवाई से पलट सकता है.




