

रुद्रपुर में गुरुवार रात घटी फायरिंग की घटना केवल एक आपराधिक वारदात भर नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक और प्रशासनिक ढांचे की कमजोरियों की ओर इशारा करती है जो धीरे-धीरे शहर को अपराध की ओर धकेल रही हैं। वार्ड-32 भूरारानी निवासी राकेश साहनी की कार पर बाइक सवार युवकों द्वारा किया गया हमला इस बात का संकेत है कि शहर में अपराध का साहस बढ़ रहा है। भले ही इस घटना में कोई हताहत नहीं हुआ, लेकिन गोली का कार के शीशे को चीरते हुए अंदर तक पहुंच जाना इस बात का प्रमाण है कि अपराधियों के हौसले कितने बुलंद हो चुके हैं।
सवाल यह नहीं है कि इस घटना के आरोपी कौन हैं और पुलिस उन्हें कब गिरफ्तार करेगी। असली सवाल यह है कि आखिर ऐसी घटनाओं की जमीन तैयार किसने की? यदि गहराई से देखा जाए तो इसका उत्तर केवल अपराधियों में नहीं, बल्कि उस राजनीतिक और सामाजिक संरचना में छिपा है जिसने वर्षों से रुद्रपुर की जमीन पर अव्यवस्था को पनपने दिया।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
पिछले दो दशकों में रुद्रपुर का विस्तार तेजी से हुआ है। उद्योगों के विकास के साथ-साथ यहां आबादी भी तेजी से बढ़ी। लेकिन इस बढ़ती आबादी के साथ शहर की योजना, कानून व्यवस्था और सामाजिक संतुलन को संभालने की तैयारी उतनी मजबूत नहीं रही। नदी-नालों के किनारे अवैध अतिक्रमण, सरकारी जमीनों पर बसती झुग्गी-झोपड़ियां, और बिना किसी योजना के फैलती बस्तियां धीरे-धीरे अपराध के लिए उपजाऊ जमीन बनती गईं।
यहां यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि हर गरीब या प्रवासी व्यक्ति अपराधी नहीं होता। लेकिन जब शहर में अवैध बसावट बिना किसी पहचान, बिना किसी रिकॉर्ड और बिना किसी प्रशासनिक निगरानी के बढ़ती है, तो अपराधियों को छिपने और पनपने का अवसर जरूर मिलता है। यही कारण है कि समय के साथ-साथ नशे का कारोबार, रंगदारी, चोरी और हिंसक घटनाओं में वृद्धि देखी जा रही है।
रुद्रपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में नशे का नेटवर्क भी तेजी से फैल रहा है। युवा पीढ़ी का एक वर्ग नशे की गिरफ्त में आ चुका है। जब नशा और बेरोजगारी एक साथ मिलते हैं, तो अपराध का रास्ता खुल जाता है। छोटी-मोटी झड़पें धीरे-धीरे हथियारों तक पहुंच जाती हैं। गुरुवार रात की फायरिंग उसी खतरनाक प्रवृत्ति का एक उदाहरण है।
इस पूरी स्थिति में पुलिस को दोषी ठहराना आसान है, लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है। पुलिस तब सक्रिय होती है जब अपराध घटित हो चुका होता है। लेकिन अपराध की जमीन तैयार होने से पहले उसे रोकना समाज और राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी होती है। दुर्भाग्य से रुद्रपुर की राजनीति लंबे समय से वोट बैंक की गणित में उलझी रही है।
कई जनप्रतिनिधियों पर यह आरोप लगता रहा है कि उन्होंने नदी-नालों के किनारे बस रही अवैध बस्तियों और अतिक्रमण को रोकने के बजाय मौन सहमति दी। चुनावों के दौरान इन बस्तियों को वोट बैंक के रूप में देखा गया। नतीजा यह हुआ कि शहर का मूल स्वरूप धीरे-धीरे अव्यवस्थित होता चला गया।
आज जो अपराध हमें छोटे-छोटे रूपों में दिखाई दे रहे हैं—जैसे फायरिंग, रंगदारी, मारपीट या नशे से जुड़ी घटनाएं—वे आने वाले समय में कहीं बड़े संकट का संकेत भी हो सकते हैं। यदि स्थिति को समय रहते नहीं संभाला गया तो आने वाले दस से बीस वर्षों में रुद्रपुर का सामाजिक ताना-बाना गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यदि अवैध अतिक्रमण, नशे का कारोबार और बिना योजना के फैलती बस्तियों पर अभी नियंत्रण नहीं किया गया, तो भविष्य में हत्या, लूट, बलात्कार और गैंगवार जैसी घटनाएं भी बढ़ सकती हैं। शहरों का अपराध अचानक नहीं बढ़ता, वह धीरे-धीरे सामाजिक ढांचे की कमजोरियों से जन्म लेता है।
रुद्रपुर को अभी भी संभाला जा सकता है। इसके लिए सबसे पहले राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। जनप्रतिनिधियों को वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर शहर के भविष्य के बारे में सोचना होगा। अवैध अतिक्रमणों पर सख्ती, नशे के नेटवर्क पर व्यापक कार्रवाई और शहरी योजना को मजबूत करना आवश्यक है।
इसके साथ-साथ समाज को भी आत्ममंथन करना होगा। यदि हम केवल घटना होने के बाद शोर मचाते रहेंगे और उसके मूल कारणों को नजरअंदाज करेंगे, तो आने वाला समय और भी चुनौतीपूर्ण होगा।
रुद्रपुर की यह फायरिंग की घटना एक चेतावनी है—एक ऐसी चेतावनी जिसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। अगर अभी भी आंखें बंद रखी गईं, तो आने वाले वर्षों में यह शहर अपराध की उस राह पर जा सकता है जहां से वापस लौटना बेहद कठिन




