

उत्तराखंड,मध्य-पूर्व में बढ़ते युद्ध के बाद भारत में ईंधन संकट की आशंकाएं एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई हैं। सरकार ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कई एहतियाती कदम उठाए हैं—रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने का आदेश दिया गया है, घरेलू सिलेंडरों की सप्लाई को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए गए हैं और आवश्यक सेवाओं को निर्बाध गैस आपूर्ति सुनिश्चित करने की बात कही गई है। साथ ही गैस सिलेंडर की बुकिंग के लिए 25 दिन का नियम फिर लागू कर दिया गया है ताकि जमाखोरी और कालाबाजारी को रोका जा सके।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
भारत में अचानक गैस सिलेंडरों की भारी किल्लत शुरू हो गई है, जिसके बाद केंद्र सरकार ने आनन-फानन में ‘एस्मा’ (ESMA) लागू कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस गंभीर स्थिति को देखते हुए एक हाई-लेवल इमरजेंसी मीटिंग बुलाई, जिसमें पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी मौजूद थे। यह संकट इतना बड़ा है कि अगर जल्द ही समाधान नहीं निकला, तो देश के चूल्हे ठप पड़ सकते हैं।
ईरान-इजरायल युद्ध ने बिगाड़ा खेल, ठप पड़ी सप्लाई
इस संकट की असली जड़ सात समंदर पार मिडिल ईस्ट में मचे घमासान में छिपी है। ईरान पर अमेरिका और इजरायल के भीषण हमलों के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को बंद कर दिया है। आपको बता दें कि यह वही समुद्री रास्ता है जहां से भारत को मिलने वाली ज्यादातर गैस और तेल की सप्लाई आती है। चूंकि यह रास्ता पूरी तरह बाधित हो चुका है, इसलिए सऊदी अरब से आने वाले गैस टैंकर बीच समंदर में फंस गए हैं। भारत अपनी जरूरत का करीब 62 फीसदी एलपीजी आयात करता है और सऊदी अरब हमारा सबसे बड़ा पार्टनर है। ऐसे में सप्लाई लाइन कटने से देश में हाहाकार मचने की नौबत आ गई है।
सरकार का बड़ा फैसला
प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में हुई बैठक में यह तय किया गया है कि चाहे कुछ भी हो जाए, आम आदमी की रसोई का बजट और सप्लाई प्रभावित नहीं होनी चाहिए। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने गैस की सप्लाई का वर्गीकरण कर दिया है। अब उपलब्ध गैस का सबसे बड़ा हिस्सा घरेलू सिलेंडरों के लिए सुरक्षित रखा जाएगा। लेकिन इसकी भारी कीमत औद्योगिक यूनिट्स और होटल इंडस्ट्री को चुकानी पड़ रही है। फैक्ट्रियों को दी जाने वाली गैस सप्लाई में भारी कटौती कर दी गई है और कॉमर्शियल सिलेंडरों की बुकिंग भी सीमित कर दी गई है। इससे होटल और रेस्तरां मालिकों में भारी गुस्सा है, क्योंकि उन्हें डर है कि गैस न मिलने से उनका कारोबार पूरी तरह बंद हो सकता है।
ESMA लागू होने का क्या है मतलब?
सरकार ने एलपीजी प्रबंधन के लिए ‘एस्मा’ यानी आवश्यक सेवा अनुरक्षण कानून लागू कर दिया है। इसका सीधा मतलब यह है कि अब गैस की सप्लाई और वितरण से जुड़े कर्मचारी हड़ताल नहीं कर सकेंगे और सरकार के पास यह अधिकार होगा कि वह तय करे कि किसे कितनी गैस मिलेगी। सरकार का पूरा फोकस इस बात पर है कि देश में बढ़ रहे गुस्से को शांत रखा जाए, क्योंकि आज से दो दशक पहले वाली स्थिति नहीं है; अब देश का हर घर खाना बनाने के लिए पूरी तरह एलपीजी पर निर्भर है। यदि यह किल्लत ज्यादा दिनों तक खिंचती है, तो स्थिति बेकाबू हो सकती है।
फिलहाल सरकार सप्लाई के लिए नए रास्तों की तलाश कर रही है ताकि ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ पर निर्भरता कम की जा सके। अगले कुछ दिन भारत के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं।
सावधानी ठीक, घबराहट नहीं
मध्य-पूर्व में तनाव के बीच सोशल मीडिया पर कई ऊर्जा विशेषज्ञ सलाह दे रहे हैं कि जिन घरों में खाली गैस सिलेंडर हैं, उन्हें समय रहते भरवा लेना समझदारी हो सकती है। एहतियात रखना गलत नहीं है, लेकिन जरूरी है कि लोग घबराकर जमाखोरी न करें। जरूरत भर का इंतजाम करना ठीक है, पर अफवाहों के आधार पर अधिक सिलेंडर जमा करना व्यवस्था और सप्लाई दोनों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।
हालांकि सरकार का दावा है कि यह केवल एहतियाती कदम हैं, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भारत एक बार फिर उस दौर की ओर बढ़ रहा है जब अंतरराष्ट्रीय युद्धों का सीधा असर आम आदमी की रसोई तक पहुंच जाता है।
युद्ध और ऊर्जा का पुराना रिश्ता
इतिहास बताता है कि मध्य-पूर्व में जब भी युद्ध की आग भड़की है, उसका असर पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार पर पड़ा है। 1990-91 के इराक युद्ध के दौरान भी ऐसा ही हुआ था। उस समय तेल की कीमतें अचानक बढ़ गई थीं और कई देशों को पेट्रोल-डीजल के साथ-साथ एलपीजी की आपूर्ति में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था।
भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करते हैं, ऐसे संकटों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं। आज भी भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 80 प्रतिशत आयात करता है। इसलिए यदि खाड़ी क्षेत्र में आपूर्ति बाधित होती है तो उसका असर देश के बाजार पर पड़ना स्वाभाविक है।
सरकार की रणनीति: पहले जरूरी सेवाएं
सरकार ने जो आदेश जारी किए हैं, उनमें स्पष्ट कहा गया है कि कुछ सेक्टरों को किसी भी कीमत पर गैस की कमी नहीं होने दी जाएगी। इनमें पीएनजी, सीएनजी, घरेलू एलपीजी और पाइपलाइन आधारित गैस सेवाएं शामिल हैं।
इसके अलावा उर्वरक संयंत्रों को उनकी सामान्य आपूर्ति का लगभग 70 प्रतिशत और औद्योगिक तथा चाय उद्योग को करीब 80 प्रतिशत गैस आपूर्ति जारी रखने का निर्देश दिया गया है। इसका मकसद यह है कि कृषि और आवश्यक उद्योगों की गतिविधियां पूरी तरह ठप न हों।
नौसेना भी हो सकती है सक्रिय
सूत्रों के अनुसार यदि स्थिति और गंभीर होती है तो भारतीय नौसेना को भी सक्रिय भूमिका में लाया जा सकता है। मिडिल ईस्ट के समुद्री मार्गों में फंसे भारतीय जहाजों को सुरक्षित निकालने के लिए युद्धपोत भेजने पर विचार किया जा रहा है। यह कदम न केवल भारतीय व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा के लिए अहम होगा बल्कि सप्लाई चेन को बनाए रखने में भी मददगार साबित हो सकता है।
क्या बढ़ेंगे सिलेंडर के दाम?
ऊर्जा बाजार से जुड़े जानकारों का मानना है कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में एलपीजी, कच्चे तेल और गैस की कीमतों में तेजी आ सकती है। इसका असर भारत में भी दिखाई दे सकता है। कुछ सूत्रों के अनुसार एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
हालांकि सरकार अभी इस पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं कर रही है और उसका कहना है कि स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है।
उत्तराखंड पर क्या पड़ सकता है असर?
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में एलपीजी और पेट्रोलियम उत्पादों की सप्लाई पूरी तरह बाहरी स्रोतों पर निर्भर है। यहां गैस सिलेंडर ट्रांसपोर्ट के जरिए मैदानों से पहाड़ों तक पहुंचते हैं। यदि देश में सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ता है तो पहाड़ी क्षेत्रों में इसका असर अपेक्षाकृत जल्दी महसूस हो सकता है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल घबराने की जरूरत नहीं है। सरकार के एहतियाती कदमों का मकसद ही यह है कि किसी भी संभावित संकट से पहले व्यवस्था को मजबूत किया जा सके।
अफवाहों से ज्यादा जरूरी है संयम
ऐसे समय में सबसे बड़ी चुनौती अफवाहों की होती है। कई बार संकट की वास्तविकता से ज्यादा असर डर और अटकलों का होता है। यदि लोग जरूरत से ज्यादा सिलेंडर जमा करने लगें या बाजार में कृत्रिम कमी पैदा हो जाए तो स्थिति और जटिल हो सकती है।
इसलिए जरूरी है कि आम लोग संयम बरतें और केवल आवश्यकता के अनुसार ही संसाधनों का उपयोग करें।
मध्य-पूर्व की स्थिति निश्चित रूप से चिंताजनक है, लेकिन भारत ने पिछले तीन दशकों में अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में कई कदम उठाए हैं। रणनीतिक भंडार, विविध आयात स्रोत और मजबूत नौसैनिक क्षमता जैसे उपाय देश को पहले की तुलना में अधिक सक्षम बनाते हैं।
फिर भी यह सच है कि वैश्विक युद्धों की आंच से कोई भी देश पूरी तरह अछूता नहीं रह सकता। ऐसे में सरकार की सतर्कता और जनता का संयम ही वह संतुलन है जो संभावित संकट को वास्तविक संकट बनने से रोक सकता है।




